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Gurugram News: बराबरी के लिए अभी बहुत संघर्ष बाकी
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मिलेनियम सिटी में महिलाएं आईटी सेक्टर और शिक्षा जगत की रीढ़, फिर भी समानता को तरस रहीं
पूनम
गुरुग्राम। मिलेनियम सिटी गुरुग्राम वह शहर है जहां आईटी सेक्टर में 50 प्रतिशत से ज्यादा महिलाएं काम करती हैं। परिधान उद्योग की रीढ़ महिला कर्मी है। शिक्षा जगत की कल्पना ही महिला शिक्षकों के बगैर नहीं कर सकते हैं। बावजूद इसके महिला समानता दिवस (वूमन इक्वलिटी डे) पर जब राजनीति, शिक्षा, खेल जगत की प्रमुख महिलाओं से महिलाओं की समानता की बात की गई तो उन्होंने कहा कि समानता के लिए अभी बहुत संघर्ष बाकी है। मालूम हो कि 6 अगस्त 1920 को अमेरिका में महिलाओें को वोट देने का अधिकार मिला था, इसलिए यह दिन वूमन इक्वलिटी डे के रूप में मनाया जाता है।
संसद में महिलाओं के 33 प्रतिशत आरक्षण का मामला अभी भी लटका हुआ है। पार्टी के स्तर पर भाजपा ने संगठन में 33 प्रतिशत आरक्षण दिया है। पंचायतों में 50 प्रतिशत महिलाओं को जगह मिली है मगर सीटों पर स्वतंत्र रूप से महिलाओं की उपस्थिति होनी जरूरी है। कोई सीट महिला के लिए रिजर्व होती है तो पुरुष अपना वर्चस्व बनाए रखने के लिए अपनी पत्नी को खड़ा कर देता है।
- गार्गी कक्कड़, पूर्व चेयरमैन खादी ग्रामोद्योग बोर्ड
खेलों में तो महिलाएं 50 वर्ष पीछे चल रही हैं। किसी भी खेल संघ, खेल फेडरेशन में प्रमुख पद पर महिला नहीं होती है। प्रोफेशनल कबड्डी में महिलाओं के लिए मैं खुद 12 साल से संघर्ष कर रही हूं। पुरुष प्रधान समाज समझता है कि महिलाओं को लॉन टेनिस, जिमनास्टिक जैसे खेलों में ही देखा जा सकता है। किसी पुरुष टीम की कोच महिला नहीं होती है।
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- पद्म श्री सुनील डबास, द्रोणाचार्य अवार्डी कबड्डी कोच
महिलाओं की समानता के मामले में प्राचीन काल में अपना देश पूरे विश्व में सबसे आगे रहा है। वैदिक काल में देखें तो लोपामुद्रा, अरुंधती, गार्गी, भारती जैसी विदुषी महिलाओं के नाम आते हैं। महिलाओं को तर्क वितर्क और स्वयं वर चुनने की स्वतंत्रता थी। भौतिकता, शैक्षिक पिछड़ेपन, आर्थिक परतंत्रता, सामाजिक स्थितियां बदलने के बाद महिलाओं के साथ भेदभाव शुरू हुआ है।
- डॉ मीनाक्षी पांडेय, प्रोफेसर (संस्कृत) गुरुग्राम विश्वविद्यालय
महिलाओं को बराबरी का दर्जा घर से लेकर बाहर तक नहीं मिला है। संसद में 33 प्रतिशत आरक्षण की हमारी लड़ाई जारी है। कामकाजी महिला घर का चूल्हा-चौका भी करें यह विरासत के तौर पर मान लिया गया है। कानूनन संपत्ति का अधिकार मिल गया मगर सामाजिक तौर पर इसकी कोई स्वीकार्यता नहीं है।
- उषा सरोहा, राज्य महासचिव जनवादी महिला संगठन
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पूनम
गुरुग्राम। मिलेनियम सिटी गुरुग्राम वह शहर है जहां आईटी सेक्टर में 50 प्रतिशत से ज्यादा महिलाएं काम करती हैं। परिधान उद्योग की रीढ़ महिला कर्मी है। शिक्षा जगत की कल्पना ही महिला शिक्षकों के बगैर नहीं कर सकते हैं। बावजूद इसके महिला समानता दिवस (वूमन इक्वलिटी डे) पर जब राजनीति, शिक्षा, खेल जगत की प्रमुख महिलाओं से महिलाओं की समानता की बात की गई तो उन्होंने कहा कि समानता के लिए अभी बहुत संघर्ष बाकी है। मालूम हो कि 6 अगस्त 1920 को अमेरिका में महिलाओें को वोट देने का अधिकार मिला था, इसलिए यह दिन वूमन इक्वलिटी डे के रूप में मनाया जाता है।
संसद में महिलाओं के 33 प्रतिशत आरक्षण का मामला अभी भी लटका हुआ है। पार्टी के स्तर पर भाजपा ने संगठन में 33 प्रतिशत आरक्षण दिया है। पंचायतों में 50 प्रतिशत महिलाओं को जगह मिली है मगर सीटों पर स्वतंत्र रूप से महिलाओं की उपस्थिति होनी जरूरी है। कोई सीट महिला के लिए रिजर्व होती है तो पुरुष अपना वर्चस्व बनाए रखने के लिए अपनी पत्नी को खड़ा कर देता है।
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- गार्गी कक्कड़, पूर्व चेयरमैन खादी ग्रामोद्योग बोर्ड
खेलों में तो महिलाएं 50 वर्ष पीछे चल रही हैं। किसी भी खेल संघ, खेल फेडरेशन में प्रमुख पद पर महिला नहीं होती है। प्रोफेशनल कबड्डी में महिलाओं के लिए मैं खुद 12 साल से संघर्ष कर रही हूं। पुरुष प्रधान समाज समझता है कि महिलाओं को लॉन टेनिस, जिमनास्टिक जैसे खेलों में ही देखा जा सकता है। किसी पुरुष टीम की कोच महिला नहीं होती है।
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- पद्म श्री सुनील डबास, द्रोणाचार्य अवार्डी कबड्डी कोच
महिलाओं की समानता के मामले में प्राचीन काल में अपना देश पूरे विश्व में सबसे आगे रहा है। वैदिक काल में देखें तो लोपामुद्रा, अरुंधती, गार्गी, भारती जैसी विदुषी महिलाओं के नाम आते हैं। महिलाओं को तर्क वितर्क और स्वयं वर चुनने की स्वतंत्रता थी। भौतिकता, शैक्षिक पिछड़ेपन, आर्थिक परतंत्रता, सामाजिक स्थितियां बदलने के बाद महिलाओं के साथ भेदभाव शुरू हुआ है।
- डॉ मीनाक्षी पांडेय, प्रोफेसर (संस्कृत) गुरुग्राम विश्वविद्यालय
महिलाओं को बराबरी का दर्जा घर से लेकर बाहर तक नहीं मिला है। संसद में 33 प्रतिशत आरक्षण की हमारी लड़ाई जारी है। कामकाजी महिला घर का चूल्हा-चौका भी करें यह विरासत के तौर पर मान लिया गया है। कानूनन संपत्ति का अधिकार मिल गया मगर सामाजिक तौर पर इसकी कोई स्वीकार्यता नहीं है।
- उषा सरोहा, राज्य महासचिव जनवादी महिला संगठन