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Noida News: भांजी की तरह नौकरी दिलाने की चाह रह गई अधूरी
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भांजी की तरह नौकरी दिलाने की चाह रह गई अधूरी
शारदा विश्वविद्यालय के बीटेक छात्र के हॉस्टल में फंदा लगाकर आत्महत्या करने का मामला
भांजी की सफलता से प्रेरित होकर पुत्र का शारदा विश्वविद्यालय में कराया था दाखिला
माई सिटी रिपोर्टर
ग्रेटर नोएडा। नॉलेज पार्क-3 स्थित एचएमआर बॉयज हॉस्टल में आत्महत्या करने वाले बीटेक छात्र के पिता ने भांजी की तरह बेटे को शारदा विश्वविद्यालय में पढ़ाई कर नौकरी करने का सपना देखा था। नॉलेज पार्क कोतवाली पुलिस ने पिता की तहरीर पर रविवार को बीएनएस की धारा-108 (आत्महत्या के लिए उकसाने) के मामले में शारदा विश्वविद्यालय प्रशासन व कुछ अज्ञात लड़कों के खिलाफ केस दर्ज किया है।
मधुबनी कॉलोनी, पूर्णिया, बिहार के पिता कार्तिक चंद्र डे ने बताया कि उनकी भांजी रितिका पाल नोएडा में रहती है। शारदा विश्वविद्यालय में बीटेक करने के बाद कैंपस प्लेसमेंट होने से भांजी नोएडा की एक आईटी कंपनी में नौकरी कर रही है। इसी कारण पुत्र शिवम डे का दाखिला शारदा विश्वविद्यालय में कराया था। पुत्र का चयन पुणे के अच्छे इंजीनियरिंग कॉलेज में भी बीटेक के लिए हुआ था लेकिन घर से पुणे की दूरी अधिक होने के कारण वहां पढ़ाई के लिए नहीं भेजा था। पुत्र की पढ़ाई के लिए बिहार स्टूडेंट क्रेडिट कार्ड योजना से करीब दो लाख रुपये का लोन लिया था। विश्वविद्यालय में एक सेमेस्टर की फीस शुरुआत में करीब 1 लाख 12 हजार रुपये थी, जो सातवें सेमेस्टर तक बढ़कर 1 लाख 18 हजार रुपये पहुंच गई थी। वह सात सेमेस्टर तक फीस जमा करते रहे। इस साल जून में सातवें सेमेस्टर की फीस जमा की थी।
अगर विश्वविद्यालय की ओर से लगातार फीस ली जा रही थी, तो पुत्र के कॉलेज नहीं आने व पंजीकरण नहीं कराने की जानकारी ईमेल के जरिये क्यों नहीं दी गई। उन्होंने प्रबंधन से मेल कर सवाल पूछा है कि अगर पुत्र विश्वविद्यालय नहीं आ रहा था तो इसकी जानकारी उन्हें क्यों नहीं दी गई। पहले सेमेस्टर के दौरान एक विषय में बैक लगने पर उन्होंने पुत्र से कहा था कि अगर उसका मन नहीं लग रहा है, तो वह पढ़ाई छोड़ वापस आए जाए। कोई दूसरी चीज की पढ़ाई करें। पुत्र बीटेक की पढ़ाई करने के साथ ही रेलवे की भर्ती के लिए बीच-बीच में एग्जाम देता था। उन्हें नहीं मालूम कि पुत्र ने जो मार्कशीट उन्हें भेजी थी वह एडिट की हुई है। यह तो विश्वविद्यालय को भी देखना चाहिए कि कोई कैसे ऐसा कर सकता है।
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मार्कशीट को एडिट कर अभिभावक को भेजता था
पुलिस जांच में यह भी पता चला है कि छात्र की सात विषय में बैक आई थी। वह बैक के कई एग्जाम दे रहा था। बैक पेपर क्लियर नहीं होने के कारण वह परेशान चल रहा था। जांच में यह भी पता चला है कि वह मार्कशीट को एडिट कर अपने अभिभावक को भेजता था, जिससे अभिभावक को अहसास हो सके कि वह लगातार परीक्षा दे रहा है। पुलिस की ओर से इस बात की भी जांच की जा रही है कि अगर वह विश्वविद्यालय नहीं जा रहा था, तो कहां जा रहा था।
अभिभावक को बच्चे की अभिरुचि पहचानने की जरूरत
जीबीयू के मनोवैज्ञानिक प्रोफेसर डॉ. आनंद प्रताप सिंह ने बताया कि बच्चों के ऊपर मनोवैज्ञानिक दबाव की उत्पत्ति पारिवारिक पृष्टभूमि से शुरू होती है। अभिभावक कई बार बच्चे की सही क्षमता का आकलन किए बजाए उसे विशेष शिक्षा के क्षेत्र में धकेलने लगते हैं जबकि हर बच्चे की अपनी अलग अभिरुचि होती है। अगर बच्चे की उस क्षेत्र में अभिरुचि नहीं है तो वह उस क्षेत्र में सफल नहीं हो पाता है। नई शिक्षा प्रणाली पहले के मुकाबले अब ज्यादा अवसर देती है।
