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जब अटल जी से नायडू बोले- मुझे क्यों डिमोट कर रहे हैं...
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गुरुग्राम। दीनबंधु सर छोटूराम पर आधारित पांच पुस्तकों के विमोचन कार्यक्रम में उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू ने मातृभाषा, कृषि व किसान कल्याण को लेकर विस्तार से अपने विचार व्यक्त किए। उन्होंने अटल बिहारी वाजपेयी के प्रधानमंत्री काल से जुड़ा एक रोचक किस्सा सुनाया। उन्होंने कहा कि वर्ष 2000 में अटल जी ने उनसे सरकार में शामिल होेने के लिए कहा। इस पर नायडू ने अटल जी से कहा कि आप क्यों मुझे डिमोट करना चाहते हैं।
इस पर अटल जी भी सोच में पड़ गए और पूछा कि हम आपको कहां डिमोट कर रहे हैं। इस पर वेंकैया नायडू ने कहा कि अभी मै संगठन में महामंत्री का दायित्व निभा रहा हूं जबकि आप हमें सरकार में मंत्री बनाना चाहते हैं। अटल जी नहीं माने और सरकार में उन्हें अपनी पसंद का विभाग बताने को कहा, तो नायडू ने कृषि व किसान कल्याण विभाग में काम करने की इच्छा जताई। अटल जी को बाद में पता चला कि ये विभाग तो सरकार में सहयोगी जेडीयू के पास है और नीतीश कुमार कृषि मंत्री हैं।
नहीं पूरी की गई मांग
अटल जी ने गठबंधन की नीतियों का हवाला देते हुए कृषि मंत्रालय देने से मना करते हुए वेंकैया नायडू से दूसरा विभाग चुनने को कहा। नायडू ने ग्रामीण विकास मंत्री के तौर पर काम करने की इच्छा जताई, जिसे प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने फौरन मंजूरी दे दी। बाद में वेंकैया नायडू ने करीब 2 साल तक केंद्र सरकार में ग्रामीण विकास मंत्री के तौर पर काम किया। उपराष्ट्रपति ने कहा कि आई ऐम रिटायर्ड फ्रॉम पॉलिटिक्स बट नॉट टायर्ड फॉर पब्लिक लाइफ।
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हिंदी विरोध आंदोलन में लिया हिस्सा
नायडू ने कहा कि क्योंकि नेता बनने के लिए किसी न किसी आंदोलन का हिस्सा बनना था, इसलिए छात्र जीवन में हिंदी विरोधी आंदोलनों में हिस्सा लिया। बाद में पता चला कि आंध्र प्रदेश में हिंदी तो कहीं है ही नहीं। किसी ने बताया कि डाक घर व रेलवे स्टेशन पर हिंदी में साइन बोर्ड लगे हैं। हालांकि, दिल्ली आकर उनको हिंदी की अहमियत समझ में आई। नायडू ने कहा कि किसी भी भाषा का विरोध नहीं करना चाहिए।
बदल दिया राज्यसभा का नियम
उपराष्ट्रपति ने अंग्रेजों की परंपरा से बाहर निकलने की जरूरत पर बल देते हुए कहा कि कलोनियल सोच से बाहर आना जरूरी है। राज्यसभा में एक परंपरा थी कि सदन के पटल पर जब भी कोई कागज रखना होता था, तो आई वांट टू बेग कहना पड़ता था, लेकिन इस परंपरा को हमने बदल दिया है। हमने तुरंत इसको रोका और कहा कि आई वांट टू बेग की जगह, अध्यक्ष महोदय मै आपकी अनुमति से यह सदन के पटल पर रखना चाहता हूं, होना चाहिए।
गांवों में सिर्फ अनाज नहीं संस्कार भी पैदा होते हैं
