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Gurugram News: 38 साल बाद मिलेगा आवंटी की पत्नी को प्लाॅट
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उपभोक्ता आयोग से
पति की मौत के बाद पत्नी ने लड़ी कानूनी लड़ाई
1987 में अलॉट हुए प्लाॅट पर चल रहा है अभी तक केस
विराट त्यागी
गुरुग्राम। हरियाणा शहरी विकास प्राधिकरण (एचएसवीपी) की तरफ से 1987 में अलॉट किए गए प्लाॅट का पजेशन मिलने का रास्ता 38 साल बाद साफ हो सका है। प्राधिकरण की तरफ से अलॉट किए गए प्लाॅट पर अभी तक केस चल रहा है। इसके बदले में प्राधिकरण ने दूसरा प्लाॅट कागजों में तो अलॉट कर दिया था लेकिन पजेशन नहीं दिया।
जिस व्यक्ति को प्राधिकरण की तरफ से प्लाट अलॉट किया गया था, उनकी मौत 2011 में बीमारी के चलते हो गई थी। 2025 में उनकी पत्नी ने उपभोक्ता आयोग में कानूनी लड़ाई लड़ी। जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग के अध्यक्ष संजीव जिंदल ने प्लाॅट का पजेशन देने के साथ ही प्राधिकरण को आदेश दिया है कि वह 50 हजार रुपये का मुआवजा और कानूनी प्रक्रिया पर खर्च 22 हजार रुपये महिला को देंगे।
द्वारका के सेक्टर-1 निवासी अनिता रानी ने आयोग में दायर की याचिका में बताया कि उनके पति विनोद लाल को जून 1987 को प्रदेश सरकार की एक योजना के तहत एचएसवीपी (पहले इसका नाम हुडा था) ने 135 वर्ग मीटर का एक प्लाॅट 28760 रुपये में सेक्टर-22-23ए में अलॉट किया था लेकिन रुपये भरने से पहले ही हाईकोर्ट ने योजना को रद्द कर दिया था। 10 मई 1988 को प्राधिकरण की तरफ से हाईकोर्ट के दूसरे आदेश के बाद प्लाॅट का अलॉटमेंट लेटर उनके पति को भेजा गया। आठ जून 1988 को उनके पति ने आठ हजार रुपये करीब 25 प्रतिशत राशि एचएसवीपी के खाते में जमा कर दी। 16 जून को प्राधिकरण ने कहा कि उनके रुपये वापस कर दिए गए हैं। प्लाॅट रखने के लिए 22770 रुपये देने होंगे।
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एक मार्च 1994 को प्राधिकरण की तरफ से कहा गया कि अलॉट हुआ प्लाॅट का पजेशन नहीं दिया जा सकता। उस प्लॉट पर केस चल रहा है। ऐसे में उन्हें सेक्टर-10ए में दूसरा प्लाॅट अलॉट किया गया है। उनके पति ने इस पर सहमति दे दी लेकिन प्राधिकरण की तरफ से इसके बाद प्रक्रिया को आगे नहीं बढ़ाया गया। एक सितंबर 1995 को उनके पति ने प्राधिकरण को पत्र भेजकर शेष बची राशि को भरने के बारे में पूछा लेकिन उन्हें कोई भी जवाब नहीं दिया गया। 2011 में उनके पति की मौत हो गई।
2016 में याचिकाकर्ता को प्लाॅट के बारे में जानकारी मिली। इसके बाद उन्होंने प्राधिकरण से प्लाॅट के बारे में पूछा लेकिन उन्होंने कुछ भी नहीं बताया। फरवरी और मार्च 2025 को उन्होंने प्राधिकरण को पत्र भी लिखे लेकिन कोई जवाब नहीं आया। आयोग ने दोनों पक्षों को सुनने के बाद एचएसवीपी की गलती मानते हुए कहा कि एचएसवीपी की पॉलिसी के अनुसार केस चल रहे प्लाॅट या अन्य किसी कारण से आवंटी को अलॉट हुआ प्लाॅट नहीं मिल पा रहा है तो उसको दूसरा प्लाॅट दिया जा सकता है। याचिकाकर्ता के पति की तरफ से दी गई राशि को भी प्राधिकरण ने वापस नहीं किया था। आयोग ने आदेश दिया कि पहले अलॉट हुए प्लाॅट पर अभी भी केस चल रहा है। ऐसे में सेक्टर-10ए में अलॉट हुआ प्लऍट याचिकाकर्ता को दिया जाए। अगर किसी कारण से वह प्लाॅट उन्हें दिया जा सकता तो दूसरा प्लाॅट दिया जाए।
