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नेता जी क्या इसी तरह पढ़ेगा बचपन और बढ़ेगा बचपन
ब्यूरो , अमर उजाला गाजियाबाद
Updated Sat, 21 Jan 2017 11:01 AM IST
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झुलसता बचपन
- फोटो : अमर उजाला
चुनाव का आगाज हो गया है। नेताओं का पार्टी के सिंबल और झंडे बैनर लेकर प्रचार अब बस शुरू होने को है। बाजार विभिन्न पार्टियों के झंडे और बैनरों से अटे पड़े हैं, लेकिन इन झंडे और बैनरों के रंग-बिंरगे संसार की कड़वी हकीकत है।
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बाल श्रमिकों का ऐसा श्रम जो बीच शहर में प्रशासन की नाक के नीचे दिन के 14 से 16 घंटे महज सौ रुपये की दिहाड़ी पर अपना बचपन दांव पर लगा रहे हैं। झंडे-बैनर हाथ में लेकर देश को दिशा और विकास देने का दावा करने वाले नेता इन नौनिहालों के गुम होते बचपन की सुध भी लेने को तैयार नहीं है।
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अमर उजाला ने इन बच्चों के साथ जाना इनका दर्द गाजियाबाद का नवयुग मार्केट, अमूमन बैंकों और कॉरपोरेट हाउसेस से गुलजार रहने वाले इस इलाके की एक गली चंद्रपुरी जहां झंडे औैर बैनर दूर से ही राजनीतिक दलों के झंडे और बैनर से आपका ध्यान अपनी ओर आकर्षित कर लेते हैं।
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ऐसा लगता है, सभी पार्टियों के बिल्ले, झंडे और बैनर मानों राजनीति के कुंभ का सागर और इन सबके बीच सिले बैनरों और झंडों को किसी तरह बटोर कर भागता आठ साल का बचपन स्कूल जाने की उम्र में बहनजी के हाथी को किसी तरह से समेट कर बटोरने की जुगत।
इसी तरह उसके कई साथी भी, जिनकी उम्र सात से चौदह साल तक है, इन दिनों नेता जी की साइकिल को दौड़ाने से लेकर कमल के अच्छे दिन लाने के लिए झंडे-बैनरों को पिरो रहे हैं। कहीं कहीं अस्तित्व की लड़ाई में जुटा हैंडपंप भी लहराता दिखता है, लेकिन इन्हें सजाने वाले हाथ किस तरह से अपने भविष्य को काला कर रहे हैं।
ये आसानी से इस गली में देखा जा सकता है। इन बच्चों से जब इनके काम की बाबत पूछा गया तो किसी के ऊपर बीमार अभिभावकों की जिम्मेदारी तो कहीं दो जून की रोटी के लिए जुगत है। आकड़ों के मुताबिक गाजियाबाद में बच्चे अपने बचपन में बजाए पढ़ाई के काम करने के लिए विवश हैं।
इसके बाद भी श्रम विभाग दावा करता आया है कि उसने गाजियाबाद से बाल श्रम खत्म कर दिया है, लेकिन उनकी नाक के नीचे काम कर रहे बच्चे साबित कर रहे हैं कि सरकारी दावे तोड़ने के लिए किए जाते हैं।
ऐसे में बात करे काम करवाने वाले ठेकेदार की तो उसका मानना है कि ये बच्चें शहर में आपराधिक वारदातों को अंजाम दें, उससे बेहतर है कि परिवार का सहारा बने और आर्थिक रूप से सक्षम हों।
जहां तक सवाल उनके बचपन को खत्म करने का है, तो इस पर ठेकेदार का कहना है कि अगर वो काम नहीं कराएंगे तो ये कहीं और जाकर कुछ और काम करेंगे क्योंकि इनके परिवार की जरूरत इनका काम करना है।
कोटस
बाल श्रम करने वाले 95 बच्चों को चिन्हित किया गया है। इसमें से कुछ बच्चे ऐसी फैक्ट्रियों में काम करते है जो उनके लिए काफी खतरनाक है।- धर्मेंद्र सिंह, उप श्रम आयुक्त।