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अब गार्जियन बनेगा कोर्ट: दिल्ली हाईकोर्ट का फरमान, संपत्ति का हक रहेगा सुरक्षित; जानें क्या है पूरा मामला
Tue, 08 Apr 2025 08:55 AM IST
अनुज कुमार
अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली
अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली
Published by: अनुज कुमार
Updated Tue, 08 Apr 2025 08:55 AM IST
सार
दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि कई उत्तराधिकारी होने पर जिला मजिस्ट्रेट बच्चे का प्रतिनिधित्व कर उसके हितों की रक्षा करेंगे। कोर्ट उन बच्चों की याचिका पर सुनवाई कर रहा था जो अपने माता-पिता को खोने के बाद अपनी पुश्तैनी संपत्ति के लिए संघर्ष कर रहे हैं।
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दिल्ली हाईकोर्ट (फाइल फोटो)
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
अपने माता-पिता की छाया खो चुके मासूमों के लिए दिल्ली हाईकोर्ट आसरा बना है। हाईकोर्ट ने स्थानीय जिला मजिस्ट्रेट को बच्चों के अभिभावक के तौर पर अदालत में पैरवी करने, बच्चों के लिए अलग से वकील नियुक्त करने जैसी सुविधाएं देने का निर्देश दिया है। अदालत उन बच्चों की याचिका पर सुनवाई कर रहा था जो अपने माता-पिता को खोने के बाद अपनी पुश्तैनी संपत्ति के लिए संघर्ष कर रहे हैं।
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न्यायमूर्ति सुब्रमण्यम प्रसाद ने 2 अप्रैल 2025 को सुनाए अपने फैसले में इन मासूमों की व्यथा को समझते हुए राज्य सरकार को सख्त दिशानिर्देश बनाने का आदेश दिया। यह फैसला दो नाबालिग बच्चों की याचिकाओं से शुरू हुआ, जिनके माता-पिता की दुखद मृत्यु के बाद उनकी जमीन-जायदाद पर संकट मंडरा रहा था। ये बच्चे, जिन्हें उद्यान घर बॉयज होम और विलेज कॉटेज होम में आश्रय मिला है। एक मामले में, एक बच्चे ने बताया कि कैसे नशे में धुत उसके पिता ने उसकी मां को चाकू मारकर हत्या कर दी और फिर खुदकुशी कर ली। वहीं, दूसरे मामले में एक पिता की हिंसा और मां के परिवार छोड़ने के बाद बच्चे अनाथ हो गए। इन बच्चों का दर्द सिर्फ अपनों को खोने तक सीमित नहीं रहा। उनकी छोटी-सी विरासत भी अब चाचा-ताऊ और रिश्तेदारों की नजरों में थी।
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गोद लेने की राह में बाधा न बने संपत्ति विवाद: फैसले में एक मानवीय पहलू यह भी जोड़ा गया कि अगर बच्चा गोद लेने के लिए तैयार हैं तो संपत्ति का मामला उसकी नई जिंदगी की राह में रोड़ा नहीं बनेगा। कोर्ट ने यह भी कहा कि बच्चों की बात सुनने के लिए एक अलग वकील नियुक्त किया जाए, ताकि उनकी भावनाओं का भी ख्याल रखा जाए। इस सुनवाई में वरिष्ठ अधिवक्ता दयान कृष्णन और याचिकाकर्ताओं की वकील तारा नरूला ने इन बच्चों की पीड़ा को कोर्ट तक पहुंचाया।
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अदालत ने कहा, बच्चे परिस्थितियों का शिकार हुए
हाई कोर्ट ने इन बच्चों की आवाज सुनी और कहा कि ये बच्चे परिस्थितियों के शिकार हैं। उनकी संपत्ति को तुरंत सुरक्षित करना हमारा कर्तव्य है। कोर्ट ने चाइल्ड वेलफेयर कमेटी (सीडब्ल्यूसी) से लेकर जिला मजिस्ट्रेट (डीएम) और पुलिस तक को निर्देश दिए। अब डीएम को सात दिनों के भीतर इन बच्चों की संपत्ति का संरक्षक बनने के लिए कदम उठाना होगा। कोर्ट ने यह भी सुनिश्चित किया कि बच्चों के हित में उनकी संपत्ति का हिसाब किताब परिवार न्यायालय में दाखिल किया जाए।
यह दिए गए निर्देश
-जिला मजिस्ट्रेट की ओर से नाबालिग बच्चे की संपत्ति पर संरक्षकता के लिए दायर आवेदन को पारिवारिक न्यायालय के समक्ष रखा जाना चाहिए, जो पहले से ही बच्चे के आवेदन पर विचार कर रहा है, ताकि परस्पर विरोधी निर्देशों से बचा जा सके और आवेदन का शीघ्र निपटारा हो सके।
-बच्चे की संपत्ति की सुरक्षा के लिए आवश्यक अंतरिम आदेश शीघ्रता से पारित किए जाएं, अधिमानतः जी.ए.डब्ल्यू. अधिनियम की धारा 12 के अनुपालन में आवेदन दायर करने की तिथि से चार सप्ताह की अवधि के भीतर।
-संबंधित पारिवारिक न्यायालयों को बाल-केंद्रित दृष्टिकोण अपनाना चाहिए। यह सुनिश्चित करने के लिए कि बच्चे के विचारों पर उचित रूप से विचार किया जाए, बच्चे की ओर से एक अलग वकील नियुक्त किया जाना चाहिए।
-पारिवारिक न्यायालय को बच्चे के वयस्क होने तक मामले को लंबित रखना चाहिए। अभिभावक को संबंधित पारिवारिक न्यायालय में वार्षिक खाते जमा करने के लिए कहा जाना चाहिए और पारिवारिक न्यायालय को अभिभावक द्वारा दायर किए गए खातों और विवरणों की देखरेख भी करनी चाहिए
-यदि बच्चा जेजे अधिनियम, 2015 और दत्तक ग्रहण विनियमन 2022 के अनुसार गोद लेने के लिए पात्र है, तो बच्चे की संपत्ति की सुरक्षा के लिए आवेदन के लंबित रहने को किसी भी तरह से गोद लेने की प्रक्रिया में बाधा बनने की अनुमति नहीं दी जा सकती है।