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379 दिन में यूपी गेट पर बसा गांव, 4 दिन में उजड़ गया
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379 दिन में यूपी गेट पर बसा ‘गांव’, 4 दिन में उजड़ गया
गाजियाबाद। सबसे लंबे किसान आंदोलन के दौरान यूपी गेट पर ‘गांव’ बस गया था। 379 दिन में यह इस गांव में लोग आते-जाते रहे, लेकिन आंदोलन स्थगित करने की घोषणा हुई तो इस गांव को उजड़ने में महज 4 दिन लगे। बुधवार को किसान यहां से रवाना हुए तो साथ में खट्टी-मीठी यादें लेकर गए। आंदोलन के दौरान किसानों को नए दोस्त मिले तो कई लोगों में परिवार जैसे रिश्ते बन गए। उन्होंने गले-मिलकर एक-दूसरे को विदाई दी। किसानों का कहना है कि यह दोस्त अब बहुत याद आएंगे।
26 नवंबर को किसान मुजफ्फरनगर से ट्रैक्टरों के साथ चले थे और 27 नवंबर को यूपी गेट पर पहुंच गए थे। दिल्ली के दरवाजे किसानों के लिए बंद हुए तो उन्होंने यूपी गेट (गाजीपुर बॉर्डर) पर ही तंबू लगाने शुरू कर दिए थे। खाली हाथ आए किसानों ने संसाधन जुटाए और दिल्ली-मेरठ एक्सप्रेसवे, एनएच-9 और यूपी गेट पर पुल के नीचे तंबू लगाने शुरू कर दिए। धीरे-धीरे यहां तंबुओं की संख्या बढ़ती रही और यूपी बॉर्डर ने गांव का रूप ले लिया।
खाने के लिए लंगर शुरू कर दिए गए, नहाने के लिए पानी के टैंकर मंगाकर रेडिमेड बाथरूम लगा दिए गए और कपडे़ धोने के लिए वाशिंग मशीनें लगा दी गई थीं। यूपी गेट एक संपन्न गांव की तरह नजर आने लगा था। 26 जनवरी को ट्रैक्टर मार्च के दौरान लालकिला दिल्ली पर हुई घटना के बाद आंदोलन टूटने की कगार पर पहुंच गया था, लेकिन दो दिन बाद ही भाकियू प्रवक्ता राकेश टिकैत के आंसू छलके तो आंदोलन फिर से खड़ा हो गया। हाड़ कंपाने वाली सर्दी रही हो या जून महीने की तपती दुपहरी, किसानों ने सब कुछ सह लिया, लेकिन आंदोलन को कमजोर नहीं पड़ने दिया। अंत में सरकार को कृषि कानून वापस लेना पड़ा। इसके बाद किसानों और सरकार के बीच समझौता हुआ और एमएसपी समेत अन्य मांगों के लिए समिति गठित कर दी गई। 10 दिसंबर को संयुक्त किसान मोर्चा के पदाधिकारियों ने आंदोलन स्थल पर समझौते की घोषणा कर दी। इसके अगले दिन 11 दिसंबर से ही किसानों ने तंबू हटाने और घर लौटना शुरू कर दिया था। बुधवार को यूपी बॉर्डर को पूरी तरह खाली कर दिया गया।
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परिचर्चा
सरकार के मांगें मानने की तो खुशी है, लेकिन अपने साथी किसानों से बिछुड़ने का दुख है। 13 महीने में सभी किसान एक परिवार की तरह हो गए थे। लंबे समय तक यह बिछुड़ना खलता रहेगा। - सुखवंत सिंह, किसान
आंदोलन स्थल पूरे गांव की तरह बस गया था। सिर्फ किसानों का आपस में ही नहीं, आसपास के लोगों से भी मेलजोल हो गया था। आसपास की बस्तियों के बच्चे भी लंगर छकने आते थे। इसे मिस करेंगे। - हरप्रीत सिंह, युवा किसान
एक-एक बांस-बल्ली लाकर गांव बसाया था। लोगों की इसी मेहनत से यह गाजीपुर बॉर्डर से गाजीपुर धाम बन गया था। सिर्फ गाजियाबाद में ही नहीं, देश के अलग-अलग राज्यों के किसानों से संबंध बने, इन्हें कभी नहीं भूल पाएंगे। - बलविंदर सिंह मान, किसान नेता
बीते 13 महीनों में घर से ज्यादा समय यूपी बॉर्डर पर बीता है। यहां रह रहे लोग अपना परिवार लगने लगा है। अब वापस लौटने की खुशी तो है, लेकिन आंदोलन के साथियों के छूटने का दुख भी है। - श्योराज सिंह, बागपत निवासी
किसान आंदोलन ने नए संबंध भी दिए हैं। इन संबंधों को हमेशा निभाएंगे। किसानों का एक बड़ा परिवार बन गया है। - नरेंद्र चौधरी, किसान
यूपी बॉर्डर हो या अन्य आंदोलन स्थल, किसानों का एक ऐसा परिवार बन गया है, जिसमें हर धर्म, जाति और समाज के लोग हैं। इससे अच्छा यादों का गुलदस्ता और नहीं हो सकता। यहां के लोग बहुत याद आएंगे। - राजेंद्र राठी, टीकरी निवासी किसान
13 महीने से आंदोलन में शामिल हर एक किसान अपने परिवार का सदस्य लगने लगा था। सभी से मिलना सुख-दुख की बात करके अपना पन आ गया था। - जयवीर सिंह, सिसौली निवासी किसान
