{"_id":"638117c19fcb2e593023a85d","slug":"ghaziabad-ghaziabad-news-gbd248293718","type":"story","status":"publish","title_hn":"Ghaziabad News: 46 साल बाद पुलिस कमिश्नरेट बना गाजियाबाद","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
Ghaziabad News: 46 साल बाद पुलिस कमिश्नरेट बना गाजियाबाद
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
46 साल बाद पुलिस कमिश्नरेट बना गाजियाबाद
गाजियाबाद। पुलिस कमिश्नर प्रणाली लागू होने से पुलिस और मजबूत हो गई है। अब उसे अपराधियों पर गुंडा एक्ट, गैंगस्टर एक्ट लगाने और उनकी संपत्ति जब्त करने के लिए प्रशासन के अफसरों का मुंह नहीं देखना होगा। नई व्यवस्था में पुलिस अफसरों के पास मजिस्ट्रेट की ताकत भी होगी। अपराध नियंत्रण के लिए वे इन शक्तियों का इस्तेमाल कर सकेंगे। जाहिर है। प्रशासन के अधिकारियों की ताकत कम हो जाएगी।
गाजियाबाद में पुलिस की तमाम कोशिशों के बावजूद जिस रफ्तार से अपराध हो रहा था, उससे पुलिस कमिश्नर प्रणाली लागू किए जाने की आवश्यक्ता लंबे समय से महसूस की जा रही थी। लूट, डकैती, चेन छीनने की घटनाएं थमने का नाम ही नहीं ले रही थीं। ऐसे में शासन काफी समय से महसूस कर रहा था कि गाजियाबाद पुलिस को और शक्तिशाली बनाया जाए ताकि अपराधियों पर लगाम कस सके। लूट और डकैती के बड़े मामले मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ तक भी पहुंचे थे।
शासन ने योगी आदित्यनाथ के दूसरी बार मुख्यमंत्री बनने के बाद मार्च से ही गाजियाबाद में यह प्रणाली लागू करने पर काम शुरू कर दिया था। अब जाकर इसे लागू किया गया है। माना जा रहा है कि कमिश्नरेट के अफसर आते ही अपराधियों पर तेजी से निरोधात्मक कार्रवाई करेंगे। दस से ज्यादा गिरोह ऐसे हैं जो पुलिस की नाक में दम किए हैं। पुलिस के सामने नई चुनौती साइबर अपराध की भी है जो बहुत तेजी से बढ़ रहा है। जिले की आबादी भी लगभग 50 लाख हो चुकी है। 2011 की जनगणना में यह 46 लाख से ज्यादा थी। ऐसे में पुलिस बल को बढ़ाने की भी आवश्यक्ता महसूस की जा रही थी। हाल में ही क्रासिंग रिपब्लिक और वेव सिटी के खुल जाने के बाद जिले में थानों की संख्या 24 हो गई है। माना जा रहा है कि जल्द ही और नए थाने खुलेंगे। टीएचए में तीन थानों का प्रस्ताव है।
विज्ञापन
नोएडा और दिल्ली पुलिस से तालमेल होगा आसान
राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में नोएडा पहले से ही पुलिस कमिश्नरेट बन चुका है। दिल्ली में और भी पहले से यह प्रणाली है। दोनों गाजियाबाद से सटे हैं। ऐसे में तीनों के बीच तालमेल में परेशानी आ रही थी। दिल्ली और नोएडा में अलग प्रणाली थी जबकि गाजियाबाद में अलग। अब तीनों जगह पुलिस कमिश्नरेट प्रणाली लागू हो गई है। दिल्ली और नोएडा से 50 से ज्यादा अपराधी गाजियाबाद में सक्रिय हैं। दिल्ली से बड़े पैमाने पर शराब की तस्करी भी हो रही है।
हाईटेक हो गए अपराधी ... पुलिस में बदलाव जरूरी
पुलिस कमिश्नर प्रणाली के प्रस्ताव में बताई गई चार बड़ी वजह
गाजियाबाद। गाजियाबाद में पुलिस कमिश्नर प्रणाली लागू करने की एक वजह अपराधियों का हाईटेक हो जाना भी बताई गई है। प्रणाली लागू करने के प्रस्ताव में बताया गया है कि अपराधियों के अपराध करने के तौर-तरीके लगातार आधुनिक और जटिल होते जा रहे हैं। वे तेज रफ्तार वाहनों से लूट करते हैं और फुर्र हो जाते हैं। पुलिस के सामने चुनौतियां लगातार बढ़ रही हैं। ऐसे में पुलिस को इन चुनौतियों के लिए तैयार होना पड़ेगा। कुछ बदलाव करने होंगे।
