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सुराना-सुठारी गांव के छाबड़िया गौत्र के लोग नहीं मानते रक्षाबंधन का पर्व

Ghaziabad Bureau गाजियाबाद ब्यूरो
Updated Sun, 22 Aug 2021 01:24 AM IST
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सुराना-सुठारी गांव में नहीं मानते रक्षाबंधन
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मुरादनगर। दिल्ली-एनसीआर से सटे मुरादनगर के हिंडन नदी किनारे बसे सुराना-सुठारी गांव के छबड़िया गौत्र के लोग रक्षाबंधन नहीं मनाते। गांव के यदुवंशी रक्षाबंधन को अपशकुन मानते हैं। इसका कारण रक्षाबंधन वाले दिन मोहम्मद गौरी ने सोहनगढ़(अब सुराना) पर हमला कर गांव के लोगों का कत्ल कर दिया था।

मुरादनगर विकास खंड का सबसे अधिक आबादी वाले सुराना गांव को पहले सोहनगढ़ के नाम से जाना जाता था। सुराना-सुठारी गांव के जिला पंचायत सदस्य पति विकास यादव, मास्टर बुध प्रकाश यादव, बुजुर्ग मास्टर तेजराम सिंह यादव, विनोद सिंह यादव ने बताया कि गांव में अधिकांश आबादी छबड़िया गौत्र के अहीरों की है। उनके पूर्वज 1106 में राजस्थान के अलवर से यहां आकर बसे थे। सन 1192 ईस्वी में पृथ्वीराज चौहान और मोहम्मद गौरी के बीच तनाव चल रहा था तो उनके वंशज राजस्थान से निकले अपने क्षेत्रीय अहीर भाइयों के पास सोहनगढ़(अब सुराना) में आकर बसे। अहीरों ने पृथ्वीराज चौहान के वंशजों को मोहम्मद गौरी से बचाने के लिए गांव में शरण दी, लेकिन कुछ समय बाद ही मोहम्मद गौरी को पता चला। उसने रक्षाबंधन के दिन सेना के साथ गांव पर हमला कर दिया। मोहम्मद गौरी ने औरतों, बच्चो के ऊपर हाथी के पैर से कुचलवा दिया। वहीं पृथ्वीराज के वंशजों की भी हत्या कर दी। इस बीच केवल लखीराम सिंह यादव की पत्नी राजवती बची थीं। वह उस समय गर्भवती थीं। कत्लेआम वाले दिन वह अपने मायके उलेहड़ा में पिता सुमेर सिंह यादव के घर गई हुई थीं। मायके में उसने दो पुत्र लखी सिंह व चुपड़ा को जन्म दिया। दोनों का नंदसाल में पालन पोषण हुआ। बेटों ने बड़े होने पर मां से पिता और अपने परिवार के बारे में पूछा। राजवती ने बेटों को मोहम्मद गौरी द्वारा परिवार के मारे जाने की बात बताई। तब लखी सिंह व चुपड़ा के साथ राजवती सुराना वापस आईं और गांव को दोबारा बसाया। सुराना बसने के वर्षों बाद सुठारी गांव को बसाया गया। सुठारी गांव में भी छबड़िया गौत्र के अहीर हैं। वह भी रक्षाबंधन के पर्व को अपशकुन बताते हैं।
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