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ग्राउंड रिपोर्ट गाजियाबाद: धीरे-धीरे छंट रहा कुपोषण का 'कुहासा', लोगों में बढ़ी जागरुकता

Tue, 19 Jan 2021 08:12 PM IST
शाहरुख खान गौरव शर्मा, अमर उजाला, गाजियाबाद
गौरव शर्मा, अमर उजाला, गाजियाबाद Published by: शाहरुख खान Updated Tue, 19 Jan 2021 08:12 PM IST
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Ground Report of Ghaziabad Increased awareness among people about malnutrition
कुपोषण से बाहर आए बच्चों के साथ परिजन - फोटो : अमर उजाला
यूपी के इस औद्योगिक व विकसित जनपद में पिछले कुछ सालों में कुपोषण का 'कुहासा' काफी हद तक छंटा है। यहां मौजूद 161 गांव में अति कुपोषित बच्चों की संख्या 792 रह गई है। जनपद के मुरादनगर स्थित सुथारी, सुराना, नेकपुर, विहंग, ढिंढार, मिल्क रावली, रावली आदि गांवों की स्थिति सही सामने आए। यहां बच्चे कुपोषण की जद में कम आये और जो अति कुपोषित रहे, वह भी तेजी से स्वस्थ्य होते गए। 

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यूपी के इस औद्योगिक व विकसित जनपद में पिछले कुछ सालों में कुपोषण का 'कुहासा' काफी हद तक छंटा है। यहां मौजूद 161 गांव में अति कुपोषित बच्चों की संख्या 792 रह गई है। जनपद के मुरादनगर स्थित सुथारी, सुराना, नेकपुर, विहंग, ढिंढार, मिल्क रावली, रावली आदि गांवों की स्थिति सही सामने आए। यहां बच्चे कुपोषण की जद में कम आये और जो अति कुपोषित रहे, वह भी तेजी से स्वस्थ्य होते गए। 

मुरादनगर से करीब 17 किलोमीटर दूर गांव नेकपुर में दीपा ने बताया कि सवा 3 साल की बेटी वाणी को जन्म के समय ही वजन कम व कुछ बीमार थीं। सरकारी कर्मी वजन जांच करने आये तो वजन कम मिला। वाणी को पोषाहार मिलता रहा। प्रदेश सरकार ने नवंबर में गेहूं और चावल आवंटित किया है। उन्होंने बताया कि दोनों बच्चों के लिए गेहूं और चावल मिल चुके हैं। गांव में ही दीपिका का परिवार है। 

दीपिका ने बताया कि बेटी दीक्षा त्यागी(3) अति कुपोषण से बाहर आ गई है। जन्म के समय दूध नहीं पी रही थी। शरीर पीला पड़ रहा था। सरकार से मदद मिली और घर पर दीक्षा के खाने पीने का ख्याल रखा तो वह अब बिल्कुल स्वस्थ्य है। गांव के ही दिलशाना के 4 साल के बेटे सादिक और दो साल की बेटी नमरा भी कमजोर हैं। पिता साजिद नाई का काम करते हैं। साजिद ने बताया कि सादिक का जन्म के समय वजन बेहद कम था। 

करीब एक से डेढ़ किलो रहा होगा। उसकी स्थिति देखकर चिकित्सकों से राय ली। फिर गांव में आंगनबाड़ी वजन तौलने आई। उनसे पंजीरी और अन्य पोषाहार मिला। घर पर भी उसे दूध व आयरन युक्त सब्जियां दी गईं। अब वह कुपोषण से बाहर है। 2 साल की बेटी कुपोषित है। प्रदेश सरकार से पिछले महीने ही गेहूं और चावल मिला है। हालांकि दाल अभी नहीं मिली है।

सुधार को क्या कदम उठाए गए

कुपोषण को हरानी वाली वाणी के साथ मां दीपा
कुपोषण को हरानी वाली वाणी के साथ मां दीपा - फोटो : अमर उजाला
जमीनी हालात और सरकारी आंकड़ों पर गौर करें तो पूर्व के सापेक्ष हालात सुधरे हैं। पोषाहार वितरण कार्यक्रम से जुड़े अफसरों ने बताया कि वर्ष 2018 में अति कुपोषित बच्चों की संख्या करीब 5000 थी। वर्ष 2019 में यह घटकर 2552 रह गई थी। कुपोषण के जड़ से सफाए के लिए जिला प्रशासन खुद आगे आया और दिसंबर 2019 में सभी अति कुपोषित बच्चों की निजी अस्पतालों में लक्षण के आधार पर शारीरिक जांच कराई गई। जिसमें रक्त की कमी लगी। 

उन्हें आयरन की डोज दी गई। जिन्हें भूख नहीं लग रही थी, उन्हें लिवर संबंधी और भूख बढ़ाने संबंधी दवाएं दी गईं। अफसरों का दावा है कि लगभग 3 महीने तक बच्चों का उपचार चला और उसी दौरान अधिकांश बच्चे अतिकुपोषित से कुपोषित की श्रेणी में आ गए। यहां बता दें कि कुपोषित बच्चों को विभाग अधिक गंभीर नहीं मानता है। 

