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Noida News: यमुना की बाढ़ से उजड़े परिवार
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-एक्सप्रेसवे के किनारे बने तंबुओं में कट रही 70 से ज्यादा परिवारों की जिंदगी
-नम जमीन, मच्छरों से भरी रातें और बारिश से बेहाल
संवाद न्यूज एजेंसी
नई दिल्ली। यमुना की बाढ़ ने राजधानी के लोगों का आशियाना छीन लिया है। ऐसे में वह अक्षरधाम के पास दिल्ली-मेरठ एक्सप्रेसवे के किनारे 70 से ज्यादा परिवार अब तिरपाल और ईंटों से बने अस्थायी तंबुओं में जिंदगी गुजार रहे हैं। कभी यमुना के बाढ़ मैदानों में बसी झुग्गियों में रहने वाले इन लोगों के पास अब सिर ढकने को यही तंबू ही सहारा हैं। नम जमीन, मच्छरों से भरी रातें और लगातार होती बारिश उनका सबसे बड़ा संघर्ष है।
बाढ़ पीड़ित प्रेमवती ने कहा कि पहले तोड़फोड़ हुई, फिर बारिश, और अब बाढ़। हम रोज कूड़ा बीनकर या फूल बेचकर 300-400 रुपये कमाते हैं, लेकिन अब छत भी नहीं बची। एक तंबू ही परिवार का पूरा घर है। अंदर कोने में ईंटों पर रखा चूल्हा, दो-चार बर्तन और गीले कपड़ों से भरी रस्सी उनकी मजबूरी बयां करती है। दिनेश कुमार बताते हैं कि बारिश रुकने का नाम नहीं ले रही। कपड़े सूखते ही नहीं। बच्चे भीगकर बीमार हो रहे हैं। तीन बच्चों की मां प्रियंका कहती हैं कि इतनी कम जगह में जीना मुश्किल है। बाहर खाना बनाते हैं तो बारिश में सब भीग जाता है। पानी ने हमारी झुग्गियां और सपनों को निगल लिया।
शाम होते ही बच्चे तंबुओं के पीछे खेलते हैं, लेकिन माता-पिता हमेशा डरे रहते हैं। हाईवे पर दौड़ते ट्रक और गाड़ियां हर वक्त उनकी चिंता बढ़ाते हैं। बुजुर्ग राम अवतार कहते हैं कि बच्चों पर नजर रखनी पड़ती है, वरना जरा-सी चूक भारी पड़ सकती है। रात को महिलाएं राहत सामग्री से मिले राशन से दाल-चावल पकाती हैं, लेकिन उमस, मच्छर और वाहनों का शोर सोने नहीं देता। ब्रिजेश कहते हैं कि तंबू में बारिश का पानी रिसता है, हमें एक आंख खोलकर ही सोना पड़ता है।
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-नम जमीन, मच्छरों से भरी रातें और बारिश से बेहाल
संवाद न्यूज एजेंसी
नई दिल्ली। यमुना की बाढ़ ने राजधानी के लोगों का आशियाना छीन लिया है। ऐसे में वह अक्षरधाम के पास दिल्ली-मेरठ एक्सप्रेसवे के किनारे 70 से ज्यादा परिवार अब तिरपाल और ईंटों से बने अस्थायी तंबुओं में जिंदगी गुजार रहे हैं। कभी यमुना के बाढ़ मैदानों में बसी झुग्गियों में रहने वाले इन लोगों के पास अब सिर ढकने को यही तंबू ही सहारा हैं। नम जमीन, मच्छरों से भरी रातें और लगातार होती बारिश उनका सबसे बड़ा संघर्ष है।
बाढ़ पीड़ित प्रेमवती ने कहा कि पहले तोड़फोड़ हुई, फिर बारिश, और अब बाढ़। हम रोज कूड़ा बीनकर या फूल बेचकर 300-400 रुपये कमाते हैं, लेकिन अब छत भी नहीं बची। एक तंबू ही परिवार का पूरा घर है। अंदर कोने में ईंटों पर रखा चूल्हा, दो-चार बर्तन और गीले कपड़ों से भरी रस्सी उनकी मजबूरी बयां करती है। दिनेश कुमार बताते हैं कि बारिश रुकने का नाम नहीं ले रही। कपड़े सूखते ही नहीं। बच्चे भीगकर बीमार हो रहे हैं। तीन बच्चों की मां प्रियंका कहती हैं कि इतनी कम जगह में जीना मुश्किल है। बाहर खाना बनाते हैं तो बारिश में सब भीग जाता है। पानी ने हमारी झुग्गियां और सपनों को निगल लिया।
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शाम होते ही बच्चे तंबुओं के पीछे खेलते हैं, लेकिन माता-पिता हमेशा डरे रहते हैं। हाईवे पर दौड़ते ट्रक और गाड़ियां हर वक्त उनकी चिंता बढ़ाते हैं। बुजुर्ग राम अवतार कहते हैं कि बच्चों पर नजर रखनी पड़ती है, वरना जरा-सी चूक भारी पड़ सकती है। रात को महिलाएं राहत सामग्री से मिले राशन से दाल-चावल पकाती हैं, लेकिन उमस, मच्छर और वाहनों का शोर सोने नहीं देता। ब्रिजेश कहते हैं कि तंबू में बारिश का पानी रिसता है, हमें एक आंख खोलकर ही सोना पड़ता है।
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