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बेटी के अपहरण की रिपोर्ट दर्ज कराई पर कोर्ट में नहीं दी गवाही

Ghaziabad Bureau गाजियाबाद ब्यूरो
Updated Fri, 15 Jul 2022 12:48 AM IST
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बेटी के अपहरण की रिपोर्ट दर्ज कराई पर कोर्ट में नहीं दी गवाही
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गाजियाबाद। बेटी के अपनी मर्जी से किसी के साथ चले जाने पर अपहरण की रिपोर्ट दर्ज कराने वाले 83 लोगों में से 74 अदालत में साफ मुकर गए। पॉक्सो कोर्ट का यह आंकड़ा इस साल जनवरी से जून तक का है। इनमें ज्यादातर गवाहों ने एक ही बात कही, पुलिस को तहरीर दी थी... ऐसा कुछ याद नहीं आ रहा। दरअसल, बेटी के जाने पर आवेश में आकर और समाजिक दबाव में लोग केस तो दर्ज करा देते हैं, कई लोग तो कार्रवाई के लिए हंगामा भी करते हैं लेकिन बाद में जब पता चलता है कि वह शादी कर चुकी तो मन बदलने में बहुत देर नहीं लगती। इन सभी 74 केस में आरोपी बरी हो गए। अन्य नौ मामलों में गवाह नहीं मुकरे, इनमें सजा हुई।
बार अध्यक्ष योगेंद्र कौशिक, लड़की के अपहरण के मामले में माता-पिता या भाई-बहन के मुकर जाने के मामले में और भी वजह बताते हैं, कई मामले ऐसे होते हैं कि जिनमें लड़की के किसी के साथ जाते समय उसके बालिग होने में कुछ समय बाकी रहता है। अगर वह तुरंत ही बरामद हो जाए तो लोग केस की पैरवी करते हैं लेकिन अगर देरी हो तो बेटी शादी कर चुकी होती है। अब जिसके खिलाफ केस दर्ज कराया, वह तो बेटी का पति बन चुका है तो लोगों को मन बदल जाता है।
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गैंगस्टर कोर्ट में 100 फीसदी सजा
गैंगस्टर एक्ट के केस पुलिस की ओर दर्ज किए जाते हैं। इनमें मुख्य गवाह पुलिसवाले होते हैं। छह महीने में गैंगस्टर कोर्ट में 22 मामलों में सुनवाई पूरी हुई। सभी में सजा सुनाई गई।
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604 केस में 168 में आरोपी बरी
अलग-अलग अदालतों में जनवरी से जून तक 604 मामलों में न्यायधीशों ने फैसला सुनाया। इनमें 436 मामलों में सजा हुई और 168 मामलों में अदालत ने बरी कर दिया।
साक्ष्य जुटाने में भी लापरवाही
जिला शासकीय अधिवक्ता राजेश चंद्र का कहना है कि काफी मामलों में पुलिस विवेचना में लापरवाही बरतती है और आरोपियों के खिलाफ पुख्ता साक्ष्य एकत्र कर पेश नहीं कर पाती है। कुछ मामलों में अदालत में पैरवी के दौरान गवाह पक्षद्रोही हो जाते हैं, इसका लाभ आरोपी को मिल जाता है।

गवाह न मुकरे तो सजा तय
संयुक्त निदेशक अभियोजन अनिल कुमार उपाध्याय का कहना है कि पीड़िता व गवाह घटना का समर्थन करें और बयान पर अडिग रहें तो अदालत से शत-प्रतिशत सजा मिल जाए लेकिन हर केस में ऐसा नहीं हो पाता है।
अदालत सजा बरी
मजिस्ट्रेट कोर्ट 245 29
सत्र न्यायाधीश 34 57
पॉक्सो 09 74
एससी/एसटी 02 08
गैंगेस्टर कोर्ट 22 00
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