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चेतना और ज्ञान की निरंतर प्रवाहित होने वाली धारा है भारत : जगदीप धनखड़
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- उपराष्ट्रपति ने जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में भारतीय ज्ञान परंपरा पर आधारित तीन दिवसीय अकादमिक सम्मेलन का किया उद्घाटन
अमर उजाला ब्यूरो
नई दिल्ली। भारत केवल राजनीतिक संरचना नहीं है। यह चेतना, जिज्ञासा और ज्ञान की निरंतर प्रवाहित होने वाली धारा है। इसका निर्माण 20 वीं सदी के मध्य में नहीं हुआ। यह सहस्राब्दियों से चली आ रही है। किसी राष्ट्र की ताकत उसके विचारों की मौलिकता, और बौद्धिक परंपराओं की दृढ़ता में होती है। यह बातें उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में भारतीय ज्ञान परंपरा पर आधारित तीन दिवसीय अकादमिक सम्मेलन को संबोधित करते हुए कही। उपराष्ट्रपति ने हल्के अंदाज में कहा कि उनका कार्यकाल 2027 में खत्म हो रहा है। अगर ईश्वर की इच्छा रही तो सही समय में सेवानिवृत्त हो जाऊंगा।
जेएनयू में बृहस्पतिवार को भारतीय ज्ञान परंपरा पर प्रथम वार्षिक अकादमिक सम्मेलन का उद्घाटन उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़, केंद्रीय आयुष मंत्री सर्बानंद सोनोवाल, जेएनयू की कुलपति प्रो. शांतिश्री धूलिपूड़ी पंडित और आईकेएसएचए के निदेशक प्रो एमएम चैत्रा ने किया। इस अवसर पर उपराष्ट्रपति ने कहा कि भारत का वैश्विक शक्ति के रूप में उदय तभी सार्थक होगा जब उसके साथ उसकी बौद्धिक और सांस्कृतिक गरिमा का उत्थान भी हो। उन्होंने कहा कि भारत युगों में फलता-फूलता है, युगों में जीता है। भारत वेदों और उपनिषदों के उच्चारण से श्वास लेता है, पाणिनि के जटिल सूत्रों के माध्यम से बोलता है, आर्यभट्ट की सटीकता से गणना करता है और कौटिल्य के विवेक, धैर्य तथा बुद्धिमत्ता से शासन करता है।
उपराष्ट्रपति ने कहा कि यूरोप के विश्वविद्यालयों के अस्तित्व में आने से बहुत पहले ही भारतीय विश्वविद्यालयों ने अपनी उपस्थिति दर्ज करा दी थी। भारत में बहुत पहले ही शिक्षा के समृद्ध केंद्र स्थापित हो चुके थे। उन्होंने कहा कि भारत को केवल अतीत की धरोहर के रूप में नहीं बल्कि एक जीवंत सभ्यता के रूप में देखा जाना चाहिए।
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इस अवसर पर केंद्रीय मंत्री सर्बानंद सोनोवाल ने कहा कि भारत की प्राचीन ज्ञान परंपराएं वैश्विक मंच पर पुन: प्रतिष्ठित हो रही हैं। योग, आयुर्वेद और पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियां आज वैश्विक कल्याण और कूटनीति की सशक्त माध्यम बन चुकी है। यह सम्मेलन न केवल भारतीय बौद्धिक विरासत को पुन: जागृत करने का प्रयास है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों को हमारी सांस्कृतिक और वैज्ञानिक समृद्धि को जोड़ने की दिशा में ऐतिहासिक कदम है। सम्मेलन में देशभर से आए विद्वान और बुद्धिजीवी अपने शोध पत्र प्रस्तुत पर विविध विषयों पर विचार-विमर्श करेंगे। अहम है कि जेएनयू तथा भारतीय ज्ञान परंपरा धरोहर गठबंधन के सहयोग से आयुष मंत्रालय, भारतीय सामाजिक विज्ञान अनुसंधान परिषद, भारतीय ऐतिहासिक अनुसंधान परिषद तथा भारतीय दार्शनिक अनुसंधान परिषद के तत्वाधान में आयोजित किया जा रहा है।