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गाजियाबाद। सबसे लंबे किसान आंदोलन के दौरान यूपी गेट पर ‘गांव’ बस गया था। 379 दिन में यह इस गांव में लोग आते-जाते रहे, लेकिन आंदोलन स्थगित करने की घोषणा हुई तो इस गांव को उजड़ने में महज 4 दिन लगे। बुधवार को किसान यहां से रवाना हुए तो साथ में खट्टी-मीठी यादें लेकर गए। आंदोलन के दौरान किसानों को नए दोस्त मिले तो कई लोगों में परिवार जैसे रिश्ते बन गए। उन्होंने गले-मिलकर एक-दूसरे को विदाई दी। किसानों का कहना है कि यह दोस्त अब बहुत याद आएंगे।
26 नवंबर को किसान मुजफ्फरनगर से ट्रैक्टरों के साथ चले थे और 27 नवंबर को यूपी गेट पर पहुंच गए थे। दिल्ली के दरवाजे किसानों के लिए बंद हुए तो उन्होंने यूपी गेट (गाजीपुर बॉर्डर) पर ही तंबू लगाने शुरू कर दिए थे। खाली हाथ आए किसानों ने संसाधन जुटाए और दिल्ली-मेरठ एक्सप्रेसवे, एनएच-9 और यूपी गेट पर पुल के नीचे तंबू लगाने शुरू कर दिए। धीरे-धीरे यहां तंबुओं की संख्या बढ़ती रही और यूपी बॉर्डर ने गांव का रूप ले लिया।
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खाने के लिए लंगर शुरू कर दिए गए, नहाने के लिए पानी के टैंकर मंगाकर रेडिमेड बाथरूम लगा दिए गए और कपडे़ धोने के लिए वाशिंग मशीनें लगा दी गई थीं। यूपी गेट एक संपन्न गांव की तरह नजर आने लगा था। 26 जनवरी को ट्रैक्टर मार्च के दौरान लालकिला दिल्ली पर हुई घटना के बाद आंदोलन टूटने की कगार पर पहुंच गया था, लेकिन दो दिन बाद ही भाकियू प्रवक्ता राकेश टिकैत के आंसू छलके तो आंदोलन फिर से खड़ा हो गया। हाड़ कंपाने वाली सर्दी रही हो या जून महीने की तपती दुपहरी, किसानों ने सब कुछ सह लिया, लेकिन आंदोलन को कमजोर नहीं पड़ने दिया। अंत में सरकार को कृषि कानून वापस लेना पड़ा। इसके बाद किसानों और सरकार के बीच समझौता हुआ और एमएसपी समेत अन्य मांगों के लिए समिति गठित कर दी गई। 10 दिसंबर को संयुक्त किसान मोर्चा के पदाधिकारियों ने आंदोलन स्थल पर समझौते की घोषणा कर दी। इसके अगले दिन 11 दिसंबर से ही किसानों ने तंबू हटाने और घर लौटना शुरू कर दिया था। बुधवार को यूपी बॉर्डर को पूरी तरह खाली कर दिया गया।
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सरकार के मांगें मानने की तो खुशी है, लेकिन अपने साथी किसानों से बिछुड़ने का दुख है। 13 महीने में सभी किसान एक परिवार की तरह हो गए थे। लंबे समय तक यह बिछुड़ना खलता रहेगा। - सुखवंत सिंह, किसान
आंदोलन स्थल पूरे गांव की तरह बस गया था। सिर्फ किसानों का आपस में ही नहीं, आसपास के लोगों से भी मेलजोल हो गया था। आसपास की बस्तियों के बच्चे भी लंगर छकने आते थे। इसे मिस करेंगे। - हरप्रीत सिंह, युवा किसान
एक-एक बांस-बल्ली लाकर गांव बसाया था। लोगों की इसी मेहनत से यह गाजीपुर बॉर्डर से गाजीपुर धाम बन गया था। सिर्फ गाजियाबाद में ही नहीं, देश के अलग-अलग राज्यों के किसानों से संबंध बने, इन्हें कभी नहीं भूल पाएंगे। - बलविंदर सिंह मान, किसान नेता
बीते 13 महीनों में घर से ज्यादा समय यूपी बॉर्डर पर बीता है। यहां रह रहे लोग अपना परिवार लगने लगा है। अब वापस लौटने की खुशी तो है, लेकिन आंदोलन के साथियों के छूटने का दुख भी है। - श्योराज सिंह, बागपत निवासी
किसान आंदोलन ने नए संबंध भी दिए हैं। इन संबंधों को हमेशा निभाएंगे। किसानों का एक बड़ा परिवार बन गया है। - नरेंद्र चौधरी, किसान
यूपी बॉर्डर हो या अन्य आंदोलन स्थल, किसानों का एक ऐसा परिवार बन गया है, जिसमें हर धर्म, जाति और समाज के लोग हैं। इससे अच्छा यादों का गुलदस्ता और नहीं हो सकता। यहां के लोग बहुत याद आएंगे। - राजेंद्र राठी, टीकरी निवासी किसान
13 महीने से आंदोलन में शामिल हर एक किसान अपने परिवार का सदस्य लगने लगा था। सभी से मिलना सुख-दुख की बात करके अपना पन आ गया था। - जयवीर सिंह, सिसौली निवासी किसान