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अंतरराष्ट्रीय सांकेतिक भाषा दिवस: हौसलों से कामयाबी की कहानी लिख रहे दिव्यांग
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-कहीं हाथों के इशारों से बच्चों की पढ़ाई, कहीं बिना देखे कैफे चला रहीं बेटियां
-आवाज नहीं सुनाई देती, फिर भी सपनों की उड़ान नहीं रुकी
सचिन कुमार
नई दिल्ली। अंतरराष्ट्रीय सांकेतिक भाषा दिवस के अवसर पर बधिर और दृष्टिबाधित व्यक्तियों के असाधारण हौसले की कहानियां सामने आई हैं। ये लोग अपनी चुनौतियों के बावजूद शिक्षा और रोजगार के क्षेत्र में कामयाबी की नई इबारत लिख रहे हैं। सांकेतिक भाषा और विशेष प्रशिक्षण के माध्यम से वे अपने सपनों को साकार कर रहे हैं।
कक्षाओं में शिक्षक हाथों के इशारों से बधिर बच्चों को पढ़ाते हैं। बच्चे भी इसी भाषा में जवाब देते हैं। विशेष शिक्षक गुलअफशा करीब 2018 से बधिर बच्चों को पढ़ा रही हैं। वह बताती हैं कि बच्चों को संकेतों से पढ़ाना आसान नहीं होता। उन्हें ऐसे दोस्त मिलने में भी दिक्कत होती है जो उनकी भाषा समझ सकें। विशेष शिक्षक मोहम्मद आरिब ने कहा कि बधिर और दृष्टिबाधित बच्चों को समाज के साथ की सबसे ज्यादा जरूरत है। उन्हें पढ़ाई, नौकरी और खेल के बराबर मौके मिलने चाहिए।
सांकेतिक भाषा से शिक्षा और आत्मविश्वास
विशेष शिक्षकों का कहना है कि सांकेतिक भाषा बच्चों के लिए सिर्फ बातचीत का तरीका नहीं है। यह उनके लिए पढ़ाई समझने का सबसे आसान जरिया है। जब शिक्षक उनकी भाषा में बात करते हैं तो बच्चों का आत्मविश्वास बढ़ता है। वे सवाल पूछने में भी नहीं झिझकते। हालांकि, स्कूल के बाहर परिवार और आसपास के लोगों को सांकेतिक भाषा न आने से दिक्कत होती है।
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दृष्टिबाधित युवाओं के लिए रोजगार के अवसर
आरके पुरम में कैफे बियॉन्ड आइज इसका एक उदाहरण है, जहां करीब 15 दृष्टिबाधित लड़कियां काम करती हैं। वे छूकर, सूंघकर और स्वाद से चीजों को पहचानकर खाना तैयार करती हैं। कैफे की निदेशक भावना सहाय ने बताया कि करीब 60 दिव्यांग लोगों को प्रशिक्षण देकर रोजगार दिया गया है। पुष्पा, जो आंशिक रूप से बधिर और दृष्टिबाधित हैं, इस कैफे में काम करके आत्मनिर्भर बन रही हैं।
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-आवाज नहीं सुनाई देती, फिर भी सपनों की उड़ान नहीं रुकी
सचिन कुमार
नई दिल्ली। अंतरराष्ट्रीय सांकेतिक भाषा दिवस के अवसर पर बधिर और दृष्टिबाधित व्यक्तियों के असाधारण हौसले की कहानियां सामने आई हैं। ये लोग अपनी चुनौतियों के बावजूद शिक्षा और रोजगार के क्षेत्र में कामयाबी की नई इबारत लिख रहे हैं। सांकेतिक भाषा और विशेष प्रशिक्षण के माध्यम से वे अपने सपनों को साकार कर रहे हैं।
कक्षाओं में शिक्षक हाथों के इशारों से बधिर बच्चों को पढ़ाते हैं। बच्चे भी इसी भाषा में जवाब देते हैं। विशेष शिक्षक गुलअफशा करीब 2018 से बधिर बच्चों को पढ़ा रही हैं। वह बताती हैं कि बच्चों को संकेतों से पढ़ाना आसान नहीं होता। उन्हें ऐसे दोस्त मिलने में भी दिक्कत होती है जो उनकी भाषा समझ सकें। विशेष शिक्षक मोहम्मद आरिब ने कहा कि बधिर और दृष्टिबाधित बच्चों को समाज के साथ की सबसे ज्यादा जरूरत है। उन्हें पढ़ाई, नौकरी और खेल के बराबर मौके मिलने चाहिए।
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सांकेतिक भाषा से शिक्षा और आत्मविश्वास
विशेष शिक्षकों का कहना है कि सांकेतिक भाषा बच्चों के लिए सिर्फ बातचीत का तरीका नहीं है। यह उनके लिए पढ़ाई समझने का सबसे आसान जरिया है। जब शिक्षक उनकी भाषा में बात करते हैं तो बच्चों का आत्मविश्वास बढ़ता है। वे सवाल पूछने में भी नहीं झिझकते। हालांकि, स्कूल के बाहर परिवार और आसपास के लोगों को सांकेतिक भाषा न आने से दिक्कत होती है।
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दृष्टिबाधित युवाओं के लिए रोजगार के अवसर
आरके पुरम में कैफे बियॉन्ड आइज इसका एक उदाहरण है, जहां करीब 15 दृष्टिबाधित लड़कियां काम करती हैं। वे छूकर, सूंघकर और स्वाद से चीजों को पहचानकर खाना तैयार करती हैं। कैफे की निदेशक भावना सहाय ने बताया कि करीब 60 दिव्यांग लोगों को प्रशिक्षण देकर रोजगार दिया गया है। पुष्पा, जो आंशिक रूप से बधिर और दृष्टिबाधित हैं, इस कैफे में काम करके आत्मनिर्भर बन रही हैं।