{"_id":"687d3335abf502cdca079e27","slug":"people-angary-gurgaon-news-c-25-1-mwt1001-104939-2025-07-20","type":"story","status":"publish","title_hn":"Gurugram News: बूचड़खानों का हब बन रहा नूंह, जनविरोध तेज, पांच अगस्त को एनजीटी में होगी सुनवाई","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
Gurugram News: बूचड़खानों का हब बन रहा नूंह, जनविरोध तेज, पांच अगस्त को एनजीटी में होगी सुनवाई
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
- स्थानीय लोग बूचड़खानों को सामाजिक, स्वास्थ्य और पर्यावरणीय खतरा मान रहे हैं
- जिले में 22 नए बूचड़खानों का निर्माण कार्य तेजी से चल रहा है
मोहम्मद शाहिद मेवाती।
तावड़ू। देश के सबसे पिछड़े जिलों में शुमार हरियाणा का नूंह अब एक और वजह से सुर्खियों में है। यह जिला धीरे-धीरे बूचड़खानों का हब बनता जा रहा है। जिले में वर्तमान में आठ बूचड़खाने पूरी तरह सक्रिय हैं जबकि 22 नए बूचड़खानों का निर्माण कार्य तेजी से जारी है। अकेले फिरोजपुर झिरका उपमंडल में करीब 25 बूचड़खाने संचालित या निर्माणाधीन बताए जा रहे हैं। इस स्थिति ने स्थानीय लोगों चिंतित हैं। लोग इन बूचड़खानों को सामाजिक, स्वास्थ्य और पर्यावरणीय खतरा मानते हैं। स्थानीय लोगों और सोशल मीडिया एक्टिविस्ट्स का आरोप है कि यह सब प्रशासन की मिलीभगत और जनप्रतिनिधियों की चुप्पी का नतीजा है।
बूचड़खानों की गतिविधियों के खिलाफ आरटीआई कार्यकर्ता हैदर अली ने पिछले वर्ष सितंबर में नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) में याचिका दायर की थी। अब तक चार बार इसमें सुनवाई हो चुकी है, अब पांचवीं सुनवाई होगी। याचिका में नूंह जिले में जल स्रोतों के अत्यधिक दोहन, अवैध बोरवेल संचालन और पर्यावरण मानकों की अनदेखी की शिकायत की गई है। एनजीटी ने राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड सहित संबंधित विभागों को नोटिस जारी कर जवाब तलब किया है। इस मामले की अगली सुनवाई आगामी पांच अगस्त को होनी है।
हैदर अली का कहना है कि जिले में लगभग 30 बूचड़खानों को प्रशासन द्वारा एनओसी जारी किया गया है, लेकिन सार्वजनिक रूप से कभी नहीं बताया गया कि इनमें पानी की खपत कितनी हो रही है और इसका स्रोत क्या है। उन्होंने सवाल उठाया कि जब नूंह पहले से जल संकट, बेरोजगारी और पिछड़ेपन से जूझ रहा है, तो यहां इस तरह की औद्योगिक गतिविधियों को बढ़ावा देना किस योजना का हिस्सा है। एक और बड़ा सवाल यह है कि अधिकांश बूचड़खाने ग्रामीण या आबादी वाले क्षेत्रों के बेहद करीब क्यों खोले जा रहे हैं।
विज्ञापन
राजनीतिक चुप्पी पर भी सवाल :
स्थानीय जनप्रतिनिधियों की चुप्पी ने ग्रामीणों को और अधिक आक्रोशित कर दिया है। लोगों का कहना है कि विधानसभा या अन्य किसी मंच पर कभी भी किसी नेता ने इन बूचड़खानों के खिलाफ आवाज नहीं उठाई। नूंह जैसे पिछड़े और अल्पसंख्यक बहुल जिले में इस तरह की गतिविधियों को बढ़ावा देना एक ‘साजिश’ करार दी जा रही है, जो आने वाली पीढ़ियों को बर्बादी की ओर धकेल सकती है। बता दें कि नूंह जिले में तेजी से बढ़ रहे बूचड़खाने अब केवल आर्थिक या औद्योगिक मसला नहीं रह गए हैं। यह अब एक सामाजिक, स्वास्थ्य और पर्यावरणीय संकट के रूप में सामने आ रहा है।
