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दोहरा मुनाफा कमा रहे अरावली के माफिया
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गुरुग्राम। अरावली में प्रकृति का सीना छलनी कर बेशकीमती वन संपदा का दोहन कर आलीशान फार्म हाउस बनाने वाले माफिया यहां न केवल अपने लिए आरामगाह का बंदोबस्त कर रहे हैं बल्कि दोहरा मुनाफा भी कमा रहे हैं। अरावली और वनों का दोहन कर इनसे निकलने वाली वस्तुओं की धड़ल्ले से तस्करी भी की जा रही है। जिससे फार्म हाउस मालिकों के साथ ठेकेदार भी मोटा मुनाफा ले रहे हैं।
सुप्रीम कोर्ट और एनजीटी ने भले ही अरावली में किसी भी तरह के निर्माण को गैर कानूनी करार दे रखा है, लेकिन यहां चोरी छिपे नहीं बल्कि धड़ल्ले से अवैध निर्माण जारी है। ऐसे में सवाल उठता है कि इतनी बंदिशों और पाबंदियों के बावजूद यहां निर्माण कैसे जारी है? वर्षों से चल रहे इस खेल में एक बात साफ है कि बगैर किसी संरक्षण के ऐसा कदम उठाने की हिम्मत कोई नहीं जुटा सकता। अब सवाल ये है कि आखिर अवैध फार्म हाउस विकसित करने वालों को इतनी हिम्मत और ताकत मिलती कहां से है? सोहना की ओर से जैसे ही अरावली में प्रवेश करते हैं तो अंसल रिट्रीट के साथ ही सुप्रीम कोर्ट का आदेशात्मक बोर्ड लगा है जिस पर बड़े बड़े शब्दों में लिखा है कि अरावली में किसी तरह का निर्माण नहीं किया जाना चाहिए। यह क्षेत्र पंजाब भूमि प्राधिकरण अधिनियम 1990 के अधीन है। अगर कोई किसी भी तरह का निर्माण करता है तो उस पर कार्यवाही की जाएगी। इन आदेशों को अवैध निर्माण कर ठेंगा दिखाया जा रहा है।
पत्थर और लकड़ियों के साथ वन्य जीवों की होती है तस्करी
अवैध फार्म हाउस के लिए अरावली और वनों को उजाड़ा जा रहा है। इससे निकलने वाले पत्थरों और लकड़ियों का पहले इनके निर्माण में इस्तेमाल किया जाता है। बकाया सामग्री की तस्करी कर दी जाती है। यानी उन्हें दो नंबर में मोटे दामों पर बेच दिया जाता है। सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर हरियाणा में लंबे समय से खनन कार्य बंद है। जब अवैध फार्म हाउस विकसित करने की प्लानिंग होती है तो सबसे पहले अरावली की तोड़फोड़ और खुदाई शुरू होती है। इससे निकलने वाले पत्थर से फेंसिंग दीवार बनाई जाती है। जिससे फार्म हाउस मालिक का अच्छा खासा खर्च बचता है। फार्म हाउसों का निर्माण पूरी प्लानिंग और इतने सलीके से किया जाता है कि बाहरी व्यक्ति को अंदर का कोई दृश्य दिखाई ही नहीं देता। पहले अरावली से निकलने वाले पत्थरों से ऊंची दीवार बनाई जाती है फिर अंदर निर्माण शुरू किया जाता है। पेड़ों की कटाई से जो लकड़ियां मिलती हैं, उनसे फार्म हाउस के सौंदर्यीकरण की वस्तुएं बनाई जाती हैं। बची लकड़ियों की तस्करी कर दी जाती है। सूत्रों की माने तो वन्य जीव जंतुओं को मारकर या उन्हें जिंदा पकड़कर उनकी भी तस्करी की जा रही है।
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विभाग जिम्मेदार
इसमें कोई संदेह नहीं कि अरावली में अवैध निर्माण का काला कारोबार जिम्मेदार विभागों की मिलीभगत से फलफूल रहा है। सुप्रीम कोर्ट की सख्ती के बाद प्रशासन थोड़ा हरकत में आता है और महज एक-दो बयान जारी करके इन पर नकेल कसने का दावा कर देता है। जब भी अरावली में अवैध निर्माण का मामला तूल पकड़ता है कि उसे लेकर प्रशासन की ओर से कुछ न कुछ नई तैयारी जरूर की जाती है। जो तैयारी या निगरानी वर्षों पहले हो जानी चाहिए थी, उन्हें तुल के बाद दिखावे के लिए कर प्रशासन अपनी पीठ थपथपा लेता है। इतना ही नहीं अरावली की निगरानी के लिए कई विभागों ने अपनी अपनी टास्क फोर्स और अधिकारी अलग से तैनात किए हैं। इससे वन एवं पर्यावरण विभाग, नगर निगम या नगर परिषद, पालिका के अधिकारी, एनजीटी के अधिकारियों के साथ ही प्रशासन के आला अधिकारी भी शामिल होते हैं।
