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Noida News: न्याय से पहले अन्याय... दिव्यांगों के लिए मध्यस्थता केंद्र तक पहुंचना सजा से कम नहीं
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मध्यस्थता केंद्र के बाहर जॉली।
लखनऊ। पारिवारिक न्यायालय के कैसरबाग स्थित मध्यस्थता केंद्र तक पहुंचना दिव्यांगों के लिए बेहद कठिन है। तीन-चार लोगों का सहारा लेकर ही कोई वहां तक पहुंच सकता है। यदि कोई मददगार नहीं है तो सुनवाई में शामिल हुए बिना लौटना पड़ता है।
शुक्रवार को मध्यस्थता केंद्र यानी वैकल्पिक विवाद समाधान केंद्र (एडीआर) परिसर में कुछ ऐसी ही तकलीफदेह स्थिति देखने को मिली। केंद्र प्रथम तल पर है। ऐसे में रैंप और लिफ्ट न होने से दिव्यांग महिला दो घंटे तक फंसी रहीं। स्थानीय लोग बताते हैं कि ऐसी स्थिति अक्सर देखने को मिलती है।
इंदिरानगर निवासी दिव्यांग जॉली मोहन के पैर बचपन से ही लकवाग्रस्त हैं। पति से तलाक के मामले में मध्यस्थता के लिए वैकल्पिक विवाद समाधान केंद्र पहुंची थीं। व्हीलचेयर के सहारे प्रथम तल तक जाना असंभव था। लंबे इंतजार के बाद उन्हें बिना सुने लौटना पड़ा। जॉली कहती हैं कि न्याय मांगने आते हैं, पर पहले ही कदम पर अधिकार छीने जाने जैसा लगता है। दिव्यांग होने की वजह से पति ने मुंह फेर लिया है। कई और शारीरिक जटिलताओं की वजह से खुद से चल नहीं पातीं। दो घंटे इंतजार करने पर भी मदद न मिलने से वह रो पड़ती हैं। बुजुर्ग माता-पिता असमर्थ हैं। भाई कब तक सहारा देंगे, यह चिंता उन्हें खाए जा रही है।
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डीएम और सीएम तक लगाई गुहार
जॉली बताती हैं कि रैंप और लिफ्ट न होने की समस्या जिलाधिकारी और मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर बता चुकी हैं। अभी तक समाधान नहीं दिखा। इंदिरानगर से यहां तक पहुंचना आसान है, लेकिन प्रथम तल तक चढ़ना सबसे कठिन। दो-तीन लोग किसी महिला को गोद में उठाकर ऊपर ले जाएं, यह उसकी गरिमा के खिलाफ है।
दिव्यांग अधिकार अधिनियम की अवहेलना
दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम-2016 के तहत सभी सार्वजनिक भवनों, खासकर सरकारी दफ्तरों और अदालतों में रैंप, लिफ्ट और दिव्यांग-अनुकूल शौचालय अनिवार्य है। पारिवारिक न्यायालय के मध्यस्थता केंद्र में इन सुविधाओं का अभाव साफतौर पर कानून का उल्लंघन है। पहले से परेशान लोग न्याय पाने से पहले ही ठोकरें खा रहे हैं।
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शुक्रवार को मध्यस्थता केंद्र यानी वैकल्पिक विवाद समाधान केंद्र (एडीआर) परिसर में कुछ ऐसी ही तकलीफदेह स्थिति देखने को मिली। केंद्र प्रथम तल पर है। ऐसे में रैंप और लिफ्ट न होने से दिव्यांग महिला दो घंटे तक फंसी रहीं। स्थानीय लोग बताते हैं कि ऐसी स्थिति अक्सर देखने को मिलती है।
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इंदिरानगर निवासी दिव्यांग जॉली मोहन के पैर बचपन से ही लकवाग्रस्त हैं। पति से तलाक के मामले में मध्यस्थता के लिए वैकल्पिक विवाद समाधान केंद्र पहुंची थीं। व्हीलचेयर के सहारे प्रथम तल तक जाना असंभव था। लंबे इंतजार के बाद उन्हें बिना सुने लौटना पड़ा। जॉली कहती हैं कि न्याय मांगने आते हैं, पर पहले ही कदम पर अधिकार छीने जाने जैसा लगता है। दिव्यांग होने की वजह से पति ने मुंह फेर लिया है। कई और शारीरिक जटिलताओं की वजह से खुद से चल नहीं पातीं। दो घंटे इंतजार करने पर भी मदद न मिलने से वह रो पड़ती हैं। बुजुर्ग माता-पिता असमर्थ हैं। भाई कब तक सहारा देंगे, यह चिंता उन्हें खाए जा रही है।
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डीएम और सीएम तक लगाई गुहार
जॉली बताती हैं कि रैंप और लिफ्ट न होने की समस्या जिलाधिकारी और मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर बता चुकी हैं। अभी तक समाधान नहीं दिखा। इंदिरानगर से यहां तक पहुंचना आसान है, लेकिन प्रथम तल तक चढ़ना सबसे कठिन। दो-तीन लोग किसी महिला को गोद में उठाकर ऊपर ले जाएं, यह उसकी गरिमा के खिलाफ है।
दिव्यांग अधिकार अधिनियम की अवहेलना
दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम-2016 के तहत सभी सार्वजनिक भवनों, खासकर सरकारी दफ्तरों और अदालतों में रैंप, लिफ्ट और दिव्यांग-अनुकूल शौचालय अनिवार्य है। पारिवारिक न्यायालय के मध्यस्थता केंद्र में इन सुविधाओं का अभाव साफतौर पर कानून का उल्लंघन है। पहले से परेशान लोग न्याय पाने से पहले ही ठोकरें खा रहे हैं।

मध्यस्थता केंद्र के बाहर जॉली।