विज्ञापन
- जिले में 22 नए बूचड़खानों का निर्माण कार्य तेजी से चल रहा है
मोहम्मद शाहिद मेवाती।
तावड़ू। देश के सबसे पिछड़े जिलों में शुमार हरियाणा का नूंह अब एक और वजह से सुर्खियों में है। यह जिला धीरे-धीरे बूचड़खानों का हब बनता जा रहा है। जिले में वर्तमान में आठ बूचड़खाने पूरी तरह सक्रिय हैं जबकि 22 नए बूचड़खानों का निर्माण कार्य तेजी से जारी है। अकेले फिरोजपुर झिरका उपमंडल में करीब 25 बूचड़खाने संचालित या निर्माणाधीन बताए जा रहे हैं। इस स्थिति ने स्थानीय लोगों चिंतित हैं। लोग इन बूचड़खानों को सामाजिक, स्वास्थ्य और पर्यावरणीय खतरा मानते हैं। स्थानीय लोगों और सोशल मीडिया एक्टिविस्ट्स का आरोप है कि यह सब प्रशासन की मिलीभगत और जनप्रतिनिधियों की चुप्पी का नतीजा है।
बूचड़खानों की गतिविधियों के खिलाफ आरटीआई कार्यकर्ता हैदर अली ने पिछले वर्ष सितंबर में नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) में याचिका दायर की थी। अब तक चार बार इसमें सुनवाई हो चुकी है, अब पांचवीं सुनवाई होगी। याचिका में नूंह जिले में जल स्रोतों के अत्यधिक दोहन, अवैध बोरवेल संचालन और पर्यावरण मानकों की अनदेखी की शिकायत की गई है। एनजीटी ने राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड सहित संबंधित विभागों को नोटिस जारी कर जवाब तलब किया है। इस मामले की अगली सुनवाई आगामी पांच अगस्त को होनी है।
विज्ञापन
हैदर अली का कहना है कि जिले में लगभग 30 बूचड़खानों को प्रशासन द्वारा एनओसी जारी किया गया है, लेकिन सार्वजनिक रूप से कभी नहीं बताया गया कि इनमें पानी की खपत कितनी हो रही है और इसका स्रोत क्या है। उन्होंने सवाल उठाया कि जब नूंह पहले से जल संकट, बेरोजगारी और पिछड़ेपन से जूझ रहा है, तो यहां इस तरह की औद्योगिक गतिविधियों को बढ़ावा देना किस योजना का हिस्सा है। एक और बड़ा सवाल यह है कि अधिकांश बूचड़खाने ग्रामीण या आबादी वाले क्षेत्रों के बेहद करीब क्यों खोले जा रहे हैं।
विज्ञापन
राजनीतिक चुप्पी पर भी सवाल :
स्थानीय जनप्रतिनिधियों की चुप्पी ने ग्रामीणों को और अधिक आक्रोशित कर दिया है। लोगों का कहना है कि विधानसभा या अन्य किसी मंच पर कभी भी किसी नेता ने इन बूचड़खानों के खिलाफ आवाज नहीं उठाई। नूंह जैसे पिछड़े और अल्पसंख्यक बहुल जिले में इस तरह की गतिविधियों को बढ़ावा देना एक ‘साजिश’ करार दी जा रही है, जो आने वाली पीढ़ियों को बर्बादी की ओर धकेल सकती है। बता दें कि नूंह जिले में तेजी से बढ़ रहे बूचड़खाने अब केवल आर्थिक या औद्योगिक मसला नहीं रह गए हैं। यह अब एक सामाजिक, स्वास्थ्य और पर्यावरणीय संकट के रूप में सामने आ रहा है।