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रोजगार देने वाले अब खुद बेरोजगार, अन्नदाता की हालत में सिर्फ आंसू
मुकेश शर्मा/अमर उजाला, फरीदाबाद
Updated Mon, 25 Apr 2016 03:02 PM IST
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- फोटो : अमर उजाला
एक दशक पहले तक आगरा नहर किनारे के जिन गांवों में खुशहाली का राज था, आज वहां कंगाली घर कर गई है। दो से ढाई हजार लोगों को रोजगार देने वाले किसान अब कहीं बेलदारी कर रहे हैं तो कहीं दूसरों के खेतों में काम करने को मजबूर हैं।
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यह स्थिति फरीदाबाद आईएमटी विकसित करने के लिए अधिग्रहीत जमीन के बाद किसानों की हुई। 2610 में से अधिकांश किसान परिवार अर्श से फर्श पर आ गए हैं, लेकिन प्रभावित किसानों को उनकी जमीन का पूरा मुआवजा नहीं मिल रहा है।
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जिला मुख्यालय से सटे आगरा नहर के किनारे चंदावली, मच्छगर, नवादा, मुजैड़ी, सौतई और ऊंचा गांव के संबंध में कहा जाता है कि यहां के किसानों की खुशहाली की दास्तां कभी बाहर के किसानों को भी प्रेरणा के तौर पर बताई जाती थी। इस जमीन पर अधिकांश सब्जी की फसल होती थी। दिल्ली की कई मंडियों में चंदावली की सब्जियां प्रख्यात थीं। खासकर हरी सब्जी यहां की पहचान बन गई थी।
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दर्जनों ट्रक सब्जी प्रतिदिन दिल्ली सहित पलवल, डबुआ और बल्लभगढ़ मंडियों में भेजी जाती थी। यहां की खेती से हो रही खुशहाली के चलते किसान बच्चों को नौकरी नहीं कराना चाहते थे। बिहार के करीब दो से ढाई हजार मजदूर यहां प्रतिवर्ष काम के लिए आते थे।
आईएमटी बनने के बाद बदल गई तस्वीर
आईएमटी बनने के बाद मात्र एक दशक में सब कुछ उलट-पलट हो गया। क्षेत्र में जमींदार कहे जाने वाले किसान दाने-दाने को मोहताज हो गए हैं। दो हजार एकड़ से अधिक जमीन के मालिकों में अनेक मजदूर बन गए। मुआवजे के लिए किसानों ने अनेक बार अफसर और जनप्रतिनिधियों का द्वार खटखटाया। धरना प्रदर्शन किए, लेकिन मुआवजा नहीं मिला। हाईकोर्ट के फैसले को आए डेढ़ साल हो गया है, लेकिन किसानों को अब भी मुआवजे का इंतजार ही है। इस स्थिति में अनेक परिवारों में बच्चों की शादी के भी लाले पड़ रहे हैं। आईएमटी किसान संघर्ष समिति के मीडिया प्रभारी गिर्राज धनखड़ कहते हैं कि मुआवजे के साथ उनके बच्चों को रोजगार मिलना चाहिए। तभी विकास होगा, अन्यथा किसान के आंखों में सदा आंसू ही रहेंगे।