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गाजियाबाद के सात गांवों से कभी नहीं बना कोई प्रधान
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गाजियाबाद के सात गांवों से कभी नहीं बना कोई प्रधान
गाजियाबाद। प्रदेश की सबसे बड़ी ग्राम पंचायत डासना देहात की कहानी भी सबसे अलग है। नौ गांवों को मिलाकर बनी 38 हजार वोटरों वाली इस ग्राम पंचायत के प्रधान पद पर इंद्रगढ़ी और कल्लूगढ़ी वालों का ही कब्जा रहा है। सात गांव ऐसे हैं जिनके पास इस ग्राम पंचायत की प्रधानी कभी नहीं रही।
डासना देहात ग्राम पंचायत में नौ गांव, इंद्रगढ़ी, सतीश कॉलोनी , मयूर विहार, कल्लूगढ़ी, उस्मान कालोनी, कुडियागढ़ी, गुर्जर गढ़ी, भूडगढ़ी और जेल कॉलोनी शामिल हैं। डासना देहात से पहले डासना के नाम से ग्राम पंचायत थी। साल 1985 में डासना को नगर पंचायत बना दिया गया। इसके बाद डासना देहात के नाम से ग्राम पंचायत बनी। वर्ष1985 से पहले अधिकतर प्रधान डासना गांव से ही बनते थे।डासना देहात ग्राम पंचायत के गठन के बाद से लगातार इंद्रगढ़ी और कल्लूगढ़ी गांव के रहने वाले ही ग्राम प्रधान बन रहे हैं। कुड़िया गढ़ी निवासी 80 वर्षीय फूंदन सिंह बताते हैं कि डासना देहात ग्राम पंचायत बनने के बाद कुड़िया गढ़ी गांव से 1988 में चतर लाल यादव प्रधान पद के लिए चुनाव लड़े, लेकिन वह चुनाव हार गए। इसके बाद से गांव में अभी तक कोई प्रधानी के लिए खड़ा नहीं हुआ है। यहां चुनाव भी काफी रोमांचकारी रहता है। अंत में जाकर इंद्रगढ़ी और कल्लूगढ़ी गांव के उम्मीदवारों के बीच ही मुख्य मुकाबला होता है इसलिए दूसरे गांवों से कोई चुनावी मैदान में उतरना ही नहीं चाहता है।
1957 में हाथ खड़ा करके चुना प्रधान
बुजुर्ग धीरज सिंह बताते हैं कि 1957 में जब डासना ग्राम पंचायत थी तो उस समय सभी गांव के लोगों को डासना किले पर बुलाकर प्रत्याशियों के पक्ष में हाथ खड़े कराए जाते थे, जिसके पक्ष में सबसे ज्यादा हाथ उठते थे। उसे प्रधान घोषित कर दिया जाता था। 1962 में बैलेट पेपर से मतदान शुरू हुआ। तब से चुनाव होते आ रहे हैं। पहली बार मतदान से चुनाव होने पर लहरम प्रधान बने थे। डासना के अंतिम प्रधान लाला जयप्रकाश बने थे।
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अब बिरादरी का रह गया है गांव का चुनाव
कुड़िया गढ़ी निवासी युवा ललित कुमार बताते हैं कि अब गांव का चुनाव ईमानदारी का नहीं रहा है। अब बिरादरी का चुनाव हो गया है। गांव में जिस बिरादरी के लोग ज्यादा होंगे, उसी बिरादरी का प्रधान बनेगा। चाहे उसके अंदर कोई योग्यता हो या न हो। वह गांव का विकास करा पाएगा या नहीं करा पाएगा। इससे भी गांव की जनता को कुछ लेना देना नहीं है। फिर बाद में उस प्रत्याशी को पांच वर्ष तक झेलते हैं। इसलिए गांव के लोग अपना प्रतिनिधि शिक्षित और विकास कराने वाला चुनें।
इन गांव के लोगों में प्रधानी लड़ने की रुचि कम
ब्रहमपाल यादव का कहना है कि इंद्रगढ़ी और कल्लूगढ़ी गांव में आठ हजार से अधिक मतदाता हैं। इसलिए प्रधान इन्हीं गांवों के लोग बनते हैं। कुछ गांव को काटकर अलग ग्राम पंचायत बनाई जाए, जिससे अन्य गांव के लोग भी प्रधान बन सकें। उन्होंने बताया कि वह खुद भी चुनाव लड़ना चाहते थे, लेकिन आरक्षण के कारण नहीं लड़ सके।
डासना देहात से पहले खोड़ा थी सबसे बड़ी ग्राम पंचायत
डासना देहात से पहले सूबे में सबसे बड़ी ग्राम पंचायत गाजियाबाद जिले की खोड़ा थी। खोड़ा अब नगर पालिका है। इसलिए डासना देहात ही सूबे की सबसे बड़ी ग्राम पंचायत है।