धड़ल्ले से पहुंचती है निर्माण सामग्री
कई एकड़ में फार्म हाउस विकसित करने के लिए लाखों टन निर्माण सामग्री का इस्तेमाल होता है। अरावली तक यह निर्माण सामग्री कैसे पहुंचती है, यह भी हैरान करने वाली बात है। इसके अलावा अन्य संसाधन भी यहां आराम से पहुंचाए जाते हैं। सीमेंट, रेता, बजरी, सरिया, ईंट के अलावा कितनी ही सामग्री भवन निर्माण में इस्तेमाल होती है। यह सामग्री बड़े इत्मीनान से यहां पहुंच रही है। यह भी जिम्मेदारी विभागों की कार्यशैली पर बड़ा प्रश्न चिन्ह अंकित करती है। खोरी गांव की घटना के बाद सोहना नगर परिषद ने दो दिन पहले ही अरावली में निर्माण सामग्री प्रतिबंधित करने के लिए दो चेकपोस्ट बनाए गए हैं। इनमें तैनात कर्मचारी को निर्माण सामग्री को अरावली में पहुंचने से रोकने की जिम्मेदारी दी है। एक गार्ड स्तर का कर्मचारी कैसे इतने बड़े खेल में खलल डाल सकता है, यह सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है।
मैंने हाल ही में गुरुग्राम में ज्वाइन किया है इसलिए यहां के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं है। पर इतना तय है कि पॉल्यूशन विभाग पूरी गंभीरता से अपना कार्य करता है। गंभीरता का ही परिणाम है कि करीब 600 केस कोर्ट में फाइल किए हुए हैं। विभाग के अधिकार क्षेत्र में जो कार्य है उसे पूरी गंभीरता से किया जा रहा है। विभागीय अधिकारी पहले भी गंभीर थे अब और ज्यादा गंभीरता से काम किया जाएगा। अरावली ही नहीं नियमों की अनदेखी कर अवैध गतिविधियां चलाने वालों को किसी भी सूरत में बक्शा नहीं जाएगा।
- संदीप सिंह, क्षेत्रिय अधिकारी, हरियाणा पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड
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सुप्रीम कोर्ट और एनजीटी ने भले ही अरावली में किसी भी तरह के निर्माण को गैर कानूनी करार दे रखा है, लेकिन यहां चोरी छिपे नहीं बल्कि धड़ल्ले से अवैध निर्माण जारी है। ऐसे में सवाल उठता है कि इतनी बंदिशों और पाबंदियों के बावजूद यहां निर्माण कैसे जारी है? वर्षों से चल रहे इस खेल में एक बात साफ है कि बगैर किसी संरक्षण के ऐसा कदम उठाने की हिम्मत कोई नहीं जुटा सकता। अब सवाल ये है कि आखिर अवैध फार्म हाउस विकसित करने वालों को इतनी हिम्मत और ताकत मिलती कहां से है? सोहना की ओर से जैसे ही अरावली में प्रवेश करते हैं तो अंसल रिट्रीट के साथ ही सुप्रीम कोर्ट का आदेशात्मक बोर्ड लगा है जिस पर बड़े बड़े शब्दों में लिखा है कि अरावली में किसी तरह का निर्माण नहीं किया जाना चाहिए। यह क्षेत्र पंजाब भूमि प्राधिकरण अधिनियम 1990 के अधीन है। अगर कोई किसी भी तरह का निर्माण करता है तो उस पर कार्यवाही की जाएगी। इन आदेशों को अवैध निर्माण कर ठेंगा दिखाया जा रहा है।
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पत्थर और लकड़ियों के साथ वन्य जीवों की होती है तस्करी
