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12 सहायक कंपनियों के नाम पर स्पोर्ट्स सिटी में घोटाला

Mon, 06 Sep 2021 01:15 AM IST
Noida Bureau नोएडा ब्यूरो
Updated Mon, 06 Sep 2021 01:15 AM IST
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Scam in Sports City in the name of 12 subsidiaries
सहायक कंपनियों के नाम पर स्पोर्ट्स सिटी में घोटाला
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नोएडा। बिल्डरों से मिलीभगत के कारण नोएडा प्राधिकरण कंगाली के कगार पर खड़ा है। आलम यह है कि स्पोर्ट्स सिटी के सेक्टर-150 की एवज में प्राधिकरण को सिर्फ दस फीसदी रकम देकर बिल्डर ने पहले तो लाखों वर्गमीटर जमीन नाम कराई। फिर उसी जमीन को 12 अन्य बिल्डर कंपनियों को बेच दिया। सहायक कंपनियों को जमीन देने के नाम पर बिल्डरों ने 500 रुपये के स्टांप पेपर पर ही पूरा खेल कर करोड़ों रुपये की स्टांप ड्यूटी भी हजम कर ली। कुछ कंपनियों ने 10 रुपये के स्टांप पर ही हजारों वर्गमीटर जमीन पर अपना कब्जा जमा लिया। इस पूरे खेल से शासन अनजान बना रहा और प्राधिकरण अधिकारी मूकदर्शक की भूमिका में रहे।
दरअसल, ब्रिटिश काल के दौरान चलने वाले इंडियन कंपनीज एक्ट-1913 में स्टांप नियमों के नाम से ही घोटाले को अंजाम दिया गया। कुल मिलाकर मुख्य बिल्डर ने जितनी जमीन प्राधिकरण से ली थी, वह सारी जमीन सहायक कंपनियों के नाम ट्रांसफर कर दी। अधिकारियों की मिलीभगत से बिल्डर ने इन्हीं सहायक कंपनियों के नाम पर प्राधिकरण का बकाया भुगतान भी मढ़ दिया। स्पोर्ट्स सिटी के नाम पर किए गए इस घोटाले में न तो बिल्डरों ने प्राधिकरण का बकाया चुकाया और न ही स्पोर्ट्स सिटी के लिए काम किया। अपनी 30 फीसदी जमीन पर आवासीय योजना लाकर खरीदारों से पैसे जुटाए और निकल लिए। सिर्फ सेक्टर-150 में ही नहीं, बल्कि पूरे नोएडा में बिल्डरों ने भ्रष्टाचार के इस खेल को स्पोर्ट्स सिटी के नाम पर खेला। ऐसे में 500 करोड़ के स्टांप राजस्व का नुकसान उठाना पड़ा।
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ऐसे शुरू हुआ गड़बड़झाला
दिल्ली में हुए कॉमनवेल्थ गेम्स से पहले ही नोएडा में भी स्पोर्ट्स सिटी बसाने पर काम शुरू हुआ था। प्रदेश सरकार से अनुमोदन के बाद नोएडा के पांच अलग-अलग सेक्टर-78, 79, 101, 150 और 152 में प्राधिकरण ने चार बडे़ बिल्डरों को 33,30,500 वर्गमीटर जमीन सस्ती दर पर 90 साल के लिए लीज पर आवंटित कर दी। यहां भी बिल्डरों से जमीन के कुल भुगतान का सिर्फ दस फीसदी जमा कराया गया। बाकी रकम किस्तों में देना तय किया गया। नियम था कि बिल्डर इन जमीन के 28 फीसदी हिस्से पर ही आवासीय सेक्टर विकसित कर सकता है। दो फीसदी जमीन पर उसे व्यावसायिक इस्तेमाल की अनुमति थी। शेष 70 फीसदी जमीन पर बिल्डर को आम जनता के लिए खेल सुविधाएं विकसित करनी थीं। प्राधिकरण अधिकारियों से सांठगांठ करके बिल्डरों ने इन पांचों सेक्टर में आवंटित भूखंडों को 74 उप विभाजित भूखंडों में तब्दील कराया और अन्य बिल्डरों को उन्हें बेच दिया। इन सभी बिल्डरों को अपनी सहायक कंपनी दर्शाया गया।
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स्पोर्ट्स सिटी के सेक्टर-150 में ऐसे बने नए भूखंड
