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Gurugram News: डर से निकली हिम्मत, संघर्ष से रचा इतिहास
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एशियन गेम्स में देश को सुचिका ने दिलाया पहला एमएमए पदक
नौकरी, परिवार और खेल के बीच रोज छह घंटे की मेहनत, पति ने भी दिया पूरा साथ
शिवम राजपूत
गुरुग्राम। सुचिका की कहानी की शुरुआत जिस डर से हुई थी, वही डर आज उनकी सबसे बड़ी ताकत बन चुका है। बचपन में आत्मरक्षा के लिए उठाया गया कदम उन्हें राज्य स्तर से राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंच तक ले गया। जिस उम्र में ज्यादातर खिलाड़ी अंतरराष्ट्रीय खेल कॅरिअर के आखिरी पड़ाव पर पहुंचने लगते हैं, उस उम्र में जिले की जूडो प्रशिक्षक सुचिका तरियाल ने एशियन गेम्स में भारत के लिए इतिहास रच दिया। लेकिन उनके लिए यह पदक सिर्फ एक खेल उपलब्धि नहीं है। इसके पीछे बचपन में महसूस किया गया डर, आत्मरक्षा सीखने का फैसला, चोटों के बावजूद जारी रखा गया अभ्यास, शादी के बाद खेल में वापसी और नौकरी के साथ रोजाना घंटों की मेहनत की लंबी कहानी है।
सुचिका ने अपने संघर्ष को याद करते हुए बताया कि करीब 10 साल की उम्र में एक घटना के बाद उन्हें पहली बार महसूस हुआ कि मुश्किल परिस्थितियों में अपनी सुरक्षा के लिए खुद सक्षम होना जरूरी है। यही सोच उन्हें मार्शल आर्ट की ओर ले गई। उन्होंने शौक के लिए खेल शुरू नहीं किया था, बल्कि आत्मरक्षा के लिए प्रशिक्षण लेना शुरू किया था। धीरे-धीरे यही प्रशिक्षण उनकी जिंदगी का हिस्सा बन गया।
सुचिका ने करीब 12 साल की उम्र में कुराश की राज्यस्तरीय प्रतियोगिता में पहला कांस्य पदक जीता। यह उनके खेल कॅरिअर की शुरुआत थी। इसके बाद उन्होंने जूडो को अपनाया और लगातार प्रशिक्षण जारी रखा। रास्ते में कई चोटें आईं, लेकिन उन्होंने खेल छोड़ने का फैसला नहीं किया। जूडो में आगे बढ़ते हुए उन्होंने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत का प्रतिनिधित्व किया। 2022 कॉमनवेल्थ गेम्स में भी वह भारतीय टीम का हिस्सा रहीं।
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इसके बाद भी उनका सफर एक ही खेल तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने कुराश और जू-जित्सु में भी हाथ आजमाया और अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में भारत का प्रतिनिधित्व किया। 2024 में कुराश विश्व चैंपियनशिप में हिस्सा लिया। अब एमएमए में एशियन गेम्स का पदक उनके लंबे संघर्ष का नया पड़ाव है।
सम्मान समारोह में गुरुग्राम के विधायक मुकेश शर्मा ने सुचिका तरियाल को सम्मानित करते हुए उनकी उपलब्धि को देश और प्रदेश के लिए गौरव का विषय बताया। उन्होंने कहा कि सुचिका ने अपनी मेहनत, लगन, अनुशासन और संघर्ष के दम पर अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत का गौरव बढ़ाया है।
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नौकरी, परिवार और खेल के बीच रोज छह घंटे की मेहनत, पति ने भी दिया पूरा साथ
शिवम राजपूत
गुरुग्राम। सुचिका की कहानी की शुरुआत जिस डर से हुई थी, वही डर आज उनकी सबसे बड़ी ताकत बन चुका है। बचपन में आत्मरक्षा के लिए उठाया गया कदम उन्हें राज्य स्तर से राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंच तक ले गया। जिस उम्र में ज्यादातर खिलाड़ी अंतरराष्ट्रीय खेल कॅरिअर के आखिरी पड़ाव पर पहुंचने लगते हैं, उस उम्र में जिले की जूडो प्रशिक्षक सुचिका तरियाल ने एशियन गेम्स में भारत के लिए इतिहास रच दिया। लेकिन उनके लिए यह पदक सिर्फ एक खेल उपलब्धि नहीं है। इसके पीछे बचपन में महसूस किया गया डर, आत्मरक्षा सीखने का फैसला, चोटों के बावजूद जारी रखा गया अभ्यास, शादी के बाद खेल में वापसी और नौकरी के साथ रोजाना घंटों की मेहनत की लंबी कहानी है।
सुचिका ने अपने संघर्ष को याद करते हुए बताया कि करीब 10 साल की उम्र में एक घटना के बाद उन्हें पहली बार महसूस हुआ कि मुश्किल परिस्थितियों में अपनी सुरक्षा के लिए खुद सक्षम होना जरूरी है। यही सोच उन्हें मार्शल आर्ट की ओर ले गई। उन्होंने शौक के लिए खेल शुरू नहीं किया था, बल्कि आत्मरक्षा के लिए प्रशिक्षण लेना शुरू किया था। धीरे-धीरे यही प्रशिक्षण उनकी जिंदगी का हिस्सा बन गया।
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सुचिका ने करीब 12 साल की उम्र में कुराश की राज्यस्तरीय प्रतियोगिता में पहला कांस्य पदक जीता। यह उनके खेल कॅरिअर की शुरुआत थी। इसके बाद उन्होंने जूडो को अपनाया और लगातार प्रशिक्षण जारी रखा। रास्ते में कई चोटें आईं, लेकिन उन्होंने खेल छोड़ने का फैसला नहीं किया। जूडो में आगे बढ़ते हुए उन्होंने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत का प्रतिनिधित्व किया। 2022 कॉमनवेल्थ गेम्स में भी वह भारतीय टीम का हिस्सा रहीं।
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इसके बाद भी उनका सफर एक ही खेल तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने कुराश और जू-जित्सु में भी हाथ आजमाया और अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में भारत का प्रतिनिधित्व किया। 2024 में कुराश विश्व चैंपियनशिप में हिस्सा लिया। अब एमएमए में एशियन गेम्स का पदक उनके लंबे संघर्ष का नया पड़ाव है।
सम्मान समारोह में गुरुग्राम के विधायक मुकेश शर्मा ने सुचिका तरियाल को सम्मानित करते हुए उनकी उपलब्धि को देश और प्रदेश के लिए गौरव का विषय बताया। उन्होंने कहा कि सुचिका ने अपनी मेहनत, लगन, अनुशासन और संघर्ष के दम पर अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत का गौरव बढ़ाया है।