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Noida News: रमजान का दूसरा अशरा समाप्त
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-आज से शुरू हुआ तीसरा अशरा, रोजेदारों ने मांगी दुआ
संवाद न्यूज एजेंसी
पिनगवां। पवित्र रमजान महीने का दूसरा अशरा समाप्त हो गया है और बुधवार से तीसरा व अंतिम अशरा शुरू हो गया है। इस अंतिम अशरे को इस्लाम में जहन्नम से आजादी का अशरा माना जाता है।
इस दौरान रोजेदार अल्लाह की इबादत, कुरान की तिलावत और खास दुआओं में अधिक समय बिताते हैं। इस्लामिक विद्वानों के अनुसार रमजान को तीन अशरों में बांटा गया है। पहला अशरा रहमत का, दूसरा अशरा मगफिरत (माफी) का और तीसरा अशरा जहन्नम से आजादी का माना जाता है। तीसरे अशरे में अल्लाह से गुनाहों की माफी और जहन्नम की आग से निजात की दुआ की जाती है। मस्जिदों में इन दिनों इबादत का माहौल और भी ज्यादा बढ़ गया है। रोजेदार नमाज, तरावीह, कुरान की तिलावत और जिक्र-अजकार में अधिक समय बिता रहे हैं। कई लोग एतिकाफ की तैयारी भी कर रहे हैं, जो रमजान के अंतिम दस दिनों में मस्जिदों में रहकर इबादत करने की खास इबादत मानी जाती है।
उलेमा बताते हैं कि रमजान के अंतिम दिनों में इबादत का सवाब और भी बढ़ जाता है। इसी दौरान शबे कद्र (लैलतुल कद्र) की रात भी आती है, जिसे हजार महीनों से बेहतर बताया गया है। इसलिए मुस्लिम समुदाय के लोग इन दिनों में ज्यादा से ज्यादा नेक काम, इबादत और जरूरतमंदों की मदद करने पर जोर देते हैं।तीसरे अशरे की शुरुआत के साथ ही मस्जिदों और घरों में इबादत का माहौल और भी रौनकदार हो गया है तथा रोजेदार अल्लाह की रहमत और मगफिरत की दुआ कर रहे हैं।
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संवाद न्यूज एजेंसी
पिनगवां। पवित्र रमजान महीने का दूसरा अशरा समाप्त हो गया है और बुधवार से तीसरा व अंतिम अशरा शुरू हो गया है। इस अंतिम अशरे को इस्लाम में जहन्नम से आजादी का अशरा माना जाता है।
इस दौरान रोजेदार अल्लाह की इबादत, कुरान की तिलावत और खास दुआओं में अधिक समय बिताते हैं। इस्लामिक विद्वानों के अनुसार रमजान को तीन अशरों में बांटा गया है। पहला अशरा रहमत का, दूसरा अशरा मगफिरत (माफी) का और तीसरा अशरा जहन्नम से आजादी का माना जाता है। तीसरे अशरे में अल्लाह से गुनाहों की माफी और जहन्नम की आग से निजात की दुआ की जाती है। मस्जिदों में इन दिनों इबादत का माहौल और भी ज्यादा बढ़ गया है। रोजेदार नमाज, तरावीह, कुरान की तिलावत और जिक्र-अजकार में अधिक समय बिता रहे हैं। कई लोग एतिकाफ की तैयारी भी कर रहे हैं, जो रमजान के अंतिम दस दिनों में मस्जिदों में रहकर इबादत करने की खास इबादत मानी जाती है।
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उलेमा बताते हैं कि रमजान के अंतिम दिनों में इबादत का सवाब और भी बढ़ जाता है। इसी दौरान शबे कद्र (लैलतुल कद्र) की रात भी आती है, जिसे हजार महीनों से बेहतर बताया गया है। इसलिए मुस्लिम समुदाय के लोग इन दिनों में ज्यादा से ज्यादा नेक काम, इबादत और जरूरतमंदों की मदद करने पर जोर देते हैं।तीसरे अशरे की शुरुआत के साथ ही मस्जिदों और घरों में इबादत का माहौल और भी रौनकदार हो गया है तथा रोजेदार अल्लाह की रहमत और मगफिरत की दुआ कर रहे हैं।
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