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एक साल में कान के पीछे टूट गई पिन, बच्चा हुआ बहरा
Updated Wed, 28 Nov 2018 07:11 AM IST
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एक साल में कान के पीछे टूट गई पिन, बच्चा हुआ बहरा
- 2017 में आरएमएल में बच्चे का लगा था इम्प्लांट
- 3 साल की गारंटी देने के बाद अब नियमों में फंसाया
- डॉक्टरों ने भी काटी कन्नी, हाईकोर्ट पहुंचा पीड़ित पिता
अमर उजाला ब्यूरो
नई दिल्ली। उम्र 06 वर्ष, नाम शिवानी साहू। न आवाज सुन सकती है और न ही किसी तरह की कोई आहट। 100 फीसदी बधिर शिवानी इनदिनों अपने लाचार पिता के साथ केंद्र सरकार के डॉ. राम मनोहर लोहिया अस्पताल में चक्कर काट रही है। डॉक्टरों और बहुराष्ट्रीय इम्प्लांट कंपनियों की शिकार इस बच्ची को वर्ष एक इम्प्लांट लगाया गया था, जिसकी पिन महज एक साल में टूटने के कारण शिवानी फिर से बधिर हो गई है। अब डॉक्टरों का कहना है कि इसमें कंपनी का दोष है। जबकि कंपनी का कहना है कि पिन टूटने की कोई गारंटी नहीं है। पिता की मानें तो जब इम्प्लांट डाला गया था तो कंपनी ने तीन वर्ष की गारंटी और डॉक्टरों ने इसे सबसे बढ़िया बताया था। अब हर कोई उनकी बच्ची को न्याय दिलाने से कन्नी काट रहा है। आखिर में शिवानी और उसके पिता ने दिल्ली हाईकोर्ट जाने का फैसला लिया है।
दिल्ली के मंगोलपुर निवासी अजय साहू बताते हैं कि पेशे से वह मजदूर हैं और झारखंड के रहने वाले हैं। उनकी तीन बेटियां हैं, जिनमें से एक शिवानी बचपन से बधिर है। सरकार से मन्नते करने के बाद करीब 6 लाख रुपये की सरकारी मदद पर उन्होंने आरएमएल अस्पताल में 27 अप्रैल 2017 को कॉक्लियर इम्प्लांट डलवा। कान के पीछे लगने वाली इस मशीन में लगे बटन को ऑन-ऑफ करके इस्तेमाल में लाया जाता है। अजय के अनुसार करीब एक वर्ष मशीन ने ठीक कार्य किया और बंद हो गई। इसके कारण बच्ची भी उनकी बधिर फिर से हो गई। अब वे करीब साढ़े तीन माह से अस्पताल के चक्कर लगा रहे हैं, लेकिन डॉक्टरों का कहना है कि इसमें कोई मदद नहीं कर सकते। निदेशक के नाम पत्र लिख दो, देखते हैं क्या मदद हो सकती है।
इम्प्लांट बदलने का नहीं है कोई नियम
आरएमएल अस्पताल के एक वरिष्ठ डॉक्टर का कहना है कि बेशक ये दुर्भाग्य है कि देश में इम्प्लांट डालने के लिए सरकार मदद करती हो, लेकिन जब यही इम्प्लांट फेल होता है तो इसके रिप्लेसमेंट को लेकर मदद का कोई प्रावधान नहीं है। उन्होंने कहा कि इम्प्लांट आमतौर पर एक मशीन है। इसमें खराबी हो सकती है। वहीं, एम्स के वरिष्ठ डॉ. सीएस यादव की मानें तो देश में इम्प्लांट की स्थिति इस समय चिंताजनक है। उनके यहां करीब 20 से 25 फीसदी मरीज इसी तरह की शिकायत लेकर पहुंच रहे हैं, जिन्हें इम्प्लांट या तो गलत तरीके से हुआ है। या फिर इम्प्लांट की गुणवत्ता ही खराब है। ऐसे मरीजों को दोबारा ऑपरेशन और खर्च के साथ साथ परेशानी से गुजरना पड़ रहा है।
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बॉक्स : कंपनी से मांगा है जवाब, कोर्ट से दिलाएंगे न्याय
इस मामले में दिल्ली ईडब्ल्यूएस कमेटी के सदस्य वरिष्ठ एडवोकेट अशोक अग्रवाल का कहना है कि शिवानी जैसी देश में हजारों बच्चियां है जो इनदिनों इस तरह की धोखाधड़ी की शिकार हैं। न इनकी डॉक्टर सुनता है और न ही इम्प्लांट बेचने वाली कंपनी। सरकार भी इसके खिलाफ रोक लगाने में नाकामयाब है। इसलिए उन्होंने कंपनी से जवाब मांगा है। जल्द ही कोर्ट से पीड़ित को न्याय दिलाएंगे।