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गाजियाबाद। प्रदेश की सबसे बड़ी ग्राम पंचायत डासना देहात की कहानी भी सबसे अलग है। नौ गांवों को मिलाकर बनी 38 हजार वोटरों वाली इस ग्राम पंचायत के प्रधान पद पर इंद्रगढ़ी और कल्लूगढ़ी वालों का ही कब्जा रहा है। सात गांव ऐसे हैं जिनके पास इस ग्राम पंचायत की प्रधानी कभी नहीं रही।
डासना देहात ग्राम पंचायत में नौ गांव, इंद्रगढ़ी, सतीश कॉलोनी , मयूर विहार, कल्लूगढ़ी, उस्मान कालोनी, कुडियागढ़ी, गुर्जर गढ़ी, भूडगढ़ी और जेल कॉलोनी शामिल हैं। डासना देहात से पहले डासना के नाम से ग्राम पंचायत थी। साल 1985 में डासना को नगर पंचायत बना दिया गया। इसके बाद डासना देहात के नाम से ग्राम पंचायत बनी। वर्ष1985 से पहले अधिकतर प्रधान डासना गांव से ही बनते थे।डासना देहात ग्राम पंचायत के गठन के बाद से लगातार इंद्रगढ़ी और कल्लूगढ़ी गांव के रहने वाले ही ग्राम प्रधान बन रहे हैं। कुड़िया गढ़ी निवासी 80 वर्षीय फूंदन सिंह बताते हैं कि डासना देहात ग्राम पंचायत बनने के बाद कुड़िया गढ़ी गांव से 1988 में चतर लाल यादव प्रधान पद के लिए चुनाव लड़े, लेकिन वह चुनाव हार गए। इसके बाद से गांव में अभी तक कोई प्रधानी के लिए खड़ा नहीं हुआ है। यहां चुनाव भी काफी रोमांचकारी रहता है। अंत में जाकर इंद्रगढ़ी और कल्लूगढ़ी गांव के उम्मीदवारों के बीच ही मुख्य मुकाबला होता है इसलिए दूसरे गांवों से कोई चुनावी मैदान में उतरना ही नहीं चाहता है।
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1957 में हाथ खड़ा करके चुना प्रधान
बुजुर्ग धीरज सिंह बताते हैं कि 1957 में जब डासना ग्राम पंचायत थी तो उस समय सभी गांव के लोगों को डासना किले पर बुलाकर प्रत्याशियों के पक्ष में हाथ खड़े कराए जाते थे, जिसके पक्ष में सबसे ज्यादा हाथ उठते थे। उसे प्रधान घोषित कर दिया जाता था। 1962 में बैलेट पेपर से मतदान शुरू हुआ। तब से चुनाव होते आ रहे हैं। पहली बार मतदान से चुनाव होने पर लहरम प्रधान बने थे। डासना के अंतिम प्रधान लाला जयप्रकाश बने थे।
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अब बिरादरी का रह गया है गांव का चुनाव
कुड़िया गढ़ी निवासी युवा ललित कुमार बताते हैं कि अब गांव का चुनाव ईमानदारी का नहीं रहा है। अब बिरादरी का चुनाव हो गया है। गांव में जिस बिरादरी के लोग ज्यादा होंगे, उसी बिरादरी का प्रधान बनेगा। चाहे उसके अंदर कोई योग्यता हो या न हो। वह गांव का विकास करा पाएगा या नहीं करा पाएगा। इससे भी गांव की जनता को कुछ लेना देना नहीं है। फिर बाद में उस प्रत्याशी को पांच वर्ष तक झेलते हैं। इसलिए गांव के लोग अपना प्रतिनिधि शिक्षित और विकास कराने वाला चुनें।
इन गांव के लोगों में प्रधानी लड़ने की रुचि कम
ब्रहमपाल यादव का कहना है कि इंद्रगढ़ी और कल्लूगढ़ी गांव में आठ हजार से अधिक मतदाता हैं। इसलिए प्रधान इन्हीं गांवों के लोग बनते हैं। कुछ गांव को काटकर अलग ग्राम पंचायत बनाई जाए, जिससे अन्य गांव के लोग भी प्रधान बन सकें। उन्होंने बताया कि वह खुद भी चुनाव लड़ना चाहते थे, लेकिन आरक्षण के कारण नहीं लड़ सके।
डासना देहात से पहले खोड़ा थी सबसे बड़ी ग्राम पंचायत
डासना देहात से पहले सूबे में सबसे बड़ी ग्राम पंचायत गाजियाबाद जिले की खोड़ा थी। खोड़ा अब नगर पालिका है। इसलिए डासना देहात ही सूबे की सबसे बड़ी ग्राम पंचायत है।