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अमर उजाला ब्यूरो
नई दिल्ली। भारत केवल राजनीतिक संरचना नहीं है। यह चेतना, जिज्ञासा और ज्ञान की निरंतर प्रवाहित होने वाली धारा है। इसका निर्माण 20 वीं सदी के मध्य में नहीं हुआ। यह सहस्राब्दियों से चली आ रही है। किसी राष्ट्र की ताकत उसके विचारों की मौलिकता, और बौद्धिक परंपराओं की दृढ़ता में होती है। यह बातें उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में भारतीय ज्ञान परंपरा पर आधारित तीन दिवसीय अकादमिक सम्मेलन को संबोधित करते हुए कही। उपराष्ट्रपति ने हल्के अंदाज में कहा कि उनका कार्यकाल 2027 में खत्म हो रहा है। अगर ईश्वर की इच्छा रही तो सही समय में सेवानिवृत्त हो जाऊंगा।
जेएनयू में बृहस्पतिवार को भारतीय ज्ञान परंपरा पर प्रथम वार्षिक अकादमिक सम्मेलन का उद्घाटन उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़, केंद्रीय आयुष मंत्री सर्बानंद सोनोवाल, जेएनयू की कुलपति प्रो. शांतिश्री धूलिपूड़ी पंडित और आईकेएसएचए के निदेशक प्रो एमएम चैत्रा ने किया। इस अवसर पर उपराष्ट्रपति ने कहा कि भारत का वैश्विक शक्ति के रूप में उदय तभी सार्थक होगा जब उसके साथ उसकी बौद्धिक और सांस्कृतिक गरिमा का उत्थान भी हो। उन्होंने कहा कि भारत युगों में फलता-फूलता है, युगों में जीता है। भारत वेदों और उपनिषदों के उच्चारण से श्वास लेता है, पाणिनि के जटिल सूत्रों के माध्यम से बोलता है, आर्यभट्ट की सटीकता से गणना करता है और कौटिल्य के विवेक, धैर्य तथा बुद्धिमत्ता से शासन करता है।
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उपराष्ट्रपति ने कहा कि यूरोप के विश्वविद्यालयों के अस्तित्व में आने से बहुत पहले ही भारतीय विश्वविद्यालयों ने अपनी उपस्थिति दर्ज करा दी थी। भारत में बहुत पहले ही शिक्षा के समृद्ध केंद्र स्थापित हो चुके थे। उन्होंने कहा कि भारत को केवल अतीत की धरोहर के रूप में नहीं बल्कि एक जीवंत सभ्यता के रूप में देखा जाना चाहिए।
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इस अवसर पर केंद्रीय मंत्री सर्बानंद सोनोवाल ने कहा कि भारत की प्राचीन ज्ञान परंपराएं वैश्विक मंच पर पुन: प्रतिष्ठित हो रही हैं। योग, आयुर्वेद और पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियां आज वैश्विक कल्याण और कूटनीति की सशक्त माध्यम बन चुकी है। यह सम्मेलन न केवल भारतीय बौद्धिक विरासत को पुन: जागृत करने का प्रयास है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों को हमारी सांस्कृतिक और वैज्ञानिक समृद्धि को जोड़ने की दिशा में ऐतिहासिक कदम है। सम्मेलन में देशभर से आए विद्वान और बुद्धिजीवी अपने शोध पत्र प्रस्तुत पर विविध विषयों पर विचार-विमर्श करेंगे। अहम है कि जेएनयू तथा भारतीय ज्ञान परंपरा धरोहर गठबंधन के सहयोग से आयुष मंत्रालय, भारतीय सामाजिक विज्ञान अनुसंधान परिषद, भारतीय ऐतिहासिक अनुसंधान परिषद तथा भारतीय दार्शनिक अनुसंधान परिषद के तत्वाधान में आयोजित किया जा रहा है।