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Noida News: इलाज के पैसे देने से किया इन्कार, कंपनी पर जुर्माना
Thu, 16 Oct 2025 12:30 AM IST
नोएडा ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, नोएडा
संवाद न्यूज एजेंसी, नोएडा
Updated Thu, 16 Oct 2025 12:30 AM IST
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माई सिटी रिपोर्टर
पानीपत। जिला उपभोक्ता आयोग ने बीमारी के इलाज में खर्च न देने पर बीमा कंपनी के खिलाफ फैसला सुनाया है। कंपनी को छह प्रतिशत ब्याज के साथ क्लेम देने के आदेश दिए हैं। साथ ही उपभोक्ता को मानसिक क्षतिपूर्ति और मुकदमेबाजी में खर्च भी अदा करने को कहा है।
शिकायतकर्ता असंध रोड निवासी तेजबीर ने आयोग में याचिका दाखिल की थी। उनका कहना था कि उन्होंने अपने बेटे के लिए केयर क्लासिक हेल्थ पॉलिसी ली थी। बेटे की आंख में तिरछापन की समस्या होने पर डॉक्टर ने ऑपरेशन की सलाह दी और इलाज पर 33,851 रुपये खर्च हुए। खर्च का क्ल्म के लिए कंपनी में आवेदन किया तो कंपनी ने कोई भुगतान नहीं किया। बाद में जब उन्होंने इसके बारे में जानकारी की तो कंपनी ने यह कहते हुए दावा खारिज कर दिया कि यह जन्मजात दोष से जुड़ा मामला है, जो पॉलिसी के तहत कवर नहीं होता।
शिकायतकर्ता ने डॉक्टर का प्रमाण-पत्र दिखाया कि यह समस्या जन्मजात नहीं थी बल्कि वर्ष 2020 के बाद विकसित हुई। तर्कों और साक्ष्यों पर सुनवाई के बाद आयोग के अध्यक्ष डॉ आरके डोगरा और सदस्य विनीत कौशिक ने माना कि बीमा कंपनी द्वारा दावा अस्वीकार करना अनुचित था। आयोग ने कंपनी को 33,851 रुपये की राशि छह प्रतिशत वार्षिक ब्याज सहित चुकाने के साथ-साथ पांच हजार रुपये मानसिक उत्पीड़न और 5,500 रुपये मुकदमा खर्च के रूप में देने के आदेश दिए हैं। आदेश का पालन 45 दिन में नहीं होने पर ब्याज दर नौ प्रतिशत हो जाएगी।
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पानीपत। जिला उपभोक्ता आयोग ने बीमारी के इलाज में खर्च न देने पर बीमा कंपनी के खिलाफ फैसला सुनाया है। कंपनी को छह प्रतिशत ब्याज के साथ क्लेम देने के आदेश दिए हैं। साथ ही उपभोक्ता को मानसिक क्षतिपूर्ति और मुकदमेबाजी में खर्च भी अदा करने को कहा है।
शिकायतकर्ता असंध रोड निवासी तेजबीर ने आयोग में याचिका दाखिल की थी। उनका कहना था कि उन्होंने अपने बेटे के लिए केयर क्लासिक हेल्थ पॉलिसी ली थी। बेटे की आंख में तिरछापन की समस्या होने पर डॉक्टर ने ऑपरेशन की सलाह दी और इलाज पर 33,851 रुपये खर्च हुए। खर्च का क्ल्म के लिए कंपनी में आवेदन किया तो कंपनी ने कोई भुगतान नहीं किया। बाद में जब उन्होंने इसके बारे में जानकारी की तो कंपनी ने यह कहते हुए दावा खारिज कर दिया कि यह जन्मजात दोष से जुड़ा मामला है, जो पॉलिसी के तहत कवर नहीं होता।
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शिकायतकर्ता ने डॉक्टर का प्रमाण-पत्र दिखाया कि यह समस्या जन्मजात नहीं थी बल्कि वर्ष 2020 के बाद विकसित हुई। तर्कों और साक्ष्यों पर सुनवाई के बाद आयोग के अध्यक्ष डॉ आरके डोगरा और सदस्य विनीत कौशिक ने माना कि बीमा कंपनी द्वारा दावा अस्वीकार करना अनुचित था। आयोग ने कंपनी को 33,851 रुपये की राशि छह प्रतिशत वार्षिक ब्याज सहित चुकाने के साथ-साथ पांच हजार रुपये मानसिक उत्पीड़न और 5,500 रुपये मुकदमा खर्च के रूप में देने के आदेश दिए हैं। आदेश का पालन 45 दिन में नहीं होने पर ब्याज दर नौ प्रतिशत हो जाएगी।
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