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निगम की अरबों की जमीन पर खड़ी हो गईं इमारतें

अमर उजाला, गाजियाबाद Updated Sat, 20 May 2017 10:22 PM IST
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सांकेतिक चित्र
सांकेतिक चित्र - फोटो : getty images

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गाजियाबाद। योगी सरकार में भी भूमाफिया बेखौफ हैं। धड़ल्ले से जमीनें कब्जाकर बेची जा रही हैं। ‘एंटी भूमाफिया टास्क फोर्स’ का गठन होने के बाद भी इन भूमाफियाओं पर लगाम कसना आसान नहीं दिख रहा। शहर में अकेले नगर निगम की अरबों की जमीन पर अवैध कब्जे हो चुके हैं।
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दिल्ली से सटे होने की वजह से भूमाफियाओं की नजर गाजियाबाद में खाली पड़ी सरकारी जमीनों पर टिकी है। डूंडाहेड़ा, विजय नगर, प्रताप विहार, अकबरपुर-बहरामपुर, मवई, सिद्धार्थ नगर, नूरनगर, सिहानी, करहेड़ा, अर्थला समेत कई गांवों की जमीन पर सिर्फ कब्जे ही नहीं बल्कि इमारतें तक खड़ी हो चुकी हैं। ऐसे में अब इतनी बड़ी तादाद में मकानों को गिराकर जमीन खाली कराना टास्क फोर्स के लिए बड़ी चुनौती होगी।


85 बीघा की चरागाह हुई खत्म
अकबरपुर-बहरामपुर में 85 बीघा जमीन चरागाह के लिए छोड़ी गई थी। पहले यहां पर जानवरों को चराया जाता था और यह जमीन सरकारी रिकार्ड में आज भी चरागाह के रूप में दर्ज है। इस जमीन का टाइटल बदला नहीं जा सकता लेकिन अब यहां पक्के मकान बन चुके हैं।

भूमाफियाओं ने इस सरकारी जमीन पर प्लाटिंग कर बेच दी है। राजकुमार नाम के एक व्यक्ति ने चरागाह की जमीन खाली कराने के लिए हाईकोर्ट में गुहार लगाई थी। हाईकोर्ट भी जमीन खाली कराने का आदेश दे चुका है और कोर्ट के आदेश पर दो बार ज्वाइंट पैमाइश भी हो चुकी है। बावजूद इसके जमीन खाली नहीं कराई जा सकी है।

राजनगर एक्सटेंशन में गुम हो गई 1500 करोड़ की जमीन
राजनगर एक्सटेंशन के बीच आ चुकी निगम की बेशकीमती 60 एकड़ से ज्यादा जमीन निगम के रिकार्ड में तो है लेकिन मौके पर इसका कोई अता-पता नहीं। सरकारी जमीन पर भूमाफिया प्लाटिंग कर रहे हैं। नूरनगर, सद्दीक नगर, नंदग्राम और करहेड़ा क्षेत्र में सरकारी जमीन को प्राइवेट बताकर बेचा जा रहा है।

करीब 1500 करोड़ की कीमत वाली इस जमीन को चिह्नित कराने के लिए नगर निगम ने मंडलायुक्त से मदद मांगी थी। निगम के संपत्ति विभाग ने मंडलायुक्त को उन खसरा नंबरों की भी लिस्ट भेजी है जो सरकारी रिकार्ड में नगर निगम के नाम है। बावजूद इसके अब तक न तो यहां ज्वाइंट पैमाइश हुई और न ही जमीन से कब्जे हटे।

ऐसे बेची जा रही है सरकारी जमीन
भूमाफिया सबसे पहले सरकारी जमीन का रिकार्ड तहसील से निकलवाते हैं और खाली पड़ी सरकारी जमीन के आसपास थोड़ी प्राइवेट जमीन खरीद लेते हैं। इसके बाद प्राइवेट जमीन का सौदा किया जाता है, रजिस्ट्री भी प्राइवेट जमीन की होती है लेकिन कब्जा सरकारी जमीन पर दे दिया जाता है।

जमीन खरीदने वाले लोग अगर तहसील का रिकार्ड देखते हैं तो उन्हें इस धांधली का पता नहीं चलता और भोले-भाले लोग भूमाफियाओं के जाल में फंस जाते हैं। इसके बाद भूमाफिया प्लॉट बेचकर चले जाते हैं लेकिन नुकसान खरीदारों का होता है।

बिल्डर्स प्रोजेक्ट में भी फंसी है निगम की जमीन
नगर निगम की बेशकीमती जमीन सिर्फ भूमाफिया ही नहीं बेच रहे बल्कि प्राइवेट बिल्डर्स के प्रोजेक्ट के बीच में भी निगम की जमीन फंसी हुई है। नियमों के मुताबिक बिल्डर प्रोजेक्ट में बीच में आ रही नाली, चकरोड़, या बंजर जमीन को बोर्ड से सहमति लेकर एक्सचेंज किया जा सकता है।

इसके बदले में बिल्डर समान कीमत की जमीन प्रोजेक्ट के किसी ऐसे हिस्से पर छोड़ सकते हैं जिसका रास्ता हो, लेकिन यहां इसमें भी धांधली हो रही है। कई प्रोजेक्ट में बिल्डर्स और निगम अफसरों की मिलीभगत से इन जमीन का सेटलमेंट किया जा चुका है। ऐसे मामलों की जांच हो तो कई बड़े घोटाले सामने आ सकते हैं।

टास्क फोर्स बनी, डीएम और नगरायुक्त भी हुए शामिल
मंडलायुक्त की अध्यक्षता में एंटी भूमाफिया टास्क फोर्स का गठन हो गया है। जिला स्तर पर बनने वाली इस टास्क फोर्स में डीएम, एसएसपी, मुख्य वन संरक्षक, जीडीए वीसी, नगरायुक्त को शामिल किया गया है।

मंडल स्तर पर इस टास्क फोर्स में आईजी, डीआईजी, चीफ इंजीनियर पीडब्ल्यूडी, चीफ इंजीनियर सिंचाई विभाग और उपनिदेशक पंचायत राज भी शामिल रहेंगे। मंडलायुक्त ने संबंधित अधिकारियों को पत्र भेजकर इसकी जानकारी दे दी है। जल्द ही इस टास्क फोर्स की मीटिंग होगी, जिसमें अतिक्रमण हटाने की प्लानिंग की जाएगी।

सरकारी जमीनों को कब्जामुक्त कराने के लिए निगम स्तर पर भी कार्रवाई की जा रही है। बीते दिनों मंडलायुक्त को पत्र भेजकर सरकारी जमीनों की ज्वाइंट पैमाइश कराकर उन्हें चिह्नित करने की मांग की गई थी। मंडलायुक्त की ओर से कमेटी बन चुकी है। जल्द ही सरकारी जमीनों को खाली कराने की प्रक्रिया शुरू की जाएगी। - अशु वर्मा, महापौर

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