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खतरे में अधिग्रहण... देर रात तक चला अफसरों में मंथन
Updated Wed, 29 Nov 2017 12:34 AM IST
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खतरे में अधिग्रहण... देर रात तक हुआ मंथन
मधुबन-बापूधाम की 281 एकड़ जमीन का मामला: जीडीए के पास आज तक का ही समय
- सुप्रीम कोर्ट के आदेशानुसार 29 नवंबर तक करना है अधिग्रहण
अमर उजाला ब्यूरो
गाजियाबाद। मधुबन-बापूधाम योजना विस्तार के लिए 281 एकड़ जमीन का अधिग्रहण जीडीए के लिए जी का जंजाल बन गया है। किसानों को मुआवजा देने के लिए जीडीए अगर 1232 करोड़ का इंतजाम नहीं करता है तो यह भूमि अधिग्रहण रद्द हो सकता है। मुआवजे का इंतजाम करने के लिए जीडीए के पास मंगलवार शाम तक कोई ठोस इंतजाम भी नहीं था। ऐसे मे मंगलवार शाम से देर रात तक जीडीए और प्रशासनिक अफसर रुपयों के इंतजाम के लिए मंथन करते रहे।
जीडीए वीसी एवं डीएम रितु माहेश्वरी ने मंगलवार शाम को जीडीए और प्रशासनिक अफसरों के साथ कलक्ट्रेट सभागार में बैठक बुलाई थी। यह बैठक मधुबन बापूधाम की 281 एकड़ जमीन के अधिग्रहण से पहले 1232 करोड़ के इंतजाम को लेकर थी। सूत्रों की माने तो देर रात अफसर मुआवजे के इंतजाम को कोई एक राय नहीं बन पाई थी। कोई भी अफसर इस मामले मे बोलने को तैयार नहीं था।
क्या है मामला:
जीडीए ने मधुबन बापूधाम योजना के लिए वर्ष 2004 में छह गांवों की 1234 एकड़ जमीन अधिग्रहण का काम शुरू किया। करीब 800 एकड़ जमीन को लेकर करार हुआ, लेकिन शेष 434 एकड़ जमीन का मामला मुआवजे की रार में फंस गया। इस लेकर किसान व सहारा ग्रुप हाईकोर्ट चला गया। कोर्ट ने फैसला जीडीए के पक्ष में दिया। इसी बीच किसान नए भूमि अधिग्रहण कानून के हिसाब से मुआवजे की मांग को लेकर सुप्रीम कोर्ट चले गए। 30 नवंबर 2016 को सुप्रीम कोर्ट ने किसानों के पक्ष में फैसला सुनाया। सुप्रीम कोर्ट ने जीडीए को आदेश दिया कि 2013 भूमि अधिग्रहण के नए कानून के हिसाब से किसानों को मुआवजा का भुगतान किया जाए। इसके लिए सुप्रीम कोर्ट ने जीडीए को आदेश दिया था कि भूमि अधिग्रहण का यह कार्य 29 नवंबर 2017 तक अवश्य ही पूरा कर लिया जाए।
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कभी हुडको तो कभी बैंक से मांगा कर्ज
किसानों को मुआवजा दिए जाने के लिए जीडीए ने पूर्व में हुडको से एक हजार करोड़ का कर्ज मांगा था। हुडको ने सिर्फ 700 करोड़ के कर्ज को मंजूरी दी थी। इसके साथ ही हुडको ने शर्त लगा दी थी कि इस 700 करोड़ के लोन की एवज में जीडीए अपनी संपत्ति बंधक रखेगा। ऐसे में जीडीए के सामने इस बात की टेंशन हो गई कि अगर जीडीए अपनी संपत्ति को बंधक रखता है तो कई साल तक वह कोई योजना को परवान नहीं चढ़ा पाएगा। इसी माह के पहले सप्ताह में जीडीए ने कर्ज के लिए इलाहाबाद बैंक से बात शुरू की। इलाहाबाद बैंक ने हुडको से कम ब्याज दर पर बिना संपत्ति बंधक रखे 800 करोड़ के लोन को मंजूरी दे दी, मगर जीडीए ने अभी इलाहाबाद बैंक से भी यह रकम भी नहीं ली है।
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भूमि अधिग्रहण न होने से अटके पडे़ हैं कई काम
किसानों और जीडीए के बीच चली आ रही मुआवजे की इस जंग का ही कारण है कि मधुबन बापूधाम योजना कई साल बीत जाने केबाद भी परवान नहीं चढ़ पा रही है। इस योजना में न तो अभी सीवर व्यवस्था दुरुस्त हो सकी है और न ही पानी की। अवागमन के लिए मुख्य रास्ता भी तैयार नहीं हो सका है। मधुबन बापूधाम योजना से जीडीए को काफी उम्मीदे हैं। यही योजना आर्थिक तंगी से जूझ रहे जीडीए को बाहर निकाल सकती है, मगर फिलहाल मुआवजा विवाद में उलझी हुई है।
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अर्जन मुक्त करना हो सकता है अंतिम उपाय
281 एकड़ जमीन अर्जन मुक्त करना ही जीडीए के लिए अंतिम उपाय हो सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि अर्जन मुक्त करके जीडीए न केवल सुप्रीम कोर्ट के आदेश से बच जाएगा, बल्कि उसे हुडको या इलाहाबाद बैंक से भारी भरकम कर्ज भी नहीं लेना पड़ेगा। जीडीए को 2006 से लेकर अब तक मुआवजे पर 15 प्रतिशत ब्याज से भी मुक्ति मिल जाएगी। इसके साथ ही अरजेंसी क्लोज के रूप में कुल मुआवजा राशि पर 75 प्रतिशत अतिरिक्त रकम का भी भुगतान नहीं करना पडे़गा।
