{"_id":"5c0600f0bdec2241742bd865","slug":"154389737120-ashram-news","type":"story","status":"publish","title_hn":"हाईकोर्ट ने कैदियों के वेतन कटौती पर लगाई रोक","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
हाईकोर्ट ने कैदियों के वेतन कटौती पर लगाई रोक
Updated Tue, 04 Dec 2018 09:55 AM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
हाईकोर्ट ने कैदियों के वेतन कटौती पर लगाई रोक
जेल प्रशासन फंड के लिये काटता है कैदियों का वेतन
अमर उजाला ब्यूरो
नई दिल्ली। हाईकोर्ट ने तिहाड़ जेल में बंद कैदियों के वेतन का 25 फीसदी पीड़ित मुआवजा योजना के लिए काटे जाने पर रोक लगा दी है। सरकार की अगस्त 2006 की अधिसूचना व दिल्ली प्रिजन रूल्स 1988 के अंतर्गत यह कटौती की जाती है। एक महिला कैदी ने जनहित याचिका दायर कर इस नियम को चुनौती दी है।
मुख्य न्यायाधीश राजेंद्र मेनन व न्यायमूर्ति वीके राव ने इस नियम पर रोक लगाते हुए सुनवाई के लिए आठ फरवरी 2019 की तारीख तय की है। यह जनहित याचिका कात्यायिनी ने अधिवक्ता अजय वर्मा के जरिये दायर की है। सरकार के इस नियम का दिल्ली विधिक सेवा प्राधिकरण ने भी विरोध करते हुए कहा है कि यह कटौती करना बेहद गलत है, क्योंकि इसके लिए दिल्ली सरकार ने पीड़ितों के लिए फंड बनाया है। इस तरह की कटौती करने का कोई प्रावधान नहीं है। हालांकि 2009 में पीड़ितों को मुआवजा देने के लिये योजना बनाई गई थी।
प्राधिकरण ने यह भी कहा कि कैदियों के वेतन में से काटी गई राशि का 14 करोड़ रुपये जेल प्रशासन के पास है। इस राशि को पीड़ितों के लिए बने फंड में ट्रांसफर किया जा सकता था।
विज्ञापन
पेश जनहित याचिका में कहा गया है कि 2006 से अब तक कैदियों के वेतन से काटी गई राशि के 15 करोड़ रुपये जेल प्रशासन के पास है। इसमें से केवल 80.73 लाख रुपये ही 194 पीड़ितों को मुआवजे के तौर पर दिये गये हैं। इसके बाद भी शेष धन राशि 14 करोड़ का कोई इस्तेमाल नहीं हुआ है।
विज्ञापन
जेल प्रशासन फंड के लिये काटता है कैदियों का वेतन
अमर उजाला ब्यूरो
नई दिल्ली। हाईकोर्ट ने तिहाड़ जेल में बंद कैदियों के वेतन का 25 फीसदी पीड़ित मुआवजा योजना के लिए काटे जाने पर रोक लगा दी है। सरकार की अगस्त 2006 की अधिसूचना व दिल्ली प्रिजन रूल्स 1988 के अंतर्गत यह कटौती की जाती है। एक महिला कैदी ने जनहित याचिका दायर कर इस नियम को चुनौती दी है।
मुख्य न्यायाधीश राजेंद्र मेनन व न्यायमूर्ति वीके राव ने इस नियम पर रोक लगाते हुए सुनवाई के लिए आठ फरवरी 2019 की तारीख तय की है। यह जनहित याचिका कात्यायिनी ने अधिवक्ता अजय वर्मा के जरिये दायर की है। सरकार के इस नियम का दिल्ली विधिक सेवा प्राधिकरण ने भी विरोध करते हुए कहा है कि यह कटौती करना बेहद गलत है, क्योंकि इसके लिए दिल्ली सरकार ने पीड़ितों के लिए फंड बनाया है। इस तरह की कटौती करने का कोई प्रावधान नहीं है। हालांकि 2009 में पीड़ितों को मुआवजा देने के लिये योजना बनाई गई थी।
विज्ञापन
प्राधिकरण ने यह भी कहा कि कैदियों के वेतन में से काटी गई राशि का 14 करोड़ रुपये जेल प्रशासन के पास है। इस राशि को पीड़ितों के लिए बने फंड में ट्रांसफर किया जा सकता था।
विज्ञापन
पेश जनहित याचिका में कहा गया है कि 2006 से अब तक कैदियों के वेतन से काटी गई राशि के 15 करोड़ रुपये जेल प्रशासन के पास है। इसमें से केवल 80.73 लाख रुपये ही 194 पीड़ितों को मुआवजे के तौर पर दिये गये हैं। इसके बाद भी शेष धन राशि 14 करोड़ का कोई इस्तेमाल नहीं हुआ है।