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Noida News: अत्याचारों के सामने नहीं झुके गुरु तेग बहादुर, कुबूल की शहादत

Tue, 28 Oct 2025 02:29 AM IST
Noida Bureau नोएडा ब्यूरो
Updated Tue, 28 Oct 2025 02:29 AM IST
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Guru Tegh Bahadur did not bow down to the atrocities, martyrdom of Qubool
कानपुर। गुरु तेग बहादुर साहिब ने मुगल शासक औरंगजेब के सामने झुकने से इंकार करते हुए शहादत कुबूल की तो चारों ओर जो बोले सो निहाल का उद्घोष गूंज उठा। मौका था मोतीझील स्थित लाजपत भवन में गुरु तेग बहादुर की जीवनगाथा के मंचन का। इसे पंजाब से आए कलाकारों ने नाट्य मंचन पर दर्शाया तो लोग भाव विभोर हो गए।
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नाट्य की शुरुआत औरंगजेब के अत्याचारों से हुई जिसमें कश्मीरी पंडितों ने परेशान होकर गुरु तेग बहादुर से न्याय की गुहार लगाई। गुरुतेग बहादुर ने उनका समर्थन किया और रक्षा के लिए साथ चल दिए। जब वह औरंगजेब के सामने आए तो उसने तीन शर्तें रख दीं। पहली शर्त रखी कि वह धर्म परिवर्तन कर लें, दूसरी शर्त कि वह कोई चमत्कार दिखाएं और तीसरी शर्त रही कि अगर ऐसा नहीं कर रहे हैं तो वह शहादत के लिए तैयार हो जाएं। इस पर गुरु तेग बहादुर ने शहादत कुबूल कर ली। मंचन के दौरान कुछ दृश्य एलईडी स्क्रीन पर भी दिखाए गए।
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आयोजक सरदार मोकम सिंह ने बताया कि गुरु तेग बहादुर साहिब की शहादत के बाद औरंगजेब ने कहा कि उनके हर अंग दिल्ली के हर कोने में लटकाए जाएं। उसी समय भयंकर तूफान आ गया तो गुरु के शिष्य उनका शरीर अपने साथ ले गए। जब तूफान खत्म हुआ तो औरंगजेब को उनका शरीर नहीं मिला इस पर उसने शिष्यों के पीछे अपने सिपाहियों को भेजा। शिष्यों ने जिस घर में गुरुजी का शरीर रखा था वहां पर आग लगा दी जिससे उनका दाह संस्कार हो जाए। चुपचाप अत्याचार रहने वाले लोगों में गुरु तेग की शहादत से चेतना आई और वह अपने धर्म और आत्मसम्मान के लिए आवाज उठाने लगे। नाटक का लेखन व निर्देशन तलविंदर सिंह भुल्लार ने किया। इसमें पंजाब से आए 20 कलाकारों ने अभिनय किया। यहां हरजीत सिंह कालड़ा, सरदार मोहकम सिंह, हरविंदर सिंह लार्ड, कंवलजीत सिंह मानू, जसवंत सिंह भाटिया आदि मौजूद रहे।
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शबद कीर्तन सुन संगत हुई निहाल

गुरुता गद्दी दिवस पर गुरुद्वारा भाई बन्नो साहिब में दीवान सजाया गया। रागी जत्थों ने शबद कीर्तन से संगत को निहाल किया। गुरु ग्रंथ साहिब के सामने मत्था टेकने तथा उनका आशीर्वाद लेने के लिए संगत का तांता लगा रहा। गुरु का लंगर भी हुआ। यहां बड़ी संख्या में सिख समाज के लोग शामिल हुए और अरदास की।
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