ग्रामीण विकास व कृषि कल्याण पर जोर देते हुए उपराष्ट्रपति ने कहा कि गांव के खेतों में सिर्फ अनाज ही नहीं पैदा होता बल्कि संस्कार भी पैदा होेते हैं। उन्होंने मौजूदा परिवेश पर चिंता भी व्यक्त की और कहा कि कॅरिअर, कैलिबर की जगह आज कास्ट, कम्युनिटी, कैश और क्रिमिनैलिटी का प्रचलन बढ़ रहा है। विविधता में एकता ही भारत की विशेषता है और सर छोटूराम ने इस परंपरा को आगे बढ़ाया।
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इस पर अटल जी भी सोच में पड़ गए और पूछा कि हम आपको कहां डिमोट कर रहे हैं। इस पर वेंकैया नायडू ने कहा कि अभी मै संगठन में महामंत्री का दायित्व निभा रहा हूं जबकि आप हमें सरकार में मंत्री बनाना चाहते हैं। अटल जी नहीं माने और सरकार में उन्हें अपनी पसंद का विभाग बताने को कहा, तो नायडू ने कृषि व किसान कल्याण विभाग में काम करने की इच्छा जताई। अटल जी को बाद में पता चला कि ये विभाग तो सरकार में सहयोगी जेडीयू के पास है और नीतीश कुमार कृषि मंत्री हैं।
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नहीं पूरी की गई मांग
अटल जी ने गठबंधन की नीतियों का हवाला देते हुए कृषि मंत्रालय देने से मना करते हुए वेंकैया नायडू से दूसरा विभाग चुनने को कहा। नायडू ने ग्रामीण विकास मंत्री के तौर पर काम करने की इच्छा जताई, जिसे प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने फौरन मंजूरी दे दी। बाद में वेंकैया नायडू ने करीब 2 साल तक केंद्र सरकार में ग्रामीण विकास मंत्री के तौर पर काम किया। उपराष्ट्रपति ने कहा कि आई ऐम रिटायर्ड फ्रॉम पॉलिटिक्स बट नॉट टायर्ड फॉर पब्लिक लाइफ।
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हिंदी विरोध आंदोलन में लिया हिस्सा
नायडू ने कहा कि क्योंकि नेता बनने के लिए किसी न किसी आंदोलन का हिस्सा बनना था, इसलिए छात्र जीवन में हिंदी विरोधी आंदोलनों में हिस्सा लिया। बाद में पता चला कि आंध्र प्रदेश में हिंदी तो कहीं है ही नहीं। किसी ने बताया कि डाक घर व रेलवे स्टेशन पर हिंदी में साइन बोर्ड लगे हैं। हालांकि, दिल्ली आकर उनको हिंदी की अहमियत समझ में आई। नायडू ने कहा कि किसी भी भाषा का विरोध नहीं करना चाहिए।
बदल दिया राज्यसभा का नियम
उपराष्ट्रपति ने अंग्रेजों की परंपरा से बाहर निकलने की जरूरत पर बल देते हुए कहा कि कलोनियल सोच से बाहर आना जरूरी है। राज्यसभा में एक परंपरा थी कि सदन के पटल पर जब भी कोई कागज रखना होता था, तो आई वांट टू बेग कहना पड़ता था, लेकिन इस परंपरा को हमने बदल दिया है। हमने तुरंत इसको रोका और कहा कि आई वांट टू बेग की जगह, अध्यक्ष महोदय मै आपकी अनुमति से यह सदन के पटल पर रखना चाहता हूं, होना चाहिए।
गांवों में सिर्फ अनाज नहीं संस्कार भी पैदा होते हैं
ग्रामीण विकास व कृषि कल्याण पर जोर देते हुए उपराष्ट्रपति ने कहा कि गांव के खेतों में सिर्फ अनाज ही नहीं पैदा होता बल्कि संस्कार भी पैदा होेते हैं। उन्होंने मौजूदा परिवेश पर चिंता भी व्यक्त की और कहा कि कॅरिअर, कैलिबर की जगह आज कास्ट, कम्युनिटी, कैश और क्रिमिनैलिटी का प्रचलन बढ़ रहा है। विविधता में एकता ही भारत की विशेषता है और सर छोटूराम ने इस परंपरा को आगे बढ़ाया।