विश्व गौरेया दिवस : रेडिएशन और प्रदूषण से घुट रहा है गौरेया का दम
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कभी दिन गौरैया की चहचहाहट सुनकर शुरू होता था लेकिन धीरे-धीरे ये नन्ही चिड़ियां हमारे आस-पड़ोस से गायब होती चली गईं। न पेड़ बचे और न उन पर निर्भर छोटे-छोटे पक्षी। बाकी कसर मोबाइल टावर के रेडिएशन और बढ़ते प्रदूषण ने पूरी कर दी।
नन्ही चिड़ियां पर हो रहे लगातार प्रहार के बाद अब गौरेया विलुप्त होने के कगार पर पहुंच गई हैं। भारत के सबसे संकटग्रस्त पक्षी में यह शुमार हो चुकी हैं। एक आकलन के मुताबिक यह 60-80 फीसदी तक विलुप्त हो चुकी हैं।
पर्यावरणविद् और पक्षी वैज्ञानिकों के मुताबिक रेडिएशन से हार्मोनल बैलेंस पर हानिकारक असर होता है। जिन पक्षियों में मैगनेटिक सेंस होता है और जब ये पक्षी विद्युत मैगनेटिक तरंगों के इलाके में आते हैं तो इन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।
रेडिएशन से प्रजनन शक्ति के साथ-साथ इनके नर्वस सिस्टम पर भी बहुत विपरीत असर पड़ता है। इसकी वजह से गौरेया की संख्या तेजी से कम हुई है। वैज्ञानिकों के मुताबिक गौरेया को संकटग्रस्ट पक्षी की श्रेणी में लाने में मोबाइल टावर से निकलने वाले रेडिएशन की अहम भूमिका है।
गौरेया के लिए मुफीद नहीं है आबोहवा
पूर्व वन संरक्षक एवं पर्यावरणविद् आरपी बलवान बताते हैं कि अगस्त 2012 में पर्यावरण मंत्रालय ने खुद माना था कि मोबाइल टावर के रेडिएशन से पक्षियों और मधुमक्खियों पर बहुत बुरा असर पड़ रहा है, इसलिए इस मंत्रालय ने टेलीकॉम मंत्रालय को एक सुझाव भेजा था।
इसमें एक किमी के दायरे में दूसरा टावर ना लगाने की अनुमति देने को कहा गया है और साथ ही टावरों की लोकेशन व इससे निकलने वाले रेडिएशन की जानकारी सार्वजनिक करने को भी कहा गया था, लेकिन आज भी स्थिति विपरीत है। इसका सीधा असर छोटे पक्षी गौरेया, मैना पर पड़ा है।
जूलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया के पूर्व जूनियर रिसर्चर नेहा फिरदौस कहती हैं कि गौरैया का कम होना एक तरह का इशारा है कि हमारी आबोहवा, हमारे भोजन और हमारी जमीन में कितना प्रदूषण फैल गया है।
कीटनाशकों का पक्षियों पर क्या असर है, इस बारे में हम ग्रामीण इलाकों में मोरों के मरने की ख़बरें तो पढ़ते ही हैं लेकिन गौरेया कभी भी ऐसी बड़ी खबर नहीं बन पाती। उनका कहना है कि गौरैया के बच्चों का भोजन शुरुआती 10-15 दिनों में सिर्फ कीड़े-मकोड़े ही होता है।
लेकिन आजकल खेतों से लेकर गमले के पेड़-पौधों में भी रासायनिक पदार्थों का उपयोग होता है। इससे न तो पौधों में कीड़े लगते हैं और न ही इस पक्षी को समुचित भोजन मिल पाता है। रसायनयुक्त खाद्य पदार्थ खाने से मौत भी हो जाती है।