बाहरी गाड़ियां बढ़ा रहीं दिल्ली का प्रदूषण : सीएसई
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क्या आप यकीन करेंगे कि सालाना जितनी नई कारों का दिल्ली में रजिस्ट्रेशन होता है करीब उतनी ही दूसरे राज्यों की गाड़ियां दिल्ली में रोज विभिन्न रास्तों से प्रवेश करती हैं।
यह ताजा आंकलन सेंटर फॉर साइंस एंड एन्वॉयरमेंट(सीएसई) ने रियल टाइम क्रॉस-बॉर्डर ट्रैफिक सर्वे के जरिए किया है। सर्वे के मुताबिक दिल्ली की हवा में मौजूद पर्टिकुलेट मैटर का बोझ बढ़ाने में इन गाड़ियों की हिस्सेदारी 22 फीसदी है।
इनमें निजी गाड़ियों के साथ सवारी गाड़ियां भी शामिल हैं। इनके चलते दिल्ली में प्रदूषण घटाने के उपाय जहां बेअसर हो रहे हैं वहीं इन गाड़ियों के लिए बड़े पैमाने पर पार्किंग की भी जरूरत है।
सर्वे में कहा गया है कि प्रदूषण को घटाने के लिए राजधानी में प्रवेश करने वाले ट्रकों पर लगाम लगाना अच्छी पहल है लेकिन यह काफी नहीं है।
रजिस्ट्रेशन से 2.5 गुना ज्यादा डीजल गाड़ियां
दिल्ली में अब भी डीजल कारों की तादाद काफी है और इनका इस्तेमाल खूब हो रहा है। आंकलन के मुताबिक प्रतिदिन दिल्ली में प्रवेश करने वाले वाहनों में डीजल कार, टैक्सी और एसयूवी कारों की तादाद 2014-15 में डीजल कारों के रजिस्ट्रेशन के मुकाबले 2.5 गुना ज्यादा है।
प्रवेश मार्ग से रोजाना आती हैं 5.64 लाख बाहरी गाड़ियां
सीएसई का यह सर्वे दिल्ली के मुख्य 9 प्रवेश मार्गों पर किया गया है। सर्वे के मुताबिक 3.07 लाख कार और 1.27 लाख दो पहिया वाहन रोजाना बाहर से दिल्ली में प्रवेश करते हैं।
दिल्लीवासियों की सेहत दांव पर
दिल्ली के कुल 124 प्रवेश द्वारों से इन नौ मार्गों के जरिए कुल 70 फीसदी ट्रैफिक दिल्ली में आता है। वहीं सभी प्रवेश द्वारों से कार, एसयूवी और दो-पहिया वाहनों की संख्या कुल 5.65 लाख तक है।
दिल्ली के आर्थिक सर्वेक्षण (2014-15) के मुताबिक राष्ट्रीय राजधानी में कुल 5.69 लाख वाहन रजिस्टर्ड किए गए थे। वहीं दिल्ली में प्रतिदिन प्रवेश करने वाली गाड़ियों की संख्या भी करीब इतनी ही है।
सीएसई के मुताबिक दिल्ली में बराबरी की संख्या में आने वाली बाहरी गाड़ियों की भीड़ से न सिर्फ दिल्ली का पर्यावरण प्रदूषित हो रहा बल्कि इससे एनसीआर के कस्बों को भी नुकसान है।
दिल्लीवासियों की सेहत दांव पर
सीएसई की कार्यकारी निदेशक अनुमिता रॉय चौधरी का कहना है कि यह नया अध्ययन साबित करता है कि सार्वजनिक नीतियां और सार्वजनिक परिवहन दोनों प्रभावी नहीं हैं।
परिवहन के लिए लोगों का रुझान निजी गाड़ियों की तरफ बढ़ रहा है। इसके चलते दिल्ली-एनसीआर के न सिर्फ प्रदूषण में इजाफा हो रहा है बल्कि लोगों की सेहत भी दांव पर है।
घरों और कार्यालयों की वायु गुणवत्ता 82 फीसदी खराब
घरों और कार्यालयों की वायु गुणवत्ता 82 फीसदी खराब
दिल्ली-एनसीआर के घरों और कार्यालयों में वायु की गुणवत्ता 82 फीसदी खराब है। वायु प्रदूषण जानने के लिए किए गए एक सर्वे में इसका खुलासा हुआ है। सर्वे में अप्रैल-मई 2016 में करीब 1500 लोगों से बातचीत और जांच के बाद यह रिपोर्ट जारी की गई है।
क्लीन एयर इंडिया मूवमेंट ने आर्टिमस अस्पताल की ओर से दिल्ली, नोएडा और गुड़गांव के घरों और कार्यालयों में सर्वे किया। सर्वे रिपोर्ट में कहा गया है कि कार्यालय और घर में वक्त व्यतीत करने वाले कुल 34 फीसदी लोगों को एक या ज्यादा वायु संबंधी बीमारियां देखी गईं।
सर्वे में 47 फीसदी लोगों में श्वास संबंधी बीमारियों के लक्षण पाए गए। सर्वे में शामिल आर्टिमस अस्पताल के श्वसन और क्रिटिकल केयर विभाग के प्रमुख डॉ. हिमांशु गर्ग ने बताया कि आमतौर पर लोग वायु प्रदूषण की बात करते हैं।
लेकिन लोगों को इनडोर प्रदूषण के प्रति भी जागरूक होना चाहिए। जो लोग ज्यादा समय घर अथवा कार्यालय में बिताते हैं, उन्हें अंदर की हवा की गुणवत्ता की जांच कराते रहना चाहिए।