Excise Scam: संजय सिंह पर ED का शिकंजा, 223 दिन से जेल में बंद सिसोदिया; कैसे AAP के लिए मुसीबत बना घोटाला?
17 नवंबर 2021 को दिल्ली सरकार ने राज्य में नई शराब नीति लागू की। जिसके बाद से आम आदमी पार्टी के लिए ये नई नीति मुसीबत बन गई। मनीष सिसोदिया अभी जेल में हैं और संजय सिंह के घर पर ईडी की रेड पड़ी है।
विस्तार
दिल्ली शराब घोटाला मामले में केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) और प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) दोनों ही जांच कर रही हैं। इस मामले में एक तरफ जहां प्रवर्तन निदेशालय ने राज्यसभा से आप सांसद संजय सिंह के आवास पर छापा मारा है तो वहीं दूसरी तरफ सुप्रीम कोर्ट में दिल्ली के पूर्व उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया की जमानत के लिए बार-बार सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटा रहे हैं।
सिसोदिया की जमानत याचिका पर सुनवाई
दिल्ली के पूर्व उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया की जमानत याचिका पर सुप्रीम कोर्ट सुनवाई फिर से शुरू करेगा। कोर्ट ने 15 सितंबर को दोनों पक्षों के वकीलों के संयुक्त अनुरोध के बाद जमानत याचिका पर सुनवाई स्थगित कर दी थी। सिसोदिया के पास केंद्रीय जांच ब्यूरो और प्रवर्तन निदेशालय के खिलाफ बुधवार के लिए दो विशेष अनुमति याचिकाएं सूचीबद्ध हैं। वह कथित दिल्ली उत्पाद शुल्क नीति घोटाले के संबंध में मनी लॉन्ड्रिंग जांच का सामना कर रहे हैं।
इस आधार पर मांगी जमानत
मनीष सिसोदिया को इसी साल 26 फरवरी 2023 को गिरफ्तार किया गया था। इसके बाद कभी ईडी तो कभी सीबीआई दोनों एजेंसियां कोर्ट पहुंची और पूछताछ के लिए रिमांड पर लिया। फिलहाल सिसोदिया जेल में हैं। दिल्ली हाईकोर्ट पहले ही जमानत याचिका को खारिज कर चुका है। जिसके बाद सुप्रीम कोर्ट में मामले की सुनवाई हो रही है। सिसोदिया के वकील अभिषेक मनु सिंघवी हैं। जो सिसोदिया की बीमार पत्नी की देखरेख के लिए कोर्ट से अंतरिम जमानत की मांग कर रहे हैं।
ऐसे शुरू हुई जांच
साल 2021-22 की नई शराब नीति लागू होने के बाद कई गड़बड़ियों की शिकायतें मिली थीं। गृह मंत्रालय के डायरेक्टर ने सीबीआई से शराब घोटाले की जांच कराने का आदेश दिया था। जिसके बाद उपराज्यपाल एलजी विनय कुमार सक्सेना को एक लेटर भेजा गया। जिसमें गड़बड़ियों का जिक्र था। इसके बाद एलजी ने जांच की मंजूरी दी और नई शराब नीति की जांच शुरू हो गई। पहले दिल्ली मुख्य सचिव ने भी इस मामले पर शिकायत की थी।
शराब घोटाले में चार्जशीट
पहली चार्जशीट में पहली बार मनीष सिसोदिया का नाम आरोपी के तौर पर सामने आया था। कई अन्य लोग भी शामिल थे। इसके बाद दिल्ली शराब घोटाले से जुड़े धनशोधन के एक मामले में प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने विशेष अदालत में दूसरा पूरक आरोपपत्र दाखिल किया है। इसमें तीन व्यक्तियों राघव मगुंटा, राजेश जोशी और गौतम मल्होत्रा के अलावा उनसे जुड़ी पांच कंपनियों को आरोपी बनाया गया है।
ईडी ने अभी तक इस मामले में दिल्ली के पूर्व उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया एवं व्यवसायी अमनदीप सिंह ढाल के खिलाफ आरोपपत्र दाखिल नहीं किया था। दूसरी चार्जशीट में ईडी ने 12 आरोपी बनाए थे। ईडी ने राउज एवेन्यू कोर्ट में दिल्ली शराब आबकारी नीति मामले में दूसरी चार्जशीट दायर की थी। चार्जशीट में 12 अभियुक्तों के नाम शामिल थे। विजय नायर, शरथ रेड्डी, बिनॉय बाबू, अभिषेक बोइनपल्ली, अमित अरोड़ा और 7 कंपनियों के नाम थे। अभी भी जांच जारी है।
पहले जानिए दिल्ली की नई शराब नीति क्या थी?