संगठित अपराध भी तेजी से बढ़े हैं। गाजियाबाद में कॉल सेंटर के माध्यम से ठगी के मामले लगातार सामने आ रहे हैं। आरडीसी और टीएचए में 10 से ज्यादा फर्जी कॉल सेंटर पिछले दो साल में पकड़े जा चुके हैं। ये ठगी के लिए खोले गए और हजारों लोगों को ठगा। ड्रग्स की तस्करी भी तेजी से बढ़ी है। गाजियाबाद में पिछले एक साल में 200 किलो से ज्यादा गांजा पकड़ा गया है। चरस, अफीम और स्मैक भी लगातार पकड़ी जा रही है। जाहिर है नशे के सौदागरों का रैकेट बड़ा है जबकि पुलिस की कार्रवाई उतनी व्यापक नहीं है।
सबसे बड़ी चुनौती पुलिस के पास लोगों की जानकारी न होना है। गांव में तो कोई बाहर से आकर रहने लगे तो सबको पता चल जाता है लेकिन शहर में ऐसा नहीं है। बहुमंजिला इमारतों में कौन रह रहा है, वह कहां से आया है और उसका कोई अपराधिक इतिहास तो नहीं है... इसकी जानकारी पुलिस को नहीं होती। ट्रांस हिंडन क्षेत्र में कई बड़े अपराधी पकड़े जा चुके हैं जो पहचान छिपाकर रह रहे थे। ऑनलाइन गेम के जरिए ठगी का मास्टरमाइंड पश्चिमी बंगाल से भागकर यहीं पर रह रहा था। एक सटीक सूचना पर वह पकड़ा गया। देशविरोधी गतिविधि करने वाले संगठनों से जुड़े लोग भी टीएचए में छिपकर रह चुके हैं।
ये हैं वजह
1. अपराधियों के अपराध करने के तौर-तरीकों में बदलाव आना, तेज रफ्तार वाहनों का इस्तेमाल कर लूट करना।
2. साइबर अपराध में तेजी से उछाल खाना, खासकर फर्जी कॉल सेंटर खोलकर लोगों के साथ ठगी करने के मामले बढ़ना।
3. शहर में अपराधियों का पहचान छिपाकर रहना और पुलिस को उनकी जानकारी न मिल पाना।
4. नशे का कारोबार तेजी से फैलना। स्मैक, चरस और गांजे की तस्करी में संगठित गिरोह का हाथ सामने आना।
ऐसे बदलेगी व्यवस्था
पुरानी व्यवस्था
एसएसपी
एसपी सिटी/एसपी देहात
सीओ
नई व्यवस्था
पुलिस कमिश्नर
ज्वाइंट कमिश्नर
डिप्टी कमिश्नर
असिस्टेंट कमिश्नर
पुलिस अफसरों को कार्यकारी मजिस्ट्रेट के दिए गए अधिकार
1. क्रिमिनल प्रोसिजर कोड (सीआरपीसी) की धारा 20 के तहत पुलिस आयुक्त को कार्यकारी मजिस्ट्रेट के अधिकार दिए गए हैं। सीआरपीसी की धारा 21 के तहत संयुक्त पुलिस आयुक्त, अपर पुलिस आयुक्त, पुलिस उपायुक्त, अपर पुलिस उपायुक्त और सहायक पुलिस उपायुक्त को विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट के अधिकार दिए गए हैं।
2. दंड प्रक्रिया संहिता (आईपीसी) की धारा-58 के तहत लोक व्यवस्था एवं शांति बनाए रखने के लिए भी कार्यकारी मजिस्ट्रेट की शक्तियां दी गई हैं। साथ ही, अपराध नियंत्रण के लिए अलग-अलग अधिनियम के तहत कार्रवाई अब सीधे पुलिस कमिश्नर कर सकेंगे। मजिस्ट्रेट के पास फाइल नहीं भेजी जाएगी।
इन अधिनियम के मिले अधिकार
1. उत्तर प्रदेश गुंडा नियंत्रण अधिनियम, 1970
2. विष अधिनियम, 1919
3. अनैतिक व्यापार अधिनियम, 1956
4. पुलिस (द्रोह-उद्दीपन) अधिनियम, 1922
5. पशुओं के प्रति क्रूरता निवारण अधिनियम, 1960
6. विस्फोटक अधिनियम, 1884
7. कारागार अधिनियम, 1894
8. सरकारी गोपनीयता अधिनियम, 1923
9. विदेशी अधिनियम, 1946
10. गैर कानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम, 1967
11. भारतीय पुलिस अधिनियम, 1861
