भारत की पहली कोरोना मरीज में 17 दिन तक सक्रिय रहा था कोरोना वायरस, शोध में हुए कई खुलासे
- केरल के डॉक्टरों ने पहली मरीज पर किए शोध का किया खुलासा
- सबसे पहले वायरस ने मरीज की श्वेत रक्त कोशिकाओं को बनाया था शिकार
- 23 दिन बाद छात्रा को किया था डिस्चार्ज, चीन में एक ट्रेन यात्रा में आई थी संपर्क में
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भारत में कोरोना वायरस के चार महीने पूरे हो चुके हैं। 30 जनवरी को देश का जो पहला मरीज कोरोना वायरस से संक्रमित मिला था उसमें 17 दिन तक वायरस सक्रिय रहा था। यह 20 वर्षीय छात्रा 23 जनवरी को वुहान से लौट कर आई थी और तीन दिन बाद ही लक्षण सामने आने लगे थे।
केरल के डॉक्टरों ने देश के पहले कोविड मरीज की केस स्टडी का खुलासा करते हुए बताया कि इस छात्रा के शरीर में कोरोना वायरस ने सबसे पहले श्वेत रक्त कोशिकाओं को शिकार बनाया था।
23 दिन तक चिकित्सीय निगरानी में रहते हुए करीब 10 से 12 बार छात्रा की कोरोना जांच भी की गई लेकिन शुरूआती 17 दिन (नौ बार) उसके गले से सैंपल लेकर जांच करने में कोरोना वायरस सक्रिय ही मिला।
इंडियन जर्नल ऑफ मेडिकल रिसर्च (आईजेएमआर) में प्रकाशित इस केस स्टडी में त्रिशूर सरकारी मेडिकल कॉलेज के छह विभागों ने मिलकर तैयार किया है। इसमें बकायदा छात्रा की क्लीनिकल लैबोरेटरी स्टडी भी साझा की गई है जिसमें वायरस की पुष्टि होने के ठीक एक दिन बाद उसके शरीर में श्वेत रक्त कोशिकाओं की संख्या 5300 थी।
रक्त में पाई जाने वाली श्वेत और लाल रक्त कणिकाएं शरीर को स्वस्थ रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। यदि इनकी कमी होती है तो शरीर में कई जानलेवा बीमारियां घर कर जाती हैं। श्वेत रक्त कोशिकायें शरीर की संक्रामक रोगों और बाह्य पदार्थों से रक्षा करने वाली प्रतिरक्षा प्रणाली की कोशिकायें हैं।
वह वुहान के सीफूड होलसेल मार्केट में नहीं गई थीं
इनके अलावा मरीज के भर्ती होने के सातवें दिन उसकी ईएसआर दर सबसे ज्यादा देखने को मिली थी। ईएसआर एक रक्त जांच है जिससे यह पता लगाया जाता है कि मरीज को किसी भी प्रकार की क्रोनिक इंफ्लेमेटरी स्थिति है अथवा नहीं।
मेडिसिन विभाग के डॉ. केआर राजेश ने बताया कि 20 वर्षीय छात्रा वुहान से भारत लौटी थी। 23 जनवरी को आने के बाद उसे 27 जनवरी की सुबह गले में दर्द और कफ की शिकायत होने लगी थी।
चूंकि यात्रा पूरी होते वक्त ही छात्रा को जिला सर्विलांस टीम के फोन नंबर उपलब्ध करा दिए गए थे। इसके चलते छात्रा समय पर चिकित्सीय निगरानी में आ गईं। उन्होंने बताया कि वुहान के सीफूड होलसेल मार्केट में वह नहीं गई थीं। वह ट्रेन के जरिए वुहान से कुनमिंग जा रही थीं। उसी बीच उन्होंने ट्रेन में कई लोगों को सांस में तकलीफ की परेशानी के साथ देखा था।
सामान्य अस्पताल के आपातकालीन वार्ड में जब छात्रा भर्ती हुई उस वक्त उनकी पल्स 82/प्रति मिनट, ब्लडप्रेशर 130/80 एमएमएचजी, तापमान 98.5, ऑक्सीजन सेचुरेशन 96 फीसदी थी। सांस लेने में कोई दिक्कत नहीं थी। न ही उसे बुखार था।
शुरूआत में छात्रा के शरीर में श्वेत रक्त कोशिकाओं की संख्या एकदम से गिरने लगी थी लेकिन इसके बाद चिकित्सीय निगरानी में जब तीन टीमें 24 घंटे देखभाल करती रहीं तो पांचवें और 20वें दिन में कोशिकाओं में सुधार होने लगा।
हर दिन था चुनौतियों से भरा
नई जानकारी कुछ थी नहीं और पुराने अनुभव एक के बाद एक फेल हो रहे थे। हालांकि धैर्य रखते हुए सख्त निगरानी ने फायदा दिया। अस्पताल में भर्ती होने के 19वें दिन जाकर उस वक्त खुशी लौटी जब छात्रा की पहली निगेटिव रिपोर्ट हाथ लगी। उससे पहले एक, चार, पांच, सात, नौ, 11, 13, 15 और 17वें दिन जांच रिपोर्ट पॉजिटिव ही मिली थी।
पहले मरीज की क्लीनिकल रिपोर्ट
दिन डब्ल्यूबीसी ईएसआर एचजीबी प्लेटलेट्स
पहला 5300 13 10.8 2.8
पांचवां 7300 44 12.2 3.6
14वां 7400 33 12.1 3.0
24वां 8500 80 11.3 3.9