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रद्दीकरण रिपोर्ट के बाद भी मजिस्ट्रेट के समन आदेश को चुनौती दी जा सकती है : हाईकोर्ट
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मजिस्ट्रेट ने पुलिस की रद्दीकरण रिपोर्ट के बावजूद आरोपी के खिलाफ शुरू कर दी थी कार्रवाई
संवाद न्यूज एजेंसी
नई दिल्ली। हाईकोर्ट ने एक अहम फैसला सुनाते हुए कहा कि अगर पुलिस किसी मामले में रद्दीकरण रिपोर्ट दाखिल कर देती है। इसके बावजूद मजिस्ट्रेट आरोपी को तलब करने (समन भेजने) का आदेश देता है, तो इस आदेश को सत्र न्यायालय या हाईकोर्ट में चुनौती दी जा सकती है।
न्यायमूर्ति स्वर्णकांत शर्मा ने अपने फैसले में कहा कि मजिस्ट्रेट द्वारा समन जारी करना कोई साधारण या पूरी तरह अंतरिम आदेश नहीं होता। यह एक ऐसा आदेश होता है जिससे आरोपी के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही शुरू हो जाती है और इसका उस पर गंभीर असर पड़ता है। इसलिए, ऐसे आदेश को दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 397 के तहत पुनरीक्षण के माध्यम से चुनौती दी जा सकती है।
यह फैसला एक ऐसे मामले में आया, जहां शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया था कि मजिस्ट्रेट ने पुलिस की रद्दीकरण रिपोर्ट के बावजूद आरोपी के खिलाफ कार्रवाई शुरू कर दी थी। पुलिस ने अपनी रिपोर्ट में कहा था कि शिकायत में लगे आरोपों की पुष्टि के लिए कोई ठोस सबूत नहीं मिले।
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इसके बावजूद मजिस्ट्रेट ने आरोपी को समन भेज दिया। हाईकोर्ट ने कहा कि भले ही पुलिस को आरोपी के खिलाफ कोई सबूत न मिले हों, लेकिन अगर मजिस्ट्रेट को शिकायत में कुछ दम नजर आता है, तो वह संज्ञान लेकर समन जारी कर सकता है। लेकिन ऐसा आदेश आरोपी के अधिकारों को सीधे तौर पर प्रभावित करता है, इसलिए उसे उच्च न्यायालय या सत्र न्यायालय में चुनौती दी जा सकती है।
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संवाद न्यूज एजेंसी
नई दिल्ली। हाईकोर्ट ने एक अहम फैसला सुनाते हुए कहा कि अगर पुलिस किसी मामले में रद्दीकरण रिपोर्ट दाखिल कर देती है। इसके बावजूद मजिस्ट्रेट आरोपी को तलब करने (समन भेजने) का आदेश देता है, तो इस आदेश को सत्र न्यायालय या हाईकोर्ट में चुनौती दी जा सकती है।
न्यायमूर्ति स्वर्णकांत शर्मा ने अपने फैसले में कहा कि मजिस्ट्रेट द्वारा समन जारी करना कोई साधारण या पूरी तरह अंतरिम आदेश नहीं होता। यह एक ऐसा आदेश होता है जिससे आरोपी के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही शुरू हो जाती है और इसका उस पर गंभीर असर पड़ता है। इसलिए, ऐसे आदेश को दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 397 के तहत पुनरीक्षण के माध्यम से चुनौती दी जा सकती है।
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यह फैसला एक ऐसे मामले में आया, जहां शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया था कि मजिस्ट्रेट ने पुलिस की रद्दीकरण रिपोर्ट के बावजूद आरोपी के खिलाफ कार्रवाई शुरू कर दी थी। पुलिस ने अपनी रिपोर्ट में कहा था कि शिकायत में लगे आरोपों की पुष्टि के लिए कोई ठोस सबूत नहीं मिले।
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इसके बावजूद मजिस्ट्रेट ने आरोपी को समन भेज दिया। हाईकोर्ट ने कहा कि भले ही पुलिस को आरोपी के खिलाफ कोई सबूत न मिले हों, लेकिन अगर मजिस्ट्रेट को शिकायत में कुछ दम नजर आता है, तो वह संज्ञान लेकर समन जारी कर सकता है। लेकिन ऐसा आदेश आरोपी के अधिकारों को सीधे तौर पर प्रभावित करता है, इसलिए उसे उच्च न्यायालय या सत्र न्यायालय में चुनौती दी जा सकती है।