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Gurugram News: फूल कागज के हुए जबसे, खुशबुएं दर बदर हो गईं तबसे
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अड़े हैं बच्चे गांव का घर बेच देने को, वो तड़पे हैं ये मां बाप की अंतिम निशानी है
पोखर की तरह सिमटे हैं कैद अपने में, कोई झरने की तरह खुलता ही नहीं
लक्ष्मी शंकर वाजपेयी का गजल संग्रह अश्कों से लफ्जों तक लोकार्पित
सुरुचि परिवार ने किया साहित्यिक आयोजन, कवियों ने बिखेरे विविध रंग
संवाद न्यूज एजेंसी
गुरुग्राम। सुरुचि परिवार के तत्वावधान में रविवार को सेक्टर-चार स्थित सीसीए स्कूल के सभागार में लोकार्पण समारोह और काव्य गोष्ठी का आयोजन किया गया। कर्नल कुंवर प्रताप सिंह ने कार्यक्रम की अध्यक्षता की। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. अमरनाथ अमर रहे। डॉ. मनोज अबोध, ओमप्रकाश यती, रूबी मोहंती, लक्ष्मी शंकर वाजपेयी, त्रिलोक कौशिक, ममता किरण, मदन साहनी समेत 30 कवियों ने इस मौके पर अपनी कविताएं पढ़ीं।
इस दौरान अतिथियों द्वारा गजलकार लक्ष्मी शंकर वाजपेयी के नवीनतम गजल संग्रह अश्कों से लफ्जों तक को लोकार्पित किया गया। डॉ. लक्ष्मी शंकर वाजपेयी ने कहा कि दुष्यंत कुमार ने हिंदी गजल के परिदृश्य को बदला और उन्होंने उसे आदमी की पीड़ा से जोड़ दिया। उन्होंने कहा कि फूल कागज के हुए जबसे, खुशबुएं दर बदर हो गईं तबसे। मदन साहनी ने संचालन करते हुए कहा कि कविता या गजल, जितनी मानवीय भावनाओं और रोजमर्रा की जिंदगी से जुड़ी होती है, उतनी ही अधिक समय तक जीवित रहती है। मुख्य अतिथि डॉ. अमर नाथ अमर ने संग्रह की गजलों को आत्मबोध और सरोकारों की गजल बताया। उन्होंने उद्धरित करते हुए कहा कि पोखर की तरह सिमटे हैं कैद अपने में, कोई झरने की तरह खुलता ही नहीं। डॉ. मनोज अबोध ने कहा लक्ष्मी कांत वाजपेयी की अधिकांश गजलों में व्यवस्था के प्रति आक्रोश, आमजन की पीड़ा, संबंधों की बदलती परिस्थिति दिखाई देती है। हकीकत आदमी की क्या पता चलती है चेहरे से, ज़ुबां फौरन बता देती है शख्स कितना खानदानी है। अड़े हैं बच्चे गांव का घर बेच देने को, वो तड़पे हैं ये मां बाप की अंतिम निशानी है।
इस मौके पर बिमलेंदु सागर, राजकुमार गजलयार, रक्षा सिंह, मीना चौधरी, मेघना शर्मा, दीपशिखा श्रीवास्तव, विनय कुमार, अनंत सप्रे, घमंडी लाल अग्रवाल, संजीव नादान, कृष्ण गोपाल विद्यार्थी, शकुंतला मित्तल, रमा त्यागी, दौलत राम कौशिक, वीणा अग्रवाल, प्रियंका कटारिया, रेणु मिश्रा, सुरेंद्र मनचंदा, अनिल श्रीवास्तव आदि कवियों ने काव्य पाठ किया।
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पोखर की तरह सिमटे हैं कैद अपने में, कोई झरने की तरह खुलता ही नहीं
लक्ष्मी शंकर वाजपेयी का गजल संग्रह अश्कों से लफ्जों तक लोकार्पित
सुरुचि परिवार ने किया साहित्यिक आयोजन, कवियों ने बिखेरे विविध रंग
संवाद न्यूज एजेंसी
गुरुग्राम। सुरुचि परिवार के तत्वावधान में रविवार को सेक्टर-चार स्थित सीसीए स्कूल के सभागार में लोकार्पण समारोह और काव्य गोष्ठी का आयोजन किया गया। कर्नल कुंवर प्रताप सिंह ने कार्यक्रम की अध्यक्षता की। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. अमरनाथ अमर रहे। डॉ. मनोज अबोध, ओमप्रकाश यती, रूबी मोहंती, लक्ष्मी शंकर वाजपेयी, त्रिलोक कौशिक, ममता किरण, मदन साहनी समेत 30 कवियों ने इस मौके पर अपनी कविताएं पढ़ीं।
इस दौरान अतिथियों द्वारा गजलकार लक्ष्मी शंकर वाजपेयी के नवीनतम गजल संग्रह अश्कों से लफ्जों तक को लोकार्पित किया गया। डॉ. लक्ष्मी शंकर वाजपेयी ने कहा कि दुष्यंत कुमार ने हिंदी गजल के परिदृश्य को बदला और उन्होंने उसे आदमी की पीड़ा से जोड़ दिया। उन्होंने कहा कि फूल कागज के हुए जबसे, खुशबुएं दर बदर हो गईं तबसे। मदन साहनी ने संचालन करते हुए कहा कि कविता या गजल, जितनी मानवीय भावनाओं और रोजमर्रा की जिंदगी से जुड़ी होती है, उतनी ही अधिक समय तक जीवित रहती है। मुख्य अतिथि डॉ. अमर नाथ अमर ने संग्रह की गजलों को आत्मबोध और सरोकारों की गजल बताया। उन्होंने उद्धरित करते हुए कहा कि पोखर की तरह सिमटे हैं कैद अपने में, कोई झरने की तरह खुलता ही नहीं। डॉ. मनोज अबोध ने कहा लक्ष्मी कांत वाजपेयी की अधिकांश गजलों में व्यवस्था के प्रति आक्रोश, आमजन की पीड़ा, संबंधों की बदलती परिस्थिति दिखाई देती है। हकीकत आदमी की क्या पता चलती है चेहरे से, ज़ुबां फौरन बता देती है शख्स कितना खानदानी है। अड़े हैं बच्चे गांव का घर बेच देने को, वो तड़पे हैं ये मां बाप की अंतिम निशानी है।
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इस मौके पर बिमलेंदु सागर, राजकुमार गजलयार, रक्षा सिंह, मीना चौधरी, मेघना शर्मा, दीपशिखा श्रीवास्तव, विनय कुमार, अनंत सप्रे, घमंडी लाल अग्रवाल, संजीव नादान, कृष्ण गोपाल विद्यार्थी, शकुंतला मित्तल, रमा त्यागी, दौलत राम कौशिक, वीणा अग्रवाल, प्रियंका कटारिया, रेणु मिश्रा, सुरेंद्र मनचंदा, अनिल श्रीवास्तव आदि कवियों ने काव्य पाठ किया।
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