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Ghaziabad News: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बंदर उपद्रव नियंत्रण की मांगी कार्ययोजना
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गाजियाबाद। प्रदेश में बंदरों के बढ़ते उपद्रव और मानव-बंदर संघर्ष को इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने गंभीरता से लेते हुए केंद्र और राज्य सरकार से इस समस्या से निपटने के लिए विस्तृत कार्ययोजना पेश करने को कहा है। न्यायालय ने विशेष रूप से भारतीय पशु कल्याण बोर्ड (एडब्ल्यूबीआई), प्रदेश सरकार, राज्य पशु कल्याण बोर्ड और अन्य संबंधित संस्थाओं को निर्देश दिया है कि वे 19 सितंबर से पहले अपनी योजनाओं के साथ न्यायालय में उपस्थित हों।
यह आदेश मुख्य न्यायाधीश अरुण भंसाली और न्यायमूर्ति क्षितिज शैलेंद्र की खंडपीठ ने शुक्रवार को दिया। न्यायालय का यह निर्देश विनीत शर्मा और बीटेक छात्रा प्राजक्ता सिंघल द्वारा दाखिल जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान आया। याचिका में मांग की गई है कि बंदरों से उत्पन्न खतरे को देखते हुए तत्काल प्रभाव से प्रभावी कार्ययोजना बनाई जाए। इसमें पर्याप्त पशु-चिकित्सा केंद्रों की स्थापना, बंदरों के लिए भोजन की व्यवस्था, उन्हें वन क्षेत्रों में पुनर्वासित करने की योजना, राहत और परिवहन वाहन की सुविधा और चौबीसों घंटे काम करने वाली शिकायत निवारण हेल्पलाइन पोर्टल की स्थापना शामिल है।
याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश हुए अधिवक्ता आकाश वशिष्ठ और पवन तिवारी ने न्यायालय को बताया कि बंदरों का उपद्रव अब केवल गाजियाबाद या किसी एक जिले की समस्या नहीं रह गई है, बल्कि यह पूरे प्रदेश में गंभीर रूप से फैल चुकी है। उन्होंने प्रयागराज और कौशांबी जिलों में बंदरों के हमलों के चलते हुई मौतों के समाचार पत्रों की कतरनें न्यायालय को दिखाईं और कहा कि यह चौंकाने वाली बात है कि राज्य सरकार अब तक इस विषय पर गंभीरता से कोई कदम नहीं उठा सकी है।
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कार्य योजना नहीं मिलने पर न्यायालय ने जताई थी नाराजगी
इससे पहले 6 मई 2025 को भी न्यायालय ने केंद्र और राज्य के विभिन्न प्राधिकरणों से उनकी कार्ययोजना मांगी थी। इसके तहत भारतीय पशु कल्याण बोर्ड, पर्यावरण मंत्रालय, उत्तर प्रदेश राज्य सरकार, गाजियाबाद के जिलाधिकारी, नगर निगम, नगरपालिका परिषद और विकास प्राधिकरण सहित कई संस्थाओं को नोटिस भेजा था। हालांकि, 10 जुलाई 2025 की कार्यवाही में न तो भारतीय पशु कल्याण बोर्ड और न ही राज्य पशु कल्याण बोर्ड न्यायालय के समक्ष उपस्थित हुए। इस पर न्यायालय ने नाराजगी जताई थी। इस बीच गाजियाबाद जिलाधिकारी ने अपने हलफनामे में बताया कि उन्होंने 20 अगस्त को राज्य के शहरी विकास और पर्यावरण विभाग के प्रमुख सचिव को पत्र भेजकर बंदरों से निपटने के लिए दिशा-निर्देश और एसओपी तैयार करने का अनुरोध किया है। याचिका में यह भी कहा गया है कि संविधान के अनुच्छेद 21 के अंतर्गत नागरिकों के जीवन के अधिकार और पशुओं के अधिकारों के बीच संतुलन बनाना आवश्यक है। न्यायालय ने इस विषय को गंभीर मानते हुए सभी संबंधित एजेंसियों से ठोस कार्ययोजना जल्द प्रस्तुत करने को कहा है।
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यह आदेश मुख्य न्यायाधीश अरुण भंसाली और न्यायमूर्ति क्षितिज शैलेंद्र की खंडपीठ ने शुक्रवार को दिया। न्यायालय का यह निर्देश विनीत शर्मा और बीटेक छात्रा प्राजक्ता सिंघल द्वारा दाखिल जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान आया। याचिका में मांग की गई है कि बंदरों से उत्पन्न खतरे को देखते हुए तत्काल प्रभाव से प्रभावी कार्ययोजना बनाई जाए। इसमें पर्याप्त पशु-चिकित्सा केंद्रों की स्थापना, बंदरों के लिए भोजन की व्यवस्था, उन्हें वन क्षेत्रों में पुनर्वासित करने की योजना, राहत और परिवहन वाहन की सुविधा और चौबीसों घंटे काम करने वाली शिकायत निवारण हेल्पलाइन पोर्टल की स्थापना शामिल है।
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याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश हुए अधिवक्ता आकाश वशिष्ठ और पवन तिवारी ने न्यायालय को बताया कि बंदरों का उपद्रव अब केवल गाजियाबाद या किसी एक जिले की समस्या नहीं रह गई है, बल्कि यह पूरे प्रदेश में गंभीर रूप से फैल चुकी है। उन्होंने प्रयागराज और कौशांबी जिलों में बंदरों के हमलों के चलते हुई मौतों के समाचार पत्रों की कतरनें न्यायालय को दिखाईं और कहा कि यह चौंकाने वाली बात है कि राज्य सरकार अब तक इस विषय पर गंभीरता से कोई कदम नहीं उठा सकी है।
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कार्य योजना नहीं मिलने पर न्यायालय ने जताई थी नाराजगी
इससे पहले 6 मई 2025 को भी न्यायालय ने केंद्र और राज्य के विभिन्न प्राधिकरणों से उनकी कार्ययोजना मांगी थी। इसके तहत भारतीय पशु कल्याण बोर्ड, पर्यावरण मंत्रालय, उत्तर प्रदेश राज्य सरकार, गाजियाबाद के जिलाधिकारी, नगर निगम, नगरपालिका परिषद और विकास प्राधिकरण सहित कई संस्थाओं को नोटिस भेजा था। हालांकि, 10 जुलाई 2025 की कार्यवाही में न तो भारतीय पशु कल्याण बोर्ड और न ही राज्य पशु कल्याण बोर्ड न्यायालय के समक्ष उपस्थित हुए। इस पर न्यायालय ने नाराजगी जताई थी। इस बीच गाजियाबाद जिलाधिकारी ने अपने हलफनामे में बताया कि उन्होंने 20 अगस्त को राज्य के शहरी विकास और पर्यावरण विभाग के प्रमुख सचिव को पत्र भेजकर बंदरों से निपटने के लिए दिशा-निर्देश और एसओपी तैयार करने का अनुरोध किया है। याचिका में यह भी कहा गया है कि संविधान के अनुच्छेद 21 के अंतर्गत नागरिकों के जीवन के अधिकार और पशुओं के अधिकारों के बीच संतुलन बनाना आवश्यक है। न्यायालय ने इस विषय को गंभीर मानते हुए सभी संबंधित एजेंसियों से ठोस कार्ययोजना जल्द प्रस्तुत करने को कहा है।