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जमीन देखे बिना जमा करा दिए मुआवजे के 16 करोड़
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जमीन देखे बिना जमा करा दिए मुआवजे के 16 करोड़
गाजियाबाद। गाजियाबाद विकास प्राधिकरण की मधुबन बापूधाम योजना में मुआवजा बांटने में बड़ा खेल सामने आया है। योजना में मौके पर जमीन नहीं होने के बावजूद जीडीए अधिकारियों ने 16 करोड़ का मुआवजा देने की तैयारी कर ली। शिकायत पर जब जांच हुई तो मुआवजा दिए जाने वाली जमीन पर 76 फ्लैट और 10 से ज्यादा मकानों में लोग रहते हुए मिले। स्थलीय जांच में मामला सामने आने पर प्रक्रिया को तत्काल प्रभाव से रोकते हुए जीडीए उपाध्यक्ष राकेश कुमार सिंह ने जांच कमेटी बैठी दी है।
मामले में जीडीए अधिकारियों और कर्मचारियों की भूमिका सवालों के घेरे में है। मौके पर बड़ी संख्या में फ्लैट बने होने और लोगों के रहने के बावजूद मौके पर जमीन का निरीक्षण नहीं किया गया। प्राधिकरण अधिकारियों ने मुआवजे की रकम देने की प्रक्रिया पूरी करने के साथ मुआवजा धनराशि को गौतमबुद्धनगर स्थित ट्रिब्यूनल भिजवा दिया। इसके बावजूद स्थलीय सत्यापन नहीं किया गया। इसका लाभ उठाकर खसरा नंबर के मालिक मुआवजा जारी कराने को ट्रिब्यूनल में पैरवरी करने लगे।
मधुबन-बापूधाम योजना के लिए जीडीए ने सदरपुर गांव के खसरा संख्या-1739 की करीब 14 बीघा जमीन का अधिग्रहण करने का 16 अक्टूबर 2004 को नोटिफिकेशन किया था। अधिग्रहण के खिलाफ खसरा संख्या 1739 का भू-स्वामी नवंबर 2005 में इलाहाबाद हाईकोर्ट चला गया। जीडीए के पक्ष में फैसला सुनाते ने हाईकोर्ट के 2010 के निर्णय के खिलाफ भू-स्वामी सुप्रीम कोर्ट चले गए। भू-स्वामियों की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने नवंबर 2016 में निर्णय सुनाते हुए नए भू-अधिग्रहण कानून से किसानों को मुआवजा देने केआदेश दिए। इसी मामले में सुप्रीम कोर्ट का निर्णय आने से पहले भू-स्वामी ने अपनी 14 बीघा जमीन का 90 फीसदी हिस्सा अन्य को बेचने के साथ उसकी रजिस्ट्री कर दी। इसी जमीन पर बहुमंजिला इमारत में 76 फ्लैट और 10 से ज्यादा मकानों में बड़ी संख्या में लोग रह रहे हैं। ऐसे में मौके पर जमीन नहीं होने के बावजूद मुआवजा देने की प्रक्रिया एक और घोटाले की ओर इशारा कर रही है।
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बंद लिफाफे ने उजागर किया होने वाला घोटाला:
भाजपा पार्षद राजेंद्र त्यागी ने बताया कि चार दिन पहले एक अज्ञात व्यक्ति की ओर से आवास पर बंद लिफाफे में शिकायती पत्र फेंका गया। पत्र में पूरे घटनाक्रम और होने वाले घोटाले की जानकारी दी गई। मौके पर जमीन नहीं होने के बावजूद अब मुआवजा बांट दिया जाता हो जीडीए को 16 करोड़ की चपत लगती। मामले में जीडीए ने मुआवजा धनराशि जिला प्रशासन के कोष में जमा करा दी थी। पत्र के जरिए मामले की शिकायत डीएम-जीडीए उपाध्यक्ष राकेश कुमार सिंह से की गई। मामले को गंभीरता से लेते हुए डीएम ने मुआवजा धनराशि जारी नहीं करने के आदेश के बाद जांच कमेटी गठित कर दी है।