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- 2017 में आरएमएल में बच्चे का लगा था इम्प्लांट
- 3 साल की गारंटी देने के बाद अब नियमों में फंसाया
- डॉक्टरों ने भी काटी कन्नी, हाईकोर्ट पहुंचा पीड़ित पिता
अमर उजाला ब्यूरो
नई दिल्ली। उम्र 06 वर्ष, नाम शिवानी साहू। न आवाज सुन सकती है और न ही किसी तरह की कोई आहट। 100 फीसदी बधिर शिवानी इनदिनों अपने लाचार पिता के साथ केंद्र सरकार के डॉ. राम मनोहर लोहिया अस्पताल में चक्कर काट रही है। डॉक्टरों और बहुराष्ट्रीय इम्प्लांट कंपनियों की शिकार इस बच्ची को वर्ष एक इम्प्लांट लगाया गया था, जिसकी पिन महज एक साल में टूटने के कारण शिवानी फिर से बधिर हो गई है। अब डॉक्टरों का कहना है कि इसमें कंपनी का दोष है। जबकि कंपनी का कहना है कि पिन टूटने की कोई गारंटी नहीं है। पिता की मानें तो जब इम्प्लांट डाला गया था तो कंपनी ने तीन वर्ष की गारंटी और डॉक्टरों ने इसे सबसे बढ़िया बताया था। अब हर कोई उनकी बच्ची को न्याय दिलाने से कन्नी काट रहा है। आखिर में शिवानी और उसके पिता ने दिल्ली हाईकोर्ट जाने का फैसला लिया है।
दिल्ली के मंगोलपुर निवासी अजय साहू बताते हैं कि पेशे से वह मजदूर हैं और झारखंड के रहने वाले हैं। उनकी तीन बेटियां हैं, जिनमें से एक शिवानी बचपन से बधिर है। सरकार से मन्नते करने के बाद करीब 6 लाख रुपये की सरकारी मदद पर उन्होंने आरएमएल अस्पताल में 27 अप्रैल 2017 को कॉक्लियर इम्प्लांट डलवा। कान के पीछे लगने वाली इस मशीन में लगे बटन को ऑन-ऑफ करके इस्तेमाल में लाया जाता है। अजय के अनुसार करीब एक वर्ष मशीन ने ठीक कार्य किया और बंद हो गई। इसके कारण बच्ची भी उनकी बधिर फिर से हो गई। अब वे करीब साढ़े तीन माह से अस्पताल के चक्कर लगा रहे हैं, लेकिन डॉक्टरों का कहना है कि इसमें कोई मदद नहीं कर सकते। निदेशक के नाम पत्र लिख दो, देखते हैं क्या मदद हो सकती है।
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इम्प्लांट बदलने का नहीं है कोई नियम
आरएमएल अस्पताल के एक वरिष्ठ डॉक्टर का कहना है कि बेशक ये दुर्भाग्य है कि देश में इम्प्लांट डालने के लिए सरकार मदद करती हो, लेकिन जब यही इम्प्लांट फेल होता है तो इसके रिप्लेसमेंट को लेकर मदद का कोई प्रावधान नहीं है। उन्होंने कहा कि इम्प्लांट आमतौर पर एक मशीन है। इसमें खराबी हो सकती है। वहीं, एम्स के वरिष्ठ डॉ. सीएस यादव की मानें तो देश में इम्प्लांट की स्थिति इस समय चिंताजनक है। उनके यहां करीब 20 से 25 फीसदी मरीज इसी तरह की शिकायत लेकर पहुंच रहे हैं, जिन्हें इम्प्लांट या तो गलत तरीके से हुआ है। या फिर इम्प्लांट की गुणवत्ता ही खराब है। ऐसे मरीजों को दोबारा ऑपरेशन और खर्च के साथ साथ परेशानी से गुजरना पड़ रहा है।
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बॉक्स : कंपनी से मांगा है जवाब, कोर्ट से दिलाएंगे न्याय
इस मामले में दिल्ली ईडब्ल्यूएस कमेटी के सदस्य वरिष्ठ एडवोकेट अशोक अग्रवाल का कहना है कि शिवानी जैसी देश में हजारों बच्चियां है जो इनदिनों इस तरह की धोखाधड़ी की शिकार हैं। न इनकी डॉक्टर सुनता है और न ही इम्प्लांट बेचने वाली कंपनी। सरकार भी इसके खिलाफ रोक लगाने में नाकामयाब है। इसलिए उन्होंने कंपनी से जवाब मांगा है। जल्द ही कोर्ट से पीड़ित को न्याय दिलाएंगे।