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हत्या व दंगा मामले में 12 आरोपी बरी
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नई दिल्ली। अदालत ने पांच साल पहले एक महिला की हत्या व दंगा करने समेत अन्य आरोपों से 12 आरोपियों को बरी कर दिया। अदालत ने अपने फैसले में कहा कि पुलिस द्वारा साक्ष्यों में फेरबदल से इनकार नहीं किया जा सकता। यह विवाद 2015 विधानसभा चुनाव में फर्जी वोट डालने के आरोपों के कारण हुआ था।
कड़कड़डूमा अदालत के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश विनोद यादव ने मामले में आरोपी आस मोहम्मद, राजेश कुमार, शहजाद अहमद, मोहम्मद रिहान, एजाज, हनीफुद्दीन, जाकिर हुसैन, इमरान, मोहम्मद फरमान, आलम खान, परवेज तथा इमरान को हत्या, दंगा करने, भीड़ जमा करने, आपराधिक साजिश तथा शस्त्र अधिनियम के आरोपों से साक्ष्यों के अभाव में बरी कर दिया।
अभियोजन के अनुसार फरवरी 2015 में दिल्ली विधानसभा चुनाव में 10-12 लड़कों ने खजूरी खास इलाके में हाजी यामीन के घर को घेर लिया था। इनमें से कुछ के पास पिस्टल थीं। यामीन आम आदमी पार्टी का एजेंट था। फर्जी वोट डालने को लेकर उसकी आरोपी हनीफुद्दीन से बहस हुई थी। इस भीड़ ने यामीन के घर जाकर गाली गलौज के बाद अंधाधुंध फायरिंग की थी जिसमें शुख्रा बेगम नामक महिला की गोली लगने से मौत हो गई थी।
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अदालत ने इस बात पर गौर किया कि शव का पोस्ट मार्टम करने वाले डॉक्टर ने बुलेट समेत सारी जब्त सामग्री आठ फरवरी को जांच अधिकारी दी थी लेकिन पुलिस के सीजर मेमो के अनुसार उसे वह बुलेट शवगृह से 19 फरवरी को मिली थी।
अदालत ने अभियोजन के गवाह एएसआई उमेश सिंह के बयान को सही मानते हुए कहा कि ये साफ है कि जांच अधिकारी सांवर मल ने 19 फरवरी 2015 को शवगृह पर कोई तफतीश नहीं की थी बल्कि उसने तारीख में फेरबदल कर उसे आठ से 19 फरवरी कर दिया था ताकि मृतका के माथे से मिले बुलेट को दूसरी बुलेट से बदला जा सके और उस पिस्टल की बरामदगी आरोपी राजेश से दिखाई जा सके।
अदालत ने ये भी कहा कि सभी सामग्री प्राप्त करना या साक्ष्य जुटाना जांच अधिकारी की जिम्मेदारी थी। हालांकि जिस बोतल में बुलेट से मिले लैड की हेराफेरी से इनकार नहीं किया जा सकता। इसके अलावा उसने झगड़े वाली सीसीटीवी फुटेज व आरोपी जाकिर तथा गवाह शेर खान मलिक के बीच बातचीत की सीडी को को फोरेंसिक जांच के लिए भी नहीं भेजा था और न उनकी आवाज के नमूने लिए। वहीं चश्मदीद यामीन व उसका बेटा भी अपने बयान से पलट गए और आरोपियों को पहचाना तक नहीं। - एजेंसी
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कड़कड़डूमा अदालत के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश विनोद यादव ने मामले में आरोपी आस मोहम्मद, राजेश कुमार, शहजाद अहमद, मोहम्मद रिहान, एजाज, हनीफुद्दीन, जाकिर हुसैन, इमरान, मोहम्मद फरमान, आलम खान, परवेज तथा इमरान को हत्या, दंगा करने, भीड़ जमा करने, आपराधिक साजिश तथा शस्त्र अधिनियम के आरोपों से साक्ष्यों के अभाव में बरी कर दिया।
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अभियोजन के अनुसार फरवरी 2015 में दिल्ली विधानसभा चुनाव में 10-12 लड़कों ने खजूरी खास इलाके में हाजी यामीन के घर को घेर लिया था। इनमें से कुछ के पास पिस्टल थीं। यामीन आम आदमी पार्टी का एजेंट था। फर्जी वोट डालने को लेकर उसकी आरोपी हनीफुद्दीन से बहस हुई थी। इस भीड़ ने यामीन के घर जाकर गाली गलौज के बाद अंधाधुंध फायरिंग की थी जिसमें शुख्रा बेगम नामक महिला की गोली लगने से मौत हो गई थी।
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अदालत ने इस बात पर गौर किया कि शव का पोस्ट मार्टम करने वाले डॉक्टर ने बुलेट समेत सारी जब्त सामग्री आठ फरवरी को जांच अधिकारी दी थी लेकिन पुलिस के सीजर मेमो के अनुसार उसे वह बुलेट शवगृह से 19 फरवरी को मिली थी।
अदालत ने अभियोजन के गवाह एएसआई उमेश सिंह के बयान को सही मानते हुए कहा कि ये साफ है कि जांच अधिकारी सांवर मल ने 19 फरवरी 2015 को शवगृह पर कोई तफतीश नहीं की थी बल्कि उसने तारीख में फेरबदल कर उसे आठ से 19 फरवरी कर दिया था ताकि मृतका के माथे से मिले बुलेट को दूसरी बुलेट से बदला जा सके और उस पिस्टल की बरामदगी आरोपी राजेश से दिखाई जा सके।
अदालत ने ये भी कहा कि सभी सामग्री प्राप्त करना या साक्ष्य जुटाना जांच अधिकारी की जिम्मेदारी थी। हालांकि जिस बोतल में बुलेट से मिले लैड की हेराफेरी से इनकार नहीं किया जा सकता। इसके अलावा उसने झगड़े वाली सीसीटीवी फुटेज व आरोपी जाकिर तथा गवाह शेर खान मलिक के बीच बातचीत की सीडी को को फोरेंसिक जांच के लिए भी नहीं भेजा था और न उनकी आवाज के नमूने लिए। वहीं चश्मदीद यामीन व उसका बेटा भी अपने बयान से पलट गए और आरोपियों को पहचाना तक नहीं। - एजेंसी