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शारदा विश्वविद्यालय के बीटेक छात्र के हॉस्टल में फंदा लगाकर आत्महत्या करने का मामला
भांजी की सफलता से प्रेरित होकर पुत्र का शारदा विश्वविद्यालय में कराया था दाखिला
माई सिटी रिपोर्टर
ग्रेटर नोएडा। नॉलेज पार्क-3 स्थित एचएमआर बॉयज हॉस्टल में आत्महत्या करने वाले बीटेक छात्र के पिता ने भांजी की तरह बेटे को शारदा विश्वविद्यालय में पढ़ाई कर नौकरी करने का सपना देखा था। नॉलेज पार्क कोतवाली पुलिस ने पिता की तहरीर पर रविवार को बीएनएस की धारा-108 (आत्महत्या के लिए उकसाने) के मामले में शारदा विश्वविद्यालय प्रशासन व कुछ अज्ञात लड़कों के खिलाफ केस दर्ज किया है।
मधुबनी कॉलोनी, पूर्णिया, बिहार के पिता कार्तिक चंद्र डे ने बताया कि उनकी भांजी रितिका पाल नोएडा में रहती है। शारदा विश्वविद्यालय में बीटेक करने के बाद कैंपस प्लेसमेंट होने से भांजी नोएडा की एक आईटी कंपनी में नौकरी कर रही है। इसी कारण पुत्र शिवम डे का दाखिला शारदा विश्वविद्यालय में कराया था। पुत्र का चयन पुणे के अच्छे इंजीनियरिंग कॉलेज में भी बीटेक के लिए हुआ था लेकिन घर से पुणे की दूरी अधिक होने के कारण वहां पढ़ाई के लिए नहीं भेजा था। पुत्र की पढ़ाई के लिए बिहार स्टूडेंट क्रेडिट कार्ड योजना से करीब दो लाख रुपये का लोन लिया था। विश्वविद्यालय में एक सेमेस्टर की फीस शुरुआत में करीब 1 लाख 12 हजार रुपये थी, जो सातवें सेमेस्टर तक बढ़कर 1 लाख 18 हजार रुपये पहुंच गई थी। वह सात सेमेस्टर तक फीस जमा करते रहे। इस साल जून में सातवें सेमेस्टर की फीस जमा की थी।
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अगर विश्वविद्यालय की ओर से लगातार फीस ली जा रही थी, तो पुत्र के कॉलेज नहीं आने व पंजीकरण नहीं कराने की जानकारी ईमेल के जरिये क्यों नहीं दी गई। उन्होंने प्रबंधन से मेल कर सवाल पूछा है कि अगर पुत्र विश्वविद्यालय नहीं आ रहा था तो इसकी जानकारी उन्हें क्यों नहीं दी गई। पहले सेमेस्टर के दौरान एक विषय में बैक लगने पर उन्होंने पुत्र से कहा था कि अगर उसका मन नहीं लग रहा है, तो वह पढ़ाई छोड़ वापस आए जाए। कोई दूसरी चीज की पढ़ाई करें। पुत्र बीटेक की पढ़ाई करने के साथ ही रेलवे की भर्ती के लिए बीच-बीच में एग्जाम देता था। उन्हें नहीं मालूम कि पुत्र ने जो मार्कशीट उन्हें भेजी थी वह एडिट की हुई है। यह तो विश्वविद्यालय को भी देखना चाहिए कि कोई कैसे ऐसा कर सकता है।
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मार्कशीट को एडिट कर अभिभावक को भेजता था
पुलिस जांच में यह भी पता चला है कि छात्र की सात विषय में बैक आई थी। वह बैक के कई एग्जाम दे रहा था। बैक पेपर क्लियर नहीं होने के कारण वह परेशान चल रहा था। जांच में यह भी पता चला है कि वह मार्कशीट को एडिट कर अपने अभिभावक को भेजता था, जिससे अभिभावक को अहसास हो सके कि वह लगातार परीक्षा दे रहा है। पुलिस की ओर से इस बात की भी जांच की जा रही है कि अगर वह विश्वविद्यालय नहीं जा रहा था, तो कहां जा रहा था।
अभिभावक को बच्चे की अभिरुचि पहचानने की जरूरत
जीबीयू के मनोवैज्ञानिक प्रोफेसर डॉ. आनंद प्रताप सिंह ने बताया कि बच्चों के ऊपर मनोवैज्ञानिक दबाव की उत्पत्ति पारिवारिक पृष्टभूमि से शुरू होती है। अभिभावक कई बार बच्चे की सही क्षमता का आकलन किए बजाए उसे विशेष शिक्षा के क्षेत्र में धकेलने लगते हैं जबकि हर बच्चे की अपनी अलग अभिरुचि होती है। अगर बच्चे की उस क्षेत्र में अभिरुचि नहीं है तो वह उस क्षेत्र में सफल नहीं हो पाता है। नई शिक्षा प्रणाली पहले के मुकाबले अब ज्यादा अवसर देती है।