अवैध फार्म हाउस के लिए अरावली और वनों को उजाड़ा जा रहा है। इससे निकलने वाले पत्थरों और लकड़ियों का पहले इनके निर्माण में इस्तेमाल किया जाता है। बकाया सामग्री की तस्करी कर दी जाती है। यानी उन्हें दो नंबर में मोटे दामों पर बेच दिया जाता है। सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर हरियाणा में लंबे समय से खनन कार्य बंद है। जब अवैध फार्म हाउस विकसित करने की प्लानिंग होती है तो सबसे पहले अरावली की तोड़फोड़ और खुदाई शुरू होती है। इससे निकलने वाले पत्थर से फेंसिंग दीवार बनाई जाती है। जिससे फार्म हाउस मालिक का अच्छा खासा खर्च बचता है। फार्म हाउसों का निर्माण पूरी प्लानिंग और इतने सलीके से किया जाता है कि बाहरी व्यक्ति को अंदर का कोई दृश्य दिखाई ही नहीं देता। पहले अरावली से निकलने वाले पत्थरों से ऊंची दीवार बनाई जाती है फिर अंदर निर्माण शुरू किया जाता है। पेड़ों की कटाई से जो लकड़ियां मिलती हैं, उनसे फार्म हाउस के सौंदर्यीकरण की वस्तुएं बनाई जाती हैं। बची लकड़ियों की तस्करी कर दी जाती है। सूत्रों की माने तो वन्य जीव जंतुओं को मारकर या उन्हें जिंदा पकड़कर उनकी भी तस्करी की जा रही है।
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विभाग जिम्मेदार
इसमें कोई संदेह नहीं कि अरावली में अवैध निर्माण का काला कारोबार जिम्मेदार विभागों की मिलीभगत से फलफूल रहा है। सुप्रीम कोर्ट की सख्ती के बाद प्रशासन थोड़ा हरकत में आता है और महज एक-दो बयान जारी करके इन पर नकेल कसने का दावा कर देता है। जब भी अरावली में अवैध निर्माण का मामला तूल पकड़ता है कि उसे लेकर प्रशासन की ओर से कुछ न कुछ नई तैयारी जरूर की जाती है। जो तैयारी या निगरानी वर्षों पहले हो जानी चाहिए थी, उन्हें तुल के बाद दिखावे के लिए कर प्रशासन अपनी पीठ थपथपा लेता है। इतना ही नहीं अरावली की निगरानी के लिए कई विभागों ने अपनी अपनी टास्क फोर्स और अधिकारी अलग से तैनात किए हैं। इससे वन एवं पर्यावरण विभाग, नगर निगम या नगर परिषद, पालिका के अधिकारी, एनजीटी के अधिकारियों के साथ ही प्रशासन के आला अधिकारी भी शामिल होते हैं।
धड़ल्ले से पहुंचती है निर्माण सामग्री
कई एकड़ में फार्म हाउस विकसित करने के लिए लाखों टन निर्माण सामग्री का इस्तेमाल होता है। अरावली तक यह निर्माण सामग्री कैसे पहुंचती है, यह भी हैरान करने वाली बात है। इसके अलावा अन्य संसाधन भी यहां आराम से पहुंचाए जाते हैं। सीमेंट, रेता, बजरी, सरिया, ईंट के अलावा कितनी ही सामग्री भवन निर्माण में इस्तेमाल होती है। यह सामग्री बड़े इत्मीनान से यहां पहुंच रही है। यह भी जिम्मेदारी विभागों की कार्यशैली पर बड़ा प्रश्न चिन्ह अंकित करती है। खोरी गांव की घटना के बाद सोहना नगर परिषद ने दो दिन पहले ही अरावली में निर्माण सामग्री प्रतिबंधित करने के लिए दो चेकपोस्ट बनाए गए हैं। इनमें तैनात कर्मचारी को निर्माण सामग्री को अरावली में पहुंचने से रोकने की जिम्मेदारी दी है। एक गार्ड स्तर का कर्मचारी कैसे इतने बड़े खेल में खलल डाल सकता है, यह सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है।
मैंने हाल ही में गुरुग्राम में ज्वाइन किया है इसलिए यहां के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं है। पर इतना तय है कि पॉल्यूशन विभाग पूरी गंभीरता से अपना कार्य करता है। गंभीरता का ही परिणाम है कि करीब 600 केस कोर्ट में फाइल किए हुए हैं। विभाग के अधिकार क्षेत्र में जो कार्य है उसे पूरी गंभीरता से किया जा रहा है। विभागीय अधिकारी पहले भी गंभीर थे अब और ज्यादा गंभीरता से काम किया जाएगा। अरावली ही नहीं नियमों की अनदेखी कर अवैध गतिविधियां चलाने वालों को किसी भी सूरत में बक्शा नहीं जाएगा।
- संदीप सिंह, क्षेत्रिय अधिकारी, हरियाणा पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड