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छात्र संघ के जरिये राजनीति में आएगी नई पीढ़ी
Updated Wed, 01 Aug 2018 10:24 PM IST
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छात्र संघ के जरिये राजनीति में आएगी नई पीढ़ी
कॉलेज-विश्वविद्यालय से ही राजनीति का ककहरा सीखेंगे युवा, तैयारी में जुटे छात्र संगठन
अमर उजाला ब्यूरो
गुरुग्राम। हरियाणा में करीब 22 वर्ष बाद छात्र संघ चुनाव होना तय हो गया है। 2014 के भाजपा के चुनावी एजेंडे में शामिल छात्र संघ चुनाव अब चुनावी बरस में अमलीजामा पहनने जा रही है। ऐसे में उम्मीद की जा रही है कि छात्र संघ चुनाव के जरिये राजनीति की नई पीढ़ी आएगी। युवा कॉलेज-विश्वविद्यालय से ही राजनीति का ककहरा सीखते हुए हरियाणा की राजनीति में कदम रखेंगे। अब सितंबर के अंतिम सप्ताह या अक्तूबर के पहले सप्ताह में चुनाव कराने के फैसले के बाद छात्र संगठन तैयारी में जुट गए हैं। वहीं, जानकारों की मिलीजुली राय है। कुछ का कहना है कि इससे कॉलेज-विश्वविद्यालय का माहौल खराब होगा तो कुछ लोकतंत्र के मजबूत होने की बात कह रहे हैं।
जिले में सात डिग्री सरकारी कॉलेज है। वहीं आठ निजी यूनिवर्सिटी है। यहां 30 हजार से अधिक विद्यार्थी पढ़ते हैं। फिलहाल सरकार ने राज्य के कॉलेजों और विश्वविद्यालय में छात्र संघ चुनाव की बात कही है, लेकिन इस चुनाव से निजी विश्वविद्यालयों में भी दबाव बनेगा और वहां भी छात्र संघों की दखल होने की प्रबल संभावना है। छात्र संघ चुनाव में मुख्यरूप से अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् (एबीवीपी), इंडियन नेशनल छात्र संगठन (इनसो) और नेशनल स्टूडेंट यूनियन ऑफ इंडियन (एनएसयूआई) शामिल होते हैं, लेकिन तीनों ही संगठन गुरुग्राम में अधिक सक्रिय नहीं हैं। चुनाव घोषण के बाद तीनों संगठन सदस्यता अभियान के साथ विद्यार्थियों को जोड़ने में लग गए हैं। तीनों संगठनों के पदाधिकारियों का दावा है कि उनके पास मजबूत आधार है।
चुनाव प्रक्रिया पर छात्र संघ व सरकार आमने-सामने
तत्कालीन मुख्यमंत्री चौधरी बंसीलाल के वक्त हत्या और मुकदमेबाजी को देखते हुए छात्र संघ चुनाव बंद करा दिए गए थे। अब फिर छात्र संघ के चुनाव आरंभ करने की प्रक्रिया शुरू हुई है। लेकिन चुनाव कराने के प्रारूप पर सरकार और छात्र संगठन आमने-सामने आ गए हैैं। सरकार कॉलेजों में खून-खराबे की आशंका जताते हुए चुनाव ऑनलाइन चुनाव कराने के हक में है। दूसरी ओर, छात्र संगठन इस प्रक्रिया को स्वीकार करने को तैयार नहीं हैं। चुनाव के प्रारूप पर पेंच फंस गया है। इस माह के अंत तक नए सिरे से बैठक कर सरकार और छात्र संगठन चुनाव के प्रारूप पर सहमति बनाने की कोशिश कर सकते हैैं। सरकार गुरुजंबेश्वर यूनिवर्सिटी के कुलपति टंकेश्वर की कमेटी की सिफारिश पर अगले एक सप्ताह में स्थिति स्पष्ट करेगी।
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1974 से पहले चुने जाते थे क्लास प्रतिनिधि
-हरियाणा में 1974 से पहले इनडायरेक्ट (अप्रत्यक्ष) चुनाव होते थे। स्कूलों में कक्षाओं में कक्षा प्रतिनिधि चुने जाते थे। कक्षा प्रतिनिधि इकट्ठा होकर कॉलेज और विश्वविद्यालय प्रधान तथा बाकी पदाधिकारियों का चयन करते थे।
हरियाणा की छात्र राजनीति ने पैदा किए कई नेता
हरियाणा की छात्र राजनीति ने कई बड़े नेताओं को जन्म दिया है। मौजूदा विदेश मंत्री सुषमा स्वराज और पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा सहित कई दिग्गज ने भी छात्र संघ के जरिये ही राजनीति में कदम रखा। पूर्व मंत्री देवेंद्र शर्मा, पूर्व मंत्री निर्मल सिंह, पृथ्वी सिंह, सीपीएम नेता इंद्रजीत सिंह, पूर्व सीपीएस राव दान सिंह, पूर्व मंत्री एवं विधायक कर्ण सिंह दलाल, छात्र नेता संपूर्ण सिंह, पूर्व मंत्री प्रो. छत्रपाल सिंह और पूर्व सांसद जयप्रकाश जेपी शामिल हैैं।
कुछ तथ्य
-हरियाणा का गठन 01 नवंबर 1966 में हुआ।
-1973 तक हरियाणा के विश्वविद्यालय व कॉलेज में अप्रत्यक्ष चुनाव होते थे।
-1974 में बैलेट के जरिए चुनाव होने लगे।
-इमरजेंसी लगते ही 1975 में चुनाव बंद हो गए।
-1977 में चौधरी देवीलाल ने बैलेट प्रक्रिया से फिर छात्र संघ के चुनाव आरंभ करा दिए।
-1996 में पूर्व मुख्यमंत्री चौ. बंसीलाल ने छात्र संघ के चुनाव बंद कर दिए।
-इसके बाद ओम प्रकाश चौटाला और भूपेंद्र सिंह हुड्डा की सरकार रही, लेकिन चुनाव नहीं हुए
-भाजपा ने 2014 में अपने चुनाव घोषणा पत्र में छात्र संघ के चुनाव बहाल करने का वादा किया था।
-2016 में छात्र संघ चुनाव के कमेटी का गठन हुआ, 2017 में रिपोर्ट दी
-2017 में मनोहर सरकार राज्य में छात्र संघ के चुनाव कराने पर राजी हुई
-2018 में अब चुनाव कराने की तैयारी की जा रही है
क्या कहते हैं विशेषज्ञ
छात्र संघ चुनाव बंद होने से कॉलेजों में शांति व अनुशासन था, लेकिन छात्र संघ चुनाव होने से निश्चित तौर पर कॉलेजों की व्यवस्था बिगड़ेगी। कॉलेज के अनुशासन व पढ़ाई पर इसका असर पड़ेगा। सरकार ने युवाओं को खुश करने के लिए जल्दीबाजी में निर्णय लिया है।
-डॉ. अशोक दिवाकर, पूर्व प्राचार्य, राजकीय महिला कॉलेज
छात्र संघ के चुनाव छात्रों का संवैधानिक अधिकार है। देश के सभी बड़े नेता छात्र राजनीति के माध्यम से आए हैं। छात्र संघ चुनाव ही गरीब किसान, कमेरा वर्ग के युवाओं का राजनीति में आने का रास्ता है। छात्र संघ चुनाव होना चाहिए।
-बलराज मलिक, पूर्व शिक्षक, दिल्ली यूनिवर्सिटी
बोले छात्र
छात्र चुनाव होने चाहिए। इससे छात्रों को अपनी आवाज उपर पहुंचाने में मदद मिलेगी है।
- पिंकी परमार, छात्रा
छात्रसंघ चुनाव की बहाली से हमें खुशी है। छात्रों की समस्याओं का अब आसानी से समाधान हो सकेगा।
- लक्षिता, छात्रा
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छात्र संघ के जरिये राजनीति में आएगी नई पीढ़ी
कॉलेज-विश्वविद्यालय से ही राजनीति का ककहरा सीखेंगे युवा, तैयारी में जुटे छात्र संगठन
अमर उजाला ब्यूरो
गुरुग्राम। हरियाणा में करीब 22 वर्ष बाद छात्र संघ चुनाव होना तय हो गया है। 2014 के भाजपा के चुनावी एजेंडे में शामिल छात्र संघ चुनाव अब चुनावी बरस में अमलीजामा पहनने जा रही है। ऐसे में उम्मीद की जा रही है कि छात्र संघ चुनाव के जरिये राजनीति की नई पीढ़ी आएगी। युवा कॉलेज-विश्वविद्यालय से ही राजनीति का ककहरा सीखते हुए हरियाणा की राजनीति में कदम रखेंगे। अब सितंबर के अंतिम सप्ताह या अक्तूबर के पहले सप्ताह में चुनाव कराने के फैसले के बाद छात्र संगठन तैयारी में जुट गए हैं। वहीं, जानकारों की मिलीजुली राय है। कुछ का कहना है कि इससे कॉलेज-विश्वविद्यालय का माहौल खराब होगा तो कुछ लोकतंत्र के मजबूत होने की बात कह रहे हैं।
जिले में सात डिग्री सरकारी कॉलेज है। वहीं आठ निजी यूनिवर्सिटी है। यहां 30 हजार से अधिक विद्यार्थी पढ़ते हैं। फिलहाल सरकार ने राज्य के कॉलेजों और विश्वविद्यालय में छात्र संघ चुनाव की बात कही है, लेकिन इस चुनाव से निजी विश्वविद्यालयों में भी दबाव बनेगा और वहां भी छात्र संघों की दखल होने की प्रबल संभावना है। छात्र संघ चुनाव में मुख्यरूप से अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् (एबीवीपी), इंडियन नेशनल छात्र संगठन (इनसो) और नेशनल स्टूडेंट यूनियन ऑफ इंडियन (एनएसयूआई) शामिल होते हैं, लेकिन तीनों ही संगठन गुरुग्राम में अधिक सक्रिय नहीं हैं। चुनाव घोषण के बाद तीनों संगठन सदस्यता अभियान के साथ विद्यार्थियों को जोड़ने में लग गए हैं। तीनों संगठनों के पदाधिकारियों का दावा है कि उनके पास मजबूत आधार है।
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चुनाव प्रक्रिया पर छात्र संघ व सरकार आमने-सामने
तत्कालीन मुख्यमंत्री चौधरी बंसीलाल के वक्त हत्या और मुकदमेबाजी को देखते हुए छात्र संघ चुनाव बंद करा दिए गए थे। अब फिर छात्र संघ के चुनाव आरंभ करने की प्रक्रिया शुरू हुई है। लेकिन चुनाव कराने के प्रारूप पर सरकार और छात्र संगठन आमने-सामने आ गए हैैं। सरकार कॉलेजों में खून-खराबे की आशंका जताते हुए चुनाव ऑनलाइन चुनाव कराने के हक में है। दूसरी ओर, छात्र संगठन इस प्रक्रिया को स्वीकार करने को तैयार नहीं हैं। चुनाव के प्रारूप पर पेंच फंस गया है। इस माह के अंत तक नए सिरे से बैठक कर सरकार और छात्र संगठन चुनाव के प्रारूप पर सहमति बनाने की कोशिश कर सकते हैैं। सरकार गुरुजंबेश्वर यूनिवर्सिटी के कुलपति टंकेश्वर की कमेटी की सिफारिश पर अगले एक सप्ताह में स्थिति स्पष्ट करेगी।
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1974 से पहले चुने जाते थे क्लास प्रतिनिधि
-हरियाणा में 1974 से पहले इनडायरेक्ट (अप्रत्यक्ष) चुनाव होते थे। स्कूलों में कक्षाओं में कक्षा प्रतिनिधि चुने जाते थे। कक्षा प्रतिनिधि इकट्ठा होकर कॉलेज और विश्वविद्यालय प्रधान तथा बाकी पदाधिकारियों का चयन करते थे।
हरियाणा की छात्र राजनीति ने पैदा किए कई नेता
हरियाणा की छात्र राजनीति ने कई बड़े नेताओं को जन्म दिया है। मौजूदा विदेश मंत्री सुषमा स्वराज और पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा सहित कई दिग्गज ने भी छात्र संघ के जरिये ही राजनीति में कदम रखा। पूर्व मंत्री देवेंद्र शर्मा, पूर्व मंत्री निर्मल सिंह, पृथ्वी सिंह, सीपीएम नेता इंद्रजीत सिंह, पूर्व सीपीएस राव दान सिंह, पूर्व मंत्री एवं विधायक कर्ण सिंह दलाल, छात्र नेता संपूर्ण सिंह, पूर्व मंत्री प्रो. छत्रपाल सिंह और पूर्व सांसद जयप्रकाश जेपी शामिल हैैं।
कुछ तथ्य
-हरियाणा का गठन 01 नवंबर 1966 में हुआ।
-1973 तक हरियाणा के विश्वविद्यालय व कॉलेज में अप्रत्यक्ष चुनाव होते थे।
-1974 में बैलेट के जरिए चुनाव होने लगे।
-इमरजेंसी लगते ही 1975 में चुनाव बंद हो गए।
-1977 में चौधरी देवीलाल ने बैलेट प्रक्रिया से फिर छात्र संघ के चुनाव आरंभ करा दिए।
-1996 में पूर्व मुख्यमंत्री चौ. बंसीलाल ने छात्र संघ के चुनाव बंद कर दिए।
-इसके बाद ओम प्रकाश चौटाला और भूपेंद्र सिंह हुड्डा की सरकार रही, लेकिन चुनाव नहीं हुए
-भाजपा ने 2014 में अपने चुनाव घोषणा पत्र में छात्र संघ के चुनाव बहाल करने का वादा किया था।
-2016 में छात्र संघ चुनाव के कमेटी का गठन हुआ, 2017 में रिपोर्ट दी
-2017 में मनोहर सरकार राज्य में छात्र संघ के चुनाव कराने पर राजी हुई
-2018 में अब चुनाव कराने की तैयारी की जा रही है
क्या कहते हैं विशेषज्ञ
छात्र संघ चुनाव बंद होने से कॉलेजों में शांति व अनुशासन था, लेकिन छात्र संघ चुनाव होने से निश्चित तौर पर कॉलेजों की व्यवस्था बिगड़ेगी। कॉलेज के अनुशासन व पढ़ाई पर इसका असर पड़ेगा। सरकार ने युवाओं को खुश करने के लिए जल्दीबाजी में निर्णय लिया है।
-डॉ. अशोक दिवाकर, पूर्व प्राचार्य, राजकीय महिला कॉलेज
छात्र संघ के चुनाव छात्रों का संवैधानिक अधिकार है। देश के सभी बड़े नेता छात्र राजनीति के माध्यम से आए हैं। छात्र संघ चुनाव ही गरीब किसान, कमेरा वर्ग के युवाओं का राजनीति में आने का रास्ता है। छात्र संघ चुनाव होना चाहिए।
-बलराज मलिक, पूर्व शिक्षक, दिल्ली यूनिवर्सिटी
बोले छात्र
छात्र चुनाव होने चाहिए। इससे छात्रों को अपनी आवाज उपर पहुंचाने में मदद मिलेगी है।
- पिंकी परमार, छात्रा
छात्रसंघ चुनाव की बहाली से हमें खुशी है। छात्रों की समस्याओं का अब आसानी से समाधान हो सकेगा।
- लक्षिता, छात्रा