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Ghaziabad News: मातम में बदलीं शादी की खुशियां, चीखों से कांप उठीं गलियां

Ghaziabad Bureau गाजियाबाद ब्यूरो
Updated Tue, 14 Apr 2026 02:16 AM IST
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The joy of the wedding turned into mourning, the streets trembled with screams.
फजलुर्रहमान
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मसूरी। हापुड़ के धौलाना में हुए हादसे ने गाजियाबाद के डासना और बुलंदशहर के गुलावठी में शादी की खुशियों को मातम में बदल दिया। चार दिन से जिन घरों में शहनाई की गूंज थी, सोमवार को वहां मातम पसरा था। हंसी और रौनक की जगह आंसू व बेबसी ने ले ली थी। इस हादसे ने डासना के पांच परिवारों की सिर्फ खुशियां ही नहीं छीनीं, बल्कि पूरे कस्बे को शोक में डुबो दिया। एक ही दिन उठे पांच जनाजों ने हर किसी को सिसकियों से भर दिया।
डासना की पांच गलियों में सोमवार को ऐसी चीख-पुकार उठी कि हर किसी का कलेजा कांप गया। आम दिनों में जहां दिनभर वाहनों के हॉर्न सुनाई देते थे, वहां सिर्फ रोने-बिलखने की आवाजें सुनाई दे रही थीं। घरों के बाहर रखे पांच जनाजे इस बात की गवाही दे रहे थे कि हादसा कितना भयावह था। किसी ने इसमें अपना पति खोया, तो किसी के सिर से पिता का साया उठ गया।
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तीन-तीन मासूम बेटियां…और घर में कोई कंधा देने वाला नहीं

सबसे ज्यादा दिल दहला देने वाला मंजर अख्तर उर्फ बबलू और सोनू के घरों का था। दोनों की तीन-तीन बच्चियां हैं, जो बेबस आंखों से लोगों को आते-जाते देख रही थीं। बच्चियों को समझ नहीं आ रहा था कि उनके जीवन से क्या छिन गया है। सबसे दर्दनाक यह कि इन घरों में जनाजे को कंधा देने के लिए कोई मर्द नहीं बचा था। आखिरकार पड़ोसियों और रिश्तेदारों ने आगे बढ़कर उन्हें सुपुर्द-ए-खाक किया।
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नहीं पहुंचे प्रशासनिक अधिकारी
हैरानी की बात यह रही कि इतने बड़े हादसे के बावजूद पूर्व विधायक और चेयरमैन के बेटे के अलावा कोई जनप्रतिनिधि पीड़ित परिवारों का दुख बांटने के लिए नहीं पहुंचा। एक ही दिन में पांच जनाजों का उठना और जनप्रतिनिधियों व प्रशासनिक अधिकारियों की गैरमौजूदगी ने पीड़ितों के दर्द को और बढ़ा दिया। कब्रिस्तान में पीड़ितों के चेहरे पर मुफलिसी की बेबसी और रोटी की चिंता साफ झलक रही थी। एक पीड़ित की जुबां से निकला, हम गरीब लोग हैं, हमारे आंसू पोछने कौन आएगा।
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नहीं जले चूल्हे, पूरे कस्बे में सन्नाटा
डासना में सोमवार को अधिकांश घरों में चूल्हे नहीं जले। दो शव रात में ही लाए जा चुके थे, जबकि तीन शव पोस्टमार्टम के बाद सोमवार दोपहर करीब साढ़े तीन बजे लाए गए। यूसुफ और मुन्ना का दफीना मकदूम शाह कब्रिस्तान में दोपहर करीब ढाई बजे, जबकि मेडिकल परीक्षण के बाद लाए गए यूनुस, सोनू और अख्तर के शवों का दफीना उस्मान कॉलोनी के सामने स्थित कब्रिस्तान में शाम करीब साढ़े पांच बजे किया गया।

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ताजा हुईं वर्ष 1989 की यादें
इस हादसे ने क्षेत्र के लोगों को वर्ष 1989 में हुई उस घटना की याद दिला दी, जब एक बरात की बस और ट्रक की टक्कर में नाहल, छजारसी, ढबारसी, मसूरी व डासना के 17 लोगों की मौत हो गई थी। मृतकों के घरों के बाहर बैठे महताब आलम, कमरुद्दीन, आफताब और जीशान ने बताया कि वर्ष 1989 में नाहल निवासी शहीद की बरात मेरठ जिले के पूठ गांव गई थी। लौटते समय एनएच-9 स्थित छिजारसी टोल टैक्स पर बरातियों से भरी बस और ट्रक की भिड़ंत हो गई। उस समय इस सड़क को लखनऊ वाली सड़क कहा जाता था। यहां स्थित सेंच्यूरी कंपनी के कर्मचारियों ने बस में से शव निकाले थे।
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चार दिन पहले बेटी की शादी, अब मातम
हादसे में जान गंवाने वाले मुन्ना के घर में चार दिन पहले ही बेटी की शादी थी। बेटी के हाथों की मेहंदी भी नहीं उतरी थी कि पिता की मौत ने परिवार से सब कुछ छीन लिया। मुन्ना अपने परिचित यूनुस के बेटे की शादी में शामिल होने के लिए गए थे।
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जाहिद की तीसरी शादी, सिर से उठा पिता का साया
ग्रामीणों ने बताया कि जाहिद की यह तीसरी शादी है। एक पत्नी का इंतकाल हो गया था, जबकि दूसरी पत्नी ने जाहिद को छोड़ दिया। हादसे में जाहिद के पिता यूनुस की भी मौत हो गई। यूनुस के चार बेटे और चार बेटियां हैं। जाहिद दूसरे नंबर का है।

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बेसहारा हो गईं अख्तर और सोनू की बेटियां

कुरेशियान मोहल्ले में रहने वाले अख्तर उर्फ बबलू की तीन, छह और नौ वर्ष की तीन बेटियां हैं। इसी प्रकार मोहल्ला बाजीमाम छप्पर वाली मस्जिद में किराये पर रहने वाले सोनू की भी तीन बेटियां हैं। मूल रूप से गौतमबुद्धनगर के कस्बा जारचां निवासी सोनू रोजगार की तलाश में 12 वर्ष पूर्व यहां आए थे। सोनू के पिता जहीर की डेढ़ वर्ष पूर्व मौत हो चुकी है। उनकी मां और पत्नी रोते हुए बस एक ही बात कह रही थीं कि अब घर में न कोई कमाने वाला रहा और न कोई मर्द। मृतक यूसुफ फल विक्रेता थे, उनके आठ बेटे हैं। इनमें से दो शादीशुदा हैं। मोहल्ला कस्सावान निवासी यूसुफ का उनके बेटों ने पोस्टमार्टम कराने से इनकार कर दिया।
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