वतन वापसी : जुबां से छलका दर्द और आंखों से खुशी के आंसू, बताई अफगानिस्तान की खौफनाक दास्तान
- काबुल से लौटे लोग बोले, हर वक्त तालिबान का खौफ रहता था
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काबुल से हिंडन एयरपोर्ट पहुंचे भारतीय नागरिकों की जुबां पर तालिबान के जुल्म की दास्तां थीं, तो आंखों से खुशी के आंसू झर रहे थे। वतन वापसी की उनकी यह खुशी इतनी बड़ी थी कि वे जुबां से इसे बयां नहीं कर पा रहे थे। ये लोग काबुल एयरपोर्ट पर फंसे थे और चारों तरफ पहरा था तालिबान का। जिंदगी तालिबानी लड़ाकों के रहम ओ करम की मोहताज बन गई थी। एयरपोर्ट पर 25-30 हजार लोग जमा थे। इस भीड़ का नियंत्रण बंदूक से किया जा रहा था। हर पल यही डर था कि पता नहीं, कब किधर से गोली आ जाए और सीना चीरती निकल आए। बेबसी में ऊपर वालों से फरियाद किए जा रहे थे कि कैसे ही वतन पहुंच जाएं। ये लोग जब हिंडन एयरपोर्ट पहुंचे, तब इनकी जान में जान आई।
इन लोगों ने बताया, 15 अगस्त की सुबह माहौल पूरी तरह बदल गया था। कंधे पर बंदूक टांगे और चप्पल पहने तालिबानी लोगों के घरों में छापे मार रहे थे। वे अफगानियों को ढूंढ रहे थे। वहां भारतीय बुरी तरह सहमे हुए थे।तालिबानी सवाल कम करते हैं। उन्हें जो सही लगता है, वही करते हैं । हमने बैग बांधा और एयरपोर्ट की तरफ निकल गए। वहां पहुंचते ही देखा कि 25 से 30 हजार लोग एयरपोर्ट के गेट पर इकट्ठा हैं। बाहर तालिबानी बंदूक लेकर खड़े थे। काफी देर तक हम एयरपोर्ट के अंदर जाने के लिए मशक्कत करते रहे। वहां तालिबानियों का निशाना अफगानी थे। जिन लोगों का पासपोर्ट भारत का होता, उसे जाने देते। हम भी इसी तरह
छोटे-छोटे बच्चे भी पहुंचे भारत
वायुसेना के सी-17 ग्लोबमास्टर से कुछ बच्चे भी अपने परिजनों के साथ पहुंचे थे। काबुल में लगातार गोलियों की तड़तड़ाहट सुनने वाले बच्चे विमान से नीचे उतरते ही उन्मुक्त भाव से खेलने कूदने लगे। भारतीय मूल की एक महिला अपने अफगान पति और पांच माह के बच्चे के साथ पहुंचीं थीं। वह अपने बच्चों को खाने पिलाने में काफी व्यस्त थीं। पूछने पर बोलीं, अभी बच्चों को देख रही हूं, अभी बात नहीं कर सकती।
एयरपोर्ट पर गूंजा वंदेमातरम
स्वदेश लौटने पर सभी 168 लोगों के चेहरे पर अलग ही खुशी नजर आ रही थी। अपने दर्द को बयां करने से ज्यादा कोई कुर्सी पर बैठकर फोन पर बात कर रहा था तो महिला बच्चों को दुलार कर रही थी। वायुसेना की हिंडन एयरफोर्स स्टेशन में व्यवस्था को देखकर सभी ने वायुसेना का आभार व्यक्त किया। बीच बीच में वंदेमातरम और भारत माता की जय के नारे लगते रहे।
घर में कैद रहना पड़ा
शेरजाद ने बताया कि वह अफगानिस्तान में भारतीय दूतावास में काम करते थे। तालिबान का कब्जा होने के बाद एक हफ्ते तक घर में ही कैद रहे और इस दौरान जो भी कुछ खाने-पीने का सामान था उसी से काम चलाया। दूतावास से सम्पर्क करने पर एयरपोर्ट की तरफ निकल पड़े। मेरे साथ करीब 100 लोग एयरपोर्ट पर 24 घंटे तक फंसे रहे थे। काफी मुश्किल का सामना करना पड़ा था। तालिबानी एक-एक भारतीय को चेक कर एयरपोर्ट के अंदर जाने दे रहे थे।