इस श्रेणी के बच्चे जरा सी हालत सुधरने पर ही स्वस्थ्य होने लगते हैं। एक बड़ा कारण और गांव से जुड़े लोगों ने बताया कि पोषाहार के अलावा मूंगफली, गुड़, घी के लड्डुओं का वितरण बच्चे और गर्भवतियों को किया गया। दिसम्बर 2019 से मार्च 2020 तक लड्डू बांटे गए और बच्चे व गर्भवतियों के स्वास्थ्य पर सकारात्मक प्रभाव पड़ा। वहीं विभिन्न गांवों की पड़ताल में कुपोषण दूर करने से जुड़े कई स्थानीय तथ्य भी सामने आए।

कोविड न होता तो हालात और सुधरते
गाजियाबाद में आंगनबाड़ी केंद्रों की संख्या 1373 है। सुपरवाइजर 42 और इनके अधीन 1270 आंगनबाड़ियां कार्यरत हैं। रावली गांव निवासी चंद्रेश शर्मा ने बताया कि कोरोना में सभी सेवाएं प्रभावित हुई हैं। गांव के आंगनबाड़ी केंद्रों पर भी दिक्कत हुई है। लॉकडाउन में पोषाहार वितरण नहीं हो सका। हालात सामान्य रहते तो नतीजे और बेहतर हो सकते थे।

अनाथों के लिए बना वरदान, स्टाफ करता नामकरण

एनआरसी केंद्र का बड़ा सकारात्मक पहलू भी सामने आया। 23 दिसम्बर को केंद्र की महिला एक दिन पहले ही महिला अस्पताल के एसएनसीयू(सिक न्यू बोर्न केयर युनिट) से 36 दिन की बच्ची को एनआरसी शिफ्ट किया गया है। बताया गया है कि बच्ची पुलिस को हिंडन नदी के पास लावारिश स्थिति में मिली। उसे महिला अस्पताल में भर्ती करा दिया। चूंकि बच्ची का कोई नहीं है, इसलिए स्टाफ के बीच में उसकी एक पहचान भी रहे।

उसका नाम काव्या रखा गया है। स्टाफ ने बताया कि तीन महीने तक उसे केंद्र में ही रखा जाएगा। दूध से लेकर अन्य जरूरत का पूरा ख्याल रखा जाएगा   तीन महीने बाद उसे मथुरा अनाथालय भेज दिया जाएगा। केंद्र की नर्सिंग अफसर स्वेता ने बताया कि अनाथ बच्चे मिलने पर उनका नामकरण स्टाफ ही कर देता है। ऐसे बच्चों के पालन पोषण की पूरी जिम्मेदारी हमारी ही होती है। अभी तक करीब 16 ऐसे ही अनाथ बच्चे आ चुके हैं।

हालात हो सकते है खराब, धौलाना, भोजपुर बन रहे कुपोषण केंद्र
जिला कार्यक्रम विभाग बेशक कुपोषण को लेकर निश्चिन्त दिखाई देता हो, लेकिन जमीनी स्तर पर होमवर्क में जरा सी लापरवाही बरती गई तो कुपोषण फिर से फन उठा सकता है। एनआरसी केंद्र पर जो बच्चों की स्थिति दिखी। उनका पता धौलाना, जनकपुरी, मसूरी, जीतपुर, रजापुर, खोड़ा, माता कालोनी, गोविंदपुरम, भोजपुर, तलहेटा, जहांगीरपुर आदि के रूप में सामने आया।

सर्वाधिक कुपोषित बच्चे धौलाना, भोजपुर, जनकपुरी, रजापुर से मिले। विशेष बात यह रही कि अधिकांश परिजन खुद ही या फिर बाल रोग विभाग से एनआरसी पहुंचे। अब यदि बच्चों को कर्मियों द्वारा पहुंचाया जाता तो संख्या और बढ़ सकती थी।

क्या देखने को मिल रही समस्या

स्टाफ ने बताया कि 5 साल तक के बच्चों में वजन कम, खून का न बनना, भूख न लगना, हाथ पैर पीले होना, लीवर का काम न करना, परिवार से पोष्टिक आहार का न मिल पाना आदि के चलते बच्चे कुपोषण की जद में आ रहे हैं।

कोविड काल में एनआरसी में बच्चे उपचार को कम पहुंचे हैं। स्टाफ से कहा है कि स्वास्थ्य कर्मियों से संपर्क कर बच्चों को उपचार के लिए बुलाएं। धौलाना, भोजपुर, जनकपुरी जैसे क्षेत्रों से बच्चे अधिक आये हैं। वहां अधिक ध्यान देने की जरूरत हैं।
डॉ. संगीता गोयल, सीएमएस, महिला अस्पताल गाजियाबाद

जिले में गतवर्ष 2552 के सापेक्ष अति कुपोषित बच्चों की संख्या 792 रह गई है। प्रदेश सरकार से मिले आदेश के क्रम में गेहूं, चावल और दाल वितरण के निर्देश दिए हैं। जनपद में कुपोषण के जड़ से सफाये के लिए लगातार प्रयासरत हैं।
शशि वार्ष्णेय, जिला कार्यक्रम अधिकारी, गाजियाबाद
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