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मधुबन-बापूधाम की 281 एकड़ जमीन का मामला: जीडीए के पास आज तक का ही समय
- सुप्रीम कोर्ट के आदेशानुसार 29 नवंबर तक करना है अधिग्रहण
अमर उजाला ब्यूरो
गाजियाबाद। मधुबन-बापूधाम योजना विस्तार के लिए 281 एकड़ जमीन का अधिग्रहण जीडीए के लिए जी का जंजाल बन गया है। किसानों को मुआवजा देने के लिए जीडीए अगर 1232 करोड़ का इंतजाम नहीं करता है तो यह भूमि अधिग्रहण रद्द हो सकता है। मुआवजे का इंतजाम करने के लिए जीडीए के पास मंगलवार शाम तक कोई ठोस इंतजाम भी नहीं था। ऐसे मे मंगलवार शाम से देर रात तक जीडीए और प्रशासनिक अफसर रुपयों के इंतजाम के लिए मंथन करते रहे।
जीडीए वीसी एवं डीएम रितु माहेश्वरी ने मंगलवार शाम को जीडीए और प्रशासनिक अफसरों के साथ कलक्ट्रेट सभागार में बैठक बुलाई थी। यह बैठक मधुबन बापूधाम की 281 एकड़ जमीन के अधिग्रहण से पहले 1232 करोड़ के इंतजाम को लेकर थी। सूत्रों की माने तो देर रात अफसर मुआवजे के इंतजाम को कोई एक राय नहीं बन पाई थी। कोई भी अफसर इस मामले मे बोलने को तैयार नहीं था।
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क्या है मामला:
जीडीए ने मधुबन बापूधाम योजना के लिए वर्ष 2004 में छह गांवों की 1234 एकड़ जमीन अधिग्रहण का काम शुरू किया। करीब 800 एकड़ जमीन को लेकर करार हुआ, लेकिन शेष 434 एकड़ जमीन का मामला मुआवजे की रार में फंस गया। इस लेकर किसान व सहारा ग्रुप हाईकोर्ट चला गया। कोर्ट ने फैसला जीडीए के पक्ष में दिया। इसी बीच किसान नए भूमि अधिग्रहण कानून के हिसाब से मुआवजे की मांग को लेकर सुप्रीम कोर्ट चले गए। 30 नवंबर 2016 को सुप्रीम कोर्ट ने किसानों के पक्ष में फैसला सुनाया। सुप्रीम कोर्ट ने जीडीए को आदेश दिया कि 2013 भूमि अधिग्रहण के नए कानून के हिसाब से किसानों को मुआवजा का भुगतान किया जाए। इसके लिए सुप्रीम कोर्ट ने जीडीए को आदेश दिया था कि भूमि अधिग्रहण का यह कार्य 29 नवंबर 2017 तक अवश्य ही पूरा कर लिया जाए।
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कभी हुडको तो कभी बैंक से मांगा कर्ज
किसानों को मुआवजा दिए जाने के लिए जीडीए ने पूर्व में हुडको से एक हजार करोड़ का कर्ज मांगा था। हुडको ने सिर्फ 700 करोड़ के कर्ज को मंजूरी दी थी। इसके साथ ही हुडको ने शर्त लगा दी थी कि इस 700 करोड़ के लोन की एवज में जीडीए अपनी संपत्ति बंधक रखेगा। ऐसे में जीडीए के सामने इस बात की टेंशन हो गई कि अगर जीडीए अपनी संपत्ति को बंधक रखता है तो कई साल तक वह कोई योजना को परवान नहीं चढ़ा पाएगा। इसी माह के पहले सप्ताह में जीडीए ने कर्ज के लिए इलाहाबाद बैंक से बात शुरू की। इलाहाबाद बैंक ने हुडको से कम ब्याज दर पर बिना संपत्ति बंधक रखे 800 करोड़ के लोन को मंजूरी दे दी, मगर जीडीए ने अभी इलाहाबाद बैंक से भी यह रकम भी नहीं ली है।
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भूमि अधिग्रहण न होने से अटके पडे़ हैं कई काम
किसानों और जीडीए के बीच चली आ रही मुआवजे की इस जंग का ही कारण है कि मधुबन बापूधाम योजना कई साल बीत जाने केबाद भी परवान नहीं चढ़ पा रही है। इस योजना में न तो अभी सीवर व्यवस्था दुरुस्त हो सकी है और न ही पानी की। अवागमन के लिए मुख्य रास्ता भी तैयार नहीं हो सका है। मधुबन बापूधाम योजना से जीडीए को काफी उम्मीदे हैं। यही योजना आर्थिक तंगी से जूझ रहे जीडीए को बाहर निकाल सकती है, मगर फिलहाल मुआवजा विवाद में उलझी हुई है।
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अर्जन मुक्त करना हो सकता है अंतिम उपाय
281 एकड़ जमीन अर्जन मुक्त करना ही जीडीए के लिए अंतिम उपाय हो सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि अर्जन मुक्त करके जीडीए न केवल सुप्रीम कोर्ट के आदेश से बच जाएगा, बल्कि उसे हुडको या इलाहाबाद बैंक से भारी भरकम कर्ज भी नहीं लेना पड़ेगा। जीडीए को 2006 से लेकर अब तक मुआवजे पर 15 प्रतिशत ब्याज से भी मुक्ति मिल जाएगी। इसके साथ ही अरजेंसी क्लोज के रूप में कुल मुआवजा राशि पर 75 प्रतिशत अतिरिक्त रकम का भी भुगतान नहीं करना पडे़गा।