भारत सरकार पर भरोसा था
काबुल में पिछले कई सालों से प्राइवेट जॉब करने वाले युवक ईदी ने कहा कि वह भारत आकर काफी खुश हैं। उन्हें भरोसा था कि भारत सरकार उसे तालिबान के कब्जे से निकाल लेगी। उनके चेहरे पर अलग ही मुस्कान थी। चलते-चलते उन्होंने कहा कि आई लव इंडिया। इसके बाद वह अपना पासपोर्ट चेक कराने के बाद बस में बैठकर गंतव्य की तरफ रवाना हो गए। वहीं, अमरीश ने बताया कि तालिबानी क्रूरता व आतंक का सामना करते हुए किसी तरह काबुल एयरपोर्ट तक पहुंचे। फिर पांच घंटे का सफर तय भारत पहुंचे। एक साल से हम लोग वहां गुरुद्वारे में सेवा करते थे। इसी तरह गुरप्रीत सिंह ने कहा कि भारत पहुंचने पर काफी खुश हूं। काबुल में क्या क्या हो रहा है, यह संक्षिप्त में बताना मुश्किल है। तालिबानी क्रूरता की कहानी बहुत लंबी है।
तालिबान भी 10-12 तरह के हैं, पता नहीं चोर कौन और शमशेरजान कौन
अफगान सांसद नरेंद्र खालसा का कहना था कि अफगानिस्तान में अब सब कुछ खत्म हो गया, सब जीरो हो गया। तालिबान भी 10-12 तरह के हैं। पता नहीं चलता कि उनमें तालिब कौन और बिना तालिब कौन है, कौन चोर है और शमशेरजान कौन है। जब वो हमारे पास आए तो हमारी गाड़ी को अलग कर दिया। इसके बाद हम लोग वहां से भाग गए। क्योंकि हमारे साथ छोटे-छोटे बच्चे भी थे परिवार भी थे। उन्होंने अफगान की बात नहीं की। मेरे दोस्त का मोबाइल फोन भी छीन लिया था।
हम एक कपड़े में अपना देश छोड़कर भारत आए
सांसद अनारकली कौर का कहना था कि हम लोग सबकुछ छोड़कर आए हैं। हालात हमारे लिए बहुत अलग हो गए थे। हम मजबूर हो गए अपने देश अफगानिस्तान को छोड़ने के लिए। अब मैं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और वायुसेना व जिन लोगों ने हमारी मदद कर उनका आभार व्यक्त करती हूं। भारत सरकार से मांग है कि वहां जो भी लोग अभी फंसे हैं उनको भी मदद कर स्वदेश लाया जाए। मेरे साथ बहन, माता-पिता और परिवार के लोग भी आए हैं। हम लोग घर, देश और सबकुछ छोड़कर एक कपड़े में दिल्ली आ गए, इसीलिए मैं कहती हूं आई लव इंडिया, आई लव इंडियन एयरफोर्स। एक सवाल के जवाब में अनारकली ने कहा कि अफगानिस्तान में अभी कोई सरकार नहीं हैं, वहां स्थिति ठीक नहीं है। जो भी मानवाधिकार और अन्य तरह से काम कर रहे थे। उनके लिए हालात बिल्कुल भी ठीक नहीं है।
कपड़े उठाने का भी वक्त नहीं मिला
अफगान से लौटीं रनजीत कौर ने अपने चार महीने के बच्चे और बेटी तजमीत कौर के साथ बताया कि बहुत मुश्किल से तालिबान के कब्जे से निकले हैं। एक जोड़ी कपड़े उठाने का भी वक्त नहीं मिला। तालिबान ने रोक लिया था फिर भी उम्मीद थी कि शायद यहां से निकल जाएंगे। भारत आकर अब सुरक्षित महसूस कर रही हूं। अभी भी वहां काफी संगत फंसी हुई है। उनके साथ छोटे-छोटे बच्चे हैं। मैं दिल से दुआ करूंगी कि वो लोग भी स्वदेश आ जाएं।