12. उत्तर प्रदेश अग्निश्मन सेवा अधिनियम, 1944
13. उत्तर प्रदेश अग्नि निवारण एवं अग्नि सुरक्षा अधिनियम, 2005
14. उत्तर प्रदेश गिरोहबंद और समाज विरोधी क्रियाकलाप (निवारण) अधिनियम, 1986
विज्ञापन
गाजियाबाद। पुलिस कमिश्नर प्रणाली लागू होने से पुलिस और मजबूत हो गई है। अब उसे अपराधियों पर गुंडा एक्ट, गैंगस्टर एक्ट लगाने और उनकी संपत्ति जब्त करने के लिए प्रशासन के अफसरों का मुंह नहीं देखना होगा। नई व्यवस्था में पुलिस अफसरों के पास मजिस्ट्रेट की ताकत भी होगी। अपराध नियंत्रण के लिए वे इन शक्तियों का इस्तेमाल कर सकेंगे। जाहिर है। प्रशासन के अधिकारियों की ताकत कम हो जाएगी।
गाजियाबाद में पुलिस की तमाम कोशिशों के बावजूद जिस रफ्तार से अपराध हो रहा था, उससे पुलिस कमिश्नर प्रणाली लागू किए जाने की आवश्यक्ता लंबे समय से महसूस की जा रही थी। लूट, डकैती, चेन छीनने की घटनाएं थमने का नाम ही नहीं ले रही थीं। ऐसे में शासन काफी समय से महसूस कर रहा था कि गाजियाबाद पुलिस को और शक्तिशाली बनाया जाए ताकि अपराधियों पर लगाम कस सके। लूट और डकैती के बड़े मामले मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ तक भी पहुंचे थे।
विज्ञापन
शासन ने योगी आदित्यनाथ के दूसरी बार मुख्यमंत्री बनने के बाद मार्च से ही गाजियाबाद में यह प्रणाली लागू करने पर काम शुरू कर दिया था। अब जाकर इसे लागू किया गया है। माना जा रहा है कि कमिश्नरेट के अफसर आते ही अपराधियों पर तेजी से निरोधात्मक कार्रवाई करेंगे। दस से ज्यादा गिरोह ऐसे हैं जो पुलिस की नाक में दम किए हैं। पुलिस के सामने नई चुनौती साइबर अपराध की भी है जो बहुत तेजी से बढ़ रहा है। जिले की आबादी भी लगभग 50 लाख हो चुकी है। 2011 की जनगणना में यह 46 लाख से ज्यादा थी। ऐसे में पुलिस बल को बढ़ाने की भी आवश्यक्ता महसूस की जा रही थी। हाल में ही क्रासिंग रिपब्लिक और वेव सिटी के खुल जाने के बाद जिले में थानों की संख्या 24 हो गई है। माना जा रहा है कि जल्द ही और नए थाने खुलेंगे। टीएचए में तीन थानों का प्रस्ताव है।
विज्ञापन
नोएडा और दिल्ली पुलिस से तालमेल होगा आसान
राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में नोएडा पहले से ही पुलिस कमिश्नरेट बन चुका है। दिल्ली में और भी पहले से यह प्रणाली है। दोनों गाजियाबाद से सटे हैं। ऐसे में तीनों के बीच तालमेल में परेशानी आ रही थी। दिल्ली और नोएडा में अलग प्रणाली थी जबकि गाजियाबाद में अलग। अब तीनों जगह पुलिस कमिश्नरेट प्रणाली लागू हो गई है। दिल्ली और नोएडा से 50 से ज्यादा अपराधी गाजियाबाद में सक्रिय हैं। दिल्ली से बड़े पैमाने पर शराब की तस्करी भी हो रही है।
हाईटेक हो गए अपराधी ... पुलिस में बदलाव जरूरी
पुलिस कमिश्नर प्रणाली के प्रस्ताव में बताई गई चार बड़ी वजह
गाजियाबाद। गाजियाबाद में पुलिस कमिश्नर प्रणाली लागू करने की एक वजह अपराधियों का हाईटेक हो जाना भी बताई गई है। प्रणाली लागू करने के प्रस्ताव में बताया गया है कि अपराधियों के अपराध करने के तौर-तरीके लगातार आधुनिक और जटिल होते जा रहे हैं। वे तेज रफ्तार वाहनों से लूट करते हैं और फुर्र हो जाते हैं। पुलिस के सामने चुनौतियां लगातार बढ़ रही हैं। ऐसे में पुलिस को इन चुनौतियों के लिए तैयार होना पड़ेगा। कुछ बदलाव करने होंगे।