17 नवंबर 2021 को दिल्ली सरकार ने राज्य में नई शराब नीति लागू की। इसके तहत राजधानी में 32 जोन बनाए गए और हर जोन में ज्यादा से ज्यादा 27 दुकानें खुलनी थीं। इस तरह से कुल मिलाकर 849 दुकानें खुलनी थीं। नई शराब नीति में दिल्ली की सभी शराब की दुकानों को प्राइवेट कर दिया गया। इसके पहले दिल्ली में शराब की 60 प्रतिशत दुकानें सरकारी और 40 प्रतिशत प्राइवेट थीं। नई पॉलिसी लागू होने के बाद 100 प्रतिशत प्राइवेट हो गईं। सरकार ने तर्क दिया था कि इससे 3,500 करोड़ रुपये का फायदा होगा।
सरकार ने लाइसेंस की फीस भी कई गुना बढ़ा दी। जिस एल-1 लाइसेंस के लिए पहले ठेकेदारों को 25 लाख देना पड़ता था, नई शराब नीति लागू होने के बाद उसके लिए ठेकेदारों को पांच करोड़ रुपये चुकाने पड़े। इसी तरह अन्य कैटेगिरी में भी लाइसेंस की फीस में काफी बढ़ोतरी हुई।
सब अच्छा तो घोटाले के आरोप क्यों लग रहे हैं?
नई शराब नीति से जनता और सरकार दोनों को नुकसान होने का आरोप है। वहीं, बड़े शराब कारोबारियों को फायदा होने की बात कही जा रही है। भारतीय जनता पार्टी का यही आरोप है। तीन तरह से घोटाले की बात सामने आ रही है। इसे समझने के लिए हम थोड़ा आंकड़ों पर नजर डाल लेते हैं।
लाइसेंस फीस में भारी इजाफा करके बड़े कारोबारियों को लाभ पहुंचाने का आरोप
शराब ब्रिकी के लिए ठेकेदारों को लाइसेंस लेना पड़ता है। इसके लिए सरकार ने लाइसेंस शुल्क तय किया है। सरकार ने कई तरह की कैटेगिरी बनाई है। इसके तहत शराब, बीयर, विदेशी शराब आदि को बेचने के लिए लाइसेंस दिया जाता है। अब उदाहरण के लिए पहले जिस लाइसेंस के लिए ठेकेदार को 25 लाख रुपये का भुगतान करना पड़ता था, नई शराब नीति लागू होने के बाद उसी के लिए पांच करोड़ रुपये देने पड़े।
आरोप है कि दिल्ली सरकार ने जानबूझकर बड़े शराब कारोबारियों को फायदा पहुंचाने के लिए लाइसेंस शुल्क बढ़ाया। इससे छोटे ठेकेदारों की दुकानें बंद हो गईं और बाजार में केवल बड़े शराब माफियाओं को लाइसेंस मिला। विपक्ष का आरोप ये भी है कि इसके एवज में आप के नेताओं और अफसरों को शराब माफियाओं ने मोटी रकम घूस के तौर पर दी।
सरकार बता रही फायदे का सौदा: सरकार का तर्क है कि लाइसेंस फीस बढ़ाने से सरकार को एकमुश्त राजस्व की कमाई हुई। इससे सरकार ने जो उत्पाद शुल्क और वैट घटाया उसकी भरपाई हो गई।
खुदरा बिक्री में सरकारी राजस्व में भारी कमी होने का आरोप
दूसरा आरोप शराब की बिक्री को लेकर है। उदाहरण के लिए मान लीजिए पहले अगर 750 एमएल की एक शराब की बोतल 530 रुपये में मिलती थी। तब इस एक बोतल पर रिटेल कारोबारी को 33.35 रुपये का मुनाफा होता था, जबकि 223.89 रुपये उत्पाद कर और 106 रुपये वैट के रूप में सरकार को मिलता था। मतलब एक बोतल पर सरकार को 329.89 रुपये का फायदा मिलता था। नई शराब नीति से सरकार के इसी मुनाफे में खेल होने दावा किया जा रहा है।
दावा है कि नई शराब नीति में वही 750 एमएल वाली शराब की बोतल का दाम 530 रुपये से बढ़कर 560 रुपये हो गई। इसके अलावा रिटेल कारोबारी का मुनाफा भी 33.35 रुपये से बढ़कर सीधे 363.27 रुपये पहुंच गया। मतलब रिटेल कारोबारियों का फायदा 10 गुना से भी ज्यादा बढ़ गया। वहीं, सरकार को मिलने वाला 329.89 रुपये का फायदा घटकर तीन रुपये 78 पैसे रह गया। इसमें 1.88 रुपये उत्पाद शुल्क और 1.90 रुपये वैट शामिल है।