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पति की मौत के बाद पत्नी ने लड़ी कानूनी लड़ाई
1987 में अलॉट हुए प्लाॅट पर चल रहा है अभी तक केस
विराट त्यागी
गुरुग्राम। हरियाणा शहरी विकास प्राधिकरण (एचएसवीपी) की तरफ से 1987 में अलॉट किए गए प्लाॅट का पजेशन मिलने का रास्ता 38 साल बाद साफ हो सका है। प्राधिकरण की तरफ से अलॉट किए गए प्लाॅट पर अभी तक केस चल रहा है। इसके बदले में प्राधिकरण ने दूसरा प्लाॅट कागजों में तो अलॉट कर दिया था लेकिन पजेशन नहीं दिया।
जिस व्यक्ति को प्राधिकरण की तरफ से प्लाट अलॉट किया गया था, उनकी मौत 2011 में बीमारी के चलते हो गई थी। 2025 में उनकी पत्नी ने उपभोक्ता आयोग में कानूनी लड़ाई लड़ी। जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग के अध्यक्ष संजीव जिंदल ने प्लाॅट का पजेशन देने के साथ ही प्राधिकरण को आदेश दिया है कि वह 50 हजार रुपये का मुआवजा और कानूनी प्रक्रिया पर खर्च 22 हजार रुपये महिला को देंगे।
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द्वारका के सेक्टर-1 निवासी अनिता रानी ने आयोग में दायर की याचिका में बताया कि उनके पति विनोद लाल को जून 1987 को प्रदेश सरकार की एक योजना के तहत एचएसवीपी (पहले इसका नाम हुडा था) ने 135 वर्ग मीटर का एक प्लाॅट 28760 रुपये में सेक्टर-22-23ए में अलॉट किया था लेकिन रुपये भरने से पहले ही हाईकोर्ट ने योजना को रद्द कर दिया था। 10 मई 1988 को प्राधिकरण की तरफ से हाईकोर्ट के दूसरे आदेश के बाद प्लाॅट का अलॉटमेंट लेटर उनके पति को भेजा गया। आठ जून 1988 को उनके पति ने आठ हजार रुपये करीब 25 प्रतिशत राशि एचएसवीपी के खाते में जमा कर दी। 16 जून को प्राधिकरण ने कहा कि उनके रुपये वापस कर दिए गए हैं। प्लाॅट रखने के लिए 22770 रुपये देने होंगे।
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एक मार्च 1994 को प्राधिकरण की तरफ से कहा गया कि अलॉट हुआ प्लाॅट का पजेशन नहीं दिया जा सकता। उस प्लॉट पर केस चल रहा है। ऐसे में उन्हें सेक्टर-10ए में दूसरा प्लाॅट अलॉट किया गया है। उनके पति ने इस पर सहमति दे दी लेकिन प्राधिकरण की तरफ से इसके बाद प्रक्रिया को आगे नहीं बढ़ाया गया। एक सितंबर 1995 को उनके पति ने प्राधिकरण को पत्र भेजकर शेष बची राशि को भरने के बारे में पूछा लेकिन उन्हें कोई भी जवाब नहीं दिया गया। 2011 में उनके पति की मौत हो गई।
2016 में याचिकाकर्ता को प्लाॅट के बारे में जानकारी मिली। इसके बाद उन्होंने प्राधिकरण से प्लाॅट के बारे में पूछा लेकिन उन्होंने कुछ भी नहीं बताया। फरवरी और मार्च 2025 को उन्होंने प्राधिकरण को पत्र भी लिखे लेकिन कोई जवाब नहीं आया। आयोग ने दोनों पक्षों को सुनने के बाद एचएसवीपी की गलती मानते हुए कहा कि एचएसवीपी की पॉलिसी के अनुसार केस चल रहे प्लाॅट या अन्य किसी कारण से आवंटी को अलॉट हुआ प्लाॅट नहीं मिल पा रहा है तो उसको दूसरा प्लाॅट दिया जा सकता है। याचिकाकर्ता के पति की तरफ से दी गई राशि को भी प्राधिकरण ने वापस नहीं किया था। आयोग ने आदेश दिया कि पहले अलॉट हुए प्लाॅट पर अभी भी केस चल रहा है। ऐसे में सेक्टर-10ए में अलॉट हुआ प्लऍट याचिकाकर्ता को दिया जाए। अगर किसी कारण से वह प्लाॅट उन्हें दिया जा सकता तो दूसरा प्लाॅट दिया जाए।