संगठित अपराध भी तेजी से बढ़े हैं। गाजियाबाद में कॉल सेंटर के माध्यम से ठगी के मामले लगातार सामने आ रहे हैं। आरडीसी और टीएचए में 10 से ज्यादा फर्जी कॉल सेंटर पिछले दो साल में पकड़े जा चुके हैं। ये ठगी के लिए खोले गए और हजारों लोगों को ठगा। ड्रग्स की तस्करी भी तेजी से बढ़ी है। गाजियाबाद में पिछले एक साल में 200 किलो से ज्यादा गांजा पकड़ा गया है। चरस, अफीम और स्मैक भी लगातार पकड़ी जा रही है। जाहिर है नशे के सौदागरों का रैकेट बड़ा है जबकि पुलिस की कार्रवाई उतनी व्यापक नहीं है।
सबसे बड़ी चुनौती पुलिस के पास लोगों की जानकारी न होना है। गांव में तो कोई बाहर से आकर रहने लगे तो सबको पता चल जाता है लेकिन शहर में ऐसा नहीं है। बहुमंजिला इमारतों में कौन रह रहा है, वह कहां से आया है और उसका कोई अपराधिक इतिहास तो नहीं है... इसकी जानकारी पुलिस को नहीं होती। ट्रांस हिंडन क्षेत्र में कई बड़े अपराधी पकड़े जा चुके हैं जो पहचान छिपाकर रह रहे थे। ऑनलाइन गेम के जरिए ठगी का मास्टरमाइंड पश्चिमी बंगाल से भागकर यहीं पर रह रहा था। एक सटीक सूचना पर वह पकड़ा गया। देशविरोधी गतिविधि करने वाले संगठनों से जुड़े लोग भी टीएचए में छिपकर रह चुके हैं।
ये हैं वजह
1. अपराधियों के अपराध करने के तौर-तरीकों में बदलाव आना, तेज रफ्तार वाहनों का इस्तेमाल कर लूट करना।
2. साइबर अपराध में तेजी से उछाल खाना, खासकर फर्जी कॉल सेंटर खोलकर लोगों के साथ ठगी करने के मामले बढ़ना।
3. शहर में अपराधियों का पहचान छिपाकर रहना और पुलिस को उनकी जानकारी न मिल पाना।
4. नशे का कारोबार तेजी से फैलना। स्मैक, चरस और गांजे की तस्करी में संगठित गिरोह का हाथ सामने आना।
ऐसे बदलेगी व्यवस्था
पुरानी व्यवस्था
एसएसपी
एसपी सिटी/एसपी देहात
सीओ
नई व्यवस्था
पुलिस कमिश्नर
ज्वाइंट कमिश्नर
डिप्टी कमिश्नर
असिस्टेंट कमिश्नर
पुलिस अफसरों को कार्यकारी मजिस्ट्रेट के दिए गए अधिकार
1. क्रिमिनल प्रोसिजर कोड (सीआरपीसी) की धारा 20 के तहत पुलिस आयुक्त को कार्यकारी मजिस्ट्रेट के अधिकार दिए गए हैं। सीआरपीसी की धारा 21 के तहत संयुक्त पुलिस आयुक्त, अपर पुलिस आयुक्त, पुलिस उपायुक्त, अपर पुलिस उपायुक्त और सहायक पुलिस उपायुक्त को विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट के अधिकार दिए गए हैं।
2. दंड प्रक्रिया संहिता (आईपीसी) की धारा-58 के तहत लोक व्यवस्था एवं शांति बनाए रखने के लिए भी कार्यकारी मजिस्ट्रेट की शक्तियां दी गई हैं। साथ ही, अपराध नियंत्रण के लिए अलग-अलग अधिनियम के तहत कार्रवाई अब सीधे पुलिस कमिश्नर कर सकेंगे। मजिस्ट्रेट के पास फाइल नहीं भेजी जाएगी।
इन अधिनियम के मिले अधिकार
1. उत्तर प्रदेश गुंडा नियंत्रण अधिनियम, 1970
2. विष अधिनियम, 1919
3. अनैतिक व्यापार अधिनियम, 1956
4. पुलिस (द्रोह-उद्दीपन) अधिनियम, 1922
5. पशुओं के प्रति क्रूरता निवारण अधिनियम, 1960
6. विस्फोटक अधिनियम, 1884
7. कारागार अधिनियम, 1894
8. सरकारी गोपनीयता अधिनियम, 1923
9. विदेशी अधिनियम, 1946
10. गैर कानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम, 1967
11. भारतीय पुलिस अधिनियम, 1861
12. उत्तर प्रदेश अग्निश्मन सेवा अधिनियम, 1944
13. उत्तर प्रदेश अग्नि निवारण एवं अग्नि सुरक्षा अधिनियम, 2005
14. उत्तर प्रदेश गिरोहबंद और समाज विरोधी क्रियाकलाप (निवारण) अधिनियम, 1986