19 दिसंबर 2014 को नोएडा प्राधिकरण ने मैसर्स लोट्स ग्रींस कंस्ट्रक्शंस प्रा.लि. को स्पोर्ट्स सिर्टी विकसित करने के लिए सेक्टर-150 में भूखंड संख्या-एससी-02 की 6.40 लाख वर्गमीटर जमीन की 90 साल की लीज पर दे दिया। 10 फीसदी भुगतान लेकर इसकी लीज डीज भी रजिस्टर्ड कर दी गई। 12.41 अरब से ज्यादा कीमत वाली इस जमीन के लिए बिल्डर ने 75.28 करोड़ की स्टांप ड्यूटी भी दी। इसके बाद बिल्डर ने इस जमीन को 12 भूखंडों में बांटकर 12 सहायक बिल्डर कंपनियों के नाम लीज डीड कर दी। इन 12 कंपनियों को जो जमीन दी गई, उनकी लिखा-पढ़ी के लिए किसी में 10 रुपये किसी में 100 रुपये और किसी में सिर्फ 500 रुपये का स्टांप का प्रयोग किया गया।

किसे दी कितनी जमीन
बिल्डर कंपनी का नाम भूखंड (वर्गमीटर में) नया भूखंड नंबर
1. मैसर्स लैंड कार्ट बिल्डर्स प्रा. लि. 83970 एससी-02/ए1
2. मैसर्स बिल्ड वॉल प्रा. लि. 65331 एससी-02/ए2
3. मैसर्स विज टाउन प्रा. लि. 27185 एससी-02/ए3
4. मैसर्स ग्रे वॉल डेवलपर्स प्रा.लि. 46846 एससी-02/ए4
5. मैसर्स ग्रे ब्रिक डेवलपर्स प्रा.लि. 8080 एससी-02/ए5
6. मैसर्स ब्रिक टाउन डेवलपर्स प्रा.लि. 37915 एससी-02/ए6
7. मैसर्स स्ट्रांगबिज प्रोपबुल्ड प्रा.लि. 50790 एससी-02/ए7
8. मैसर्स विशलैंड बिल्डजोन प्रा. 50560 एससी-02/ए8
9. वंडर्स बिल्डमार्ट प्रा.लि. 80857 एससी-02/ए9
10. मैसर्स र्स्कापमेंट बिल्डक्राफ्ट प्रा.लि. 94293 एससी-02/ए10
11. मैसर्स ब्रिकराइज डेवलपर्स प्रा.लि. 72000 एससी-02/ए11
12. मैसर्स फीस्ट होम डेवलपर्स प्रा.लि. 72000 एससी-02/ए12
कंपनी एक्ट के नियमों की ली गई आड़
देश की आजादी से पहले ब्रिटिश सरकार ने देश में इंडियन कंपनी एक्ट-1913 को लागू किया था। इस एक्ट में हुई अधिसूचना में स्पष्ट था कि यदि कोई मुख्य कंपनी अपनी सहायक कंपनी को अचल संपत्ति ट्रांसफर करती है तो उस पर स्टांप ड्यूटी नहीं लागू नहीं होगी। बशर्ते सहायक कंपनी को जो मुनाफा होगा वह मुख्य कंपनी का ही माना जाएगा। इसके बाद 25 मार्च 1942 को कंपनी एक्ट में कुछ संशोधन किया गया, लेकिन इसमें स्टांप ड्यूटी का जिक्र नहीं था। देश की आजादी के बाद 1956 में नोटिफाई किए गए कंपनी एक्ट में भी स्टांप ड्यूटी छूट संबंधी कोई जिक्र नहीं है। 2009 में सरकार ने इसमें संशोधन करके स्पष्ट किया कि 1913 एक्ट की जगह 1956 एक्ट को माना जाए। मौजूदा समय में जो कंपनी एक्ट देश में लागू है वह 29 अगस्त 2013 को लागू किया गया था। इसमें भी स्टांप ड्यूटी छूट संबंधी कोई अधिसूचना जारी नहीं की गई है। यही कारण है कि मौजूदा कंपनी एक्ट में स्टांप ड्यूटी एक्ट में स्पष्टता न होने के कारण अधिकारी और कुछ बिल्डर इसका दुरुपयोग करके प्रदेश राजस्व को करोड़ों का नुकसान पहुंचा रहे हैं। बिल्डर सहायक कंपनी बनाकर मात्र 100 या 500 रुपये के स्टांप पर लीजडीड तैयार कर देते हैं, जबकि शासन और अधिकारी स्तर पर इस ओर ध्यान दिया जाए तो अब इन बिल्डरों को कुल कीमत का पांच प्रतिशत स्टांप ड्यूटी और एक प्रतिशत रजिस्ट्रेशन चार्ज का भुगतान करना होगा।
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