इन सात खामियों ने भी दिल्ली सरकार की मंशा पर उठाए सवाल
जब शराब घोटाले के मामले ने तूल पकड़ा तो केंद्र सरकार ने भी इसकी जांच करवाई। मुख्य सचिव ने जांच करके एक रिपोर्ट तैयार की, जो दिल्ली के उप-राज्यपाल को दो महीने पहले भेजी गई थी। इस रिपोर्ट में भी सात बिंदुओं पर सवाल उठाए गए हैं।
- मनीष सिसोदिया के निर्देश पर आबकारी विभाग ने एयरपोर्ट जोन के एल-1 बिडर को 30 करोड़ रुपये वापस कर दिए। बिडर एयरपोर्ट अथॉरिटीज से जरूरी एनओसी नहीं ले पाया था। ऐसे में उसके द्वारा जमा कराया गया सिक्योरिटी डिपॉजिट सरकारी खाते में जमा हो जाना चाहिए था, लेकिन सरकार ने बिडर को वह पैसा लौटा दिया।
- केंद्र सरकार से मंजूरी लिए बिना आबकारी विभाग ने आठ नवंबर 2021 को एक आदेश जारी करके विदेशी शराब के रेट कैलकुलेशन का फॉर्मूला बदल दिया। बियर के प्रत्येक केस पर लगने वाली 50 रुपए की इंपोर्ट पास फीस को हटाकर लाइसेंस धारकों को अनुचित लाभ पहुंचाया गया। इसके चलते सरकारी खजाने को भारी नुकसान हुआ।
- टेंडर दस्तावेजों के प्रावधानों को हल्का करके L7Z (रिटेल) लाइसेंसियों को वित्तीय फायदा पहुंचाया गया। वह भी तब जब लाइसेंस फी, ब्याज और पेनाल्टी न चुकाने पर ऐसे लाइसेंस धारकों पर कार्रवाई होनी थी।
- सरकार ने दिल्ली के अन्य व्यवसायियों के हितों को दरकिनार करते हुए केवल शराब कारोबारियों को फायदा पहुंचाने के लिए कोरोना काल में हुए नुकसान की भरपाई के नाम पर उनकी 144.36 करोड़ रुपये की लाइसेंस फीस माफ कर दी, जबकि टेंडर दस्तावेजों में ऐसे किसी आधार पर शराब विक्रेताओं को लाइसेंस फीस में इस तरह की छूट या मुआवजा देने का कहीं कोई प्रावधान नहीं था।
- सरकार ने बिना किसी ठोस आधार के और किसी के साथ चर्चा किए बिना नई पॉलिसी के तहत हर वॉर्ड में शराब की कम से कम दो दुकानें खोलने की शर्त टेंडर में रख दी। बाद में एक्साइज विभाग ने केंद्र सरकार से मंजूरी लिए बिना नॉन कन्फर्मिंग वॉर्डों के बजाय कन्फर्मिंग वॉर्डों में लाइसेंसधारकों को अतिरिक्त दुकानें खोलने की इजाजत दे दी।
- सोशल मीडिया, बैनरों और होर्डिंग्स के जरिए शराब को बढ़ावा दे रहे लाइसेंसियों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की गई। यह दिल्ली एक्साइज नियम, 2010 के नियम 26 और 27 का उल्लंघन है।
- लाइसेंस फीस में बढ़ोतरी किए बिना लाइसेंस धारकों को लाभ पहुंचाने के लिए उनका ऑपरेशनल कार्यकाल पहले एक अप्रैल 2022 से बढ़ाकर 31 मई 2022 तक किया गया और फिर इसे एक जून 2022 से बढ़ाकर 31 जुलाई 2022 तक कर दिया गया। इसके लिए केंद्र सरकार और उपराज्यपाल से भी कोई मंजूरी नहीं ली गई। बाद में आनन फानन में 14 जुलाई को कैबिनेट की बैठक बुलाकर ऐसे कई गैरकानूनी फैसलों को कानूनी जामा पहनाने का काम किया गया। शराब की बिक्री में बढ़ोतरी होने के बावजूद रेवेन्यू में बढ़ोतरी होने के बजाय 37.51 पर्सेंट कम रेवेन्यू मिला।