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गाजियाबाद। गाजियाबाद विकास प्राधिकरण की मधुबन बापूधाम योजना में मुआवजा बांटने में बड़ा खेल सामने आया है। योजना में मौके पर जमीन नहीं होने के बावजूद जीडीए अधिकारियों ने 16 करोड़ का मुआवजा देने की तैयारी कर ली। शिकायत पर जब जांच हुई तो मुआवजा दिए जाने वाली जमीन पर 76 फ्लैट और 10 से ज्यादा मकानों में लोग रहते हुए मिले। स्थलीय जांच में मामला सामने आने पर प्रक्रिया को तत्काल प्रभाव से रोकते हुए जीडीए उपाध्यक्ष राकेश कुमार सिंह ने जांच कमेटी बैठी दी है।
मामले में जीडीए अधिकारियों और कर्मचारियों की भूमिका सवालों के घेरे में है। मौके पर बड़ी संख्या में फ्लैट बने होने और लोगों के रहने के बावजूद मौके पर जमीन का निरीक्षण नहीं किया गया। प्राधिकरण अधिकारियों ने मुआवजे की रकम देने की प्रक्रिया पूरी करने के साथ मुआवजा धनराशि को गौतमबुद्धनगर स्थित ट्रिब्यूनल भिजवा दिया। इसके बावजूद स्थलीय सत्यापन नहीं किया गया। इसका लाभ उठाकर खसरा नंबर के मालिक मुआवजा जारी कराने को ट्रिब्यूनल में पैरवरी करने लगे।
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मधुबन-बापूधाम योजना के लिए जीडीए ने सदरपुर गांव के खसरा संख्या-1739 की करीब 14 बीघा जमीन का अधिग्रहण करने का 16 अक्टूबर 2004 को नोटिफिकेशन किया था। अधिग्रहण के खिलाफ खसरा संख्या 1739 का भू-स्वामी नवंबर 2005 में इलाहाबाद हाईकोर्ट चला गया। जीडीए के पक्ष में फैसला सुनाते ने हाईकोर्ट के 2010 के निर्णय के खिलाफ भू-स्वामी सुप्रीम कोर्ट चले गए। भू-स्वामियों की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने नवंबर 2016 में निर्णय सुनाते हुए नए भू-अधिग्रहण कानून से किसानों को मुआवजा देने केआदेश दिए। इसी मामले में सुप्रीम कोर्ट का निर्णय आने से पहले भू-स्वामी ने अपनी 14 बीघा जमीन का 90 फीसदी हिस्सा अन्य को बेचने के साथ उसकी रजिस्ट्री कर दी। इसी जमीन पर बहुमंजिला इमारत में 76 फ्लैट और 10 से ज्यादा मकानों में बड़ी संख्या में लोग रह रहे हैं। ऐसे में मौके पर जमीन नहीं होने के बावजूद मुआवजा देने की प्रक्रिया एक और घोटाले की ओर इशारा कर रही है।
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बंद लिफाफे ने उजागर किया होने वाला घोटाला:
भाजपा पार्षद राजेंद्र त्यागी ने बताया कि चार दिन पहले एक अज्ञात व्यक्ति की ओर से आवास पर बंद लिफाफे में शिकायती पत्र फेंका गया। पत्र में पूरे घटनाक्रम और होने वाले घोटाले की जानकारी दी गई। मौके पर जमीन नहीं होने के बावजूद अब मुआवजा बांट दिया जाता हो जीडीए को 16 करोड़ की चपत लगती। मामले में जीडीए ने मुआवजा धनराशि जिला प्रशासन के कोष में जमा करा दी थी। पत्र के जरिए मामले की शिकायत डीएम-जीडीए उपाध्यक्ष राकेश कुमार सिंह से की गई। मामले को गंभीरता से लेते हुए डीएम ने मुआवजा धनराशि जारी नहीं करने के आदेश के बाद जांच कमेटी गठित कर दी है।
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