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जेपी आंदोलन में जेटली की रही महत्वपूर्ण भूमिका, दिल्ली से ही रख दी थी नींव
Sun, 25 Aug 2019 06:49 AM IST
Abhishek Singh
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: Abhishek Singh
Updated Sun, 25 Aug 2019 06:49 AM IST
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पूर्व वित्त मंत्री अरुण जेटली
- फोटो : PTI
जेपी आंदोलन बेशक बिहार से शुरू हुआ, लेकिन वह अरुण जेटली ही थे, जो दिल्ली में बैठकर आंदोलन की बुनियाद रख रहे थे। असल में दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ चुनाव जीतने के बाद 1974 में जेटली ने राष्ट्रीय छात्र नेता सम्मेलन बुलाया। इसमें देश की विशिष्ट अराजक स्थितियों को ध्यान में रखकर सत्ता का विरोध करते हुए व्यवस्था परिवर्तन की मांग का प्रस्ताव पारित हुआ।
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इसके फॉलोअप में तय हुआ कि हर प्रदेश में ऐसे ही छात्र नेता सम्मलेन होंगे। इसी कड़ी में पटना का सम्मेलन 17-18 फरवरी 1974 को हुआ। इसमें छात्र संघर्ष समिति का गठन हुआ। समिति ने प्रदेश में छात्रों के लिए कार्यक्रम तय किए। अरुण जेटली समेत खुद छात्र नेताओं ने भी पूरे प्रदेश में अपना दौरा रखा।
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आंदोलनात्मक गतिविधि के तौर पर तय हुआ कि 18 मार्च को विधानसभा का घेराव कर राज्यपाल को वहां प्रवेश नहीं करने देना है। इसी छात्र आंदोलन का अगला विस्तार जयप्रकाश आंदोलन व आपातकाल के तौर पर हुआ। आपातकाल के दिनों में जेटली ने जेल में जीवन गुजारे।
1977-78 के चुनाव में उनको चुनाव लड़ने व राष्ट्रीय कार्य समिति में शामिल होने का प्रस्ताव मिला, लेकिन विद्यार्थी परिषद में काम करने के आग्रह में उन्होंने दोनों प्रस्तावों से इनकार कर दिया। जेटली मित्रों के मित्र थे। जब यह मैं कहता हूं तो इसके पीछे अपना निजी अनुभव है। उनको खिलाने व शॉपिंग कराने का शौक था, खासतौर से संघ के प्रचारकों को।
इनके बारे में उनका नजरिया था कि प्रचारक अभाव में रहते हैं। इसलिए दिल्ली आने पर प्रचारकों की वह बहुत आवभगत करते। निजी तौर पर हमारे लिए तो वह काफी सहृदय थे। 1986 में जब दिल्ली आना हुआ तो वह कनॉट प्लेस के खादी ग्रामोद्योग की दुकान पर ले गए। वहां उन्होंने इतनी शॉपिंग कराई कि मुझे खुद मना करना पड़ा। वह अरुण जेटली ही थे, जिन्होंने 1989 के लोक सभा चुनाव में नई दिल्ली सीट का जिम्मा संभाला।
यहां से राष्ट्रीय अध्यक्ष लाल कृष्ण आडवाणी चुनाव लड़ रहे थे। पीयूष गोयल के साथ जेटली दिल्ली में रहकर लाल कृष्ण आडवाणी की रथ यात्रा के सूत्रधार रहे। उनका जाना हमारे लिए निजी नुकसान है, जिसकी भरपाई अब संभव नहीं।