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विश्व कैंसर दिवस: मरीजों के लिए प्रेरणा बनी कविता-आकृति, परिवारों को बना रही आत्मनिर्भर
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आकृति अपनी माँ कविता गुप्ता के साथ। वर्ल्ड कैंसर दिवस ।
- फोटो : Faridabad
फरीदाबाद (धनंजय चौहान )। कैंसर का नाम सुन कर जहां लोग घबरा जाते हैं। वहीं कुछ ऐसे भी हैं जिन्होंने अपनी हिम्मत और जज्बे से न केवल कैंसर को मात दी है। बल्कि दूसरों के लिए प्रेरणा भी बने। इन्हीं में से एक थे सेक्टर-37 अशोका एंक्लेव निवासी अरुण गुप्ता। उन्होंने करीब 20 साल तक बीमारी का डट कर सामना किया और कैंसर के खौफ पर जीत पाने के लिए विन ऑवर कैंसर संस्था की स्थापना की। उनकी मृत्यु के बाद इस मुहिम को अब उनकी पत्नी कविता और बेटी आकृति आगे बढ़ा रही हैं। कैंसर पीड़ितों को जागरूक करने के साथ ही उनके परिवार को रोजगार उपलब्ध करवा रही हैं।
कोरोना महामारी हजारों लोगों की नौकरी छूट गई। इसमें सबसे ज्यादा परेशानी कैंसर परिवार को उठानी पड़ी। इसके लिए अरुण ने लॉकडाउन में छूट मिलने के बाद सैकड़ों लोगों को उनके गृह क्षेत्र में नौकरियां दिलाई। हालांकि बीमारी से लंबी लड़ाई लड़ने के बाद पिछले दिनों उनका निधन हो गया। कविता ने बताया कि उनके अरुण बहुउद्देशीय कंपनी में वरिष्ठ सीए के पद पर नियुक्त थे। वर्ष 2011 में उनको ब्लड कैंसर होने के बारे में पता चला था। इलाज के लिए अरुण को अस्पताल में भर्ती कराया गया। करीब तीन साल तक लगातार इलाज चला। इस दौरान कैंसर से अरुण की नौकरी भी चली गई। नौकरी जाने के बाद परिवार को कई तरह की आर्थिक परेशानियों का भी सामना करना पड़ा।
कविता कैंसर पीड़ित महिलाओं को कुशल विकास के लिए प्रशिक्षण देती हैं। जिससे महिलाएं अपने पैरों पर खड़ी हो सकें। पिछले पांच साल में कैंसर जागरूकता को लेकर वह दो हजार वालंटियर तैयार कर चुकी हैं।
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लॉकडाउन में नौकरी जाने के बाद वह करीब 200 लोगों को दोबारा नौकरी लगवा चुकी हैं। वहीं, ब्रेस्ट कैंसर पीड़ित महिलाओं को प्रत्येक बुधवार को प्रोस्थेटिक ब्रा भी निशुल्क देती हैं। आकृति गुप्ता ने अपनी मां से प्रेरित होकर टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंस से सोशल इंटरप्रेन्योरशिप में मास्टर्स डिग्री हासिल की है। फिलहाल वे कैंसर मरीजों के परिवारों के लिए सेमिनार कर उन्हें आर्थिक रूप से सशक्त के गुण सिखाती हैं।
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कोरोना महामारी हजारों लोगों की नौकरी छूट गई। इसमें सबसे ज्यादा परेशानी कैंसर परिवार को उठानी पड़ी। इसके लिए अरुण ने लॉकडाउन में छूट मिलने के बाद सैकड़ों लोगों को उनके गृह क्षेत्र में नौकरियां दिलाई। हालांकि बीमारी से लंबी लड़ाई लड़ने के बाद पिछले दिनों उनका निधन हो गया। कविता ने बताया कि उनके अरुण बहुउद्देशीय कंपनी में वरिष्ठ सीए के पद पर नियुक्त थे। वर्ष 2011 में उनको ब्लड कैंसर होने के बारे में पता चला था। इलाज के लिए अरुण को अस्पताल में भर्ती कराया गया। करीब तीन साल तक लगातार इलाज चला। इस दौरान कैंसर से अरुण की नौकरी भी चली गई। नौकरी जाने के बाद परिवार को कई तरह की आर्थिक परेशानियों का भी सामना करना पड़ा।
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कविता कैंसर पीड़ित महिलाओं को कुशल विकास के लिए प्रशिक्षण देती हैं। जिससे महिलाएं अपने पैरों पर खड़ी हो सकें। पिछले पांच साल में कैंसर जागरूकता को लेकर वह दो हजार वालंटियर तैयार कर चुकी हैं।
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लॉकडाउन में नौकरी जाने के बाद वह करीब 200 लोगों को दोबारा नौकरी लगवा चुकी हैं। वहीं, ब्रेस्ट कैंसर पीड़ित महिलाओं को प्रत्येक बुधवार को प्रोस्थेटिक ब्रा भी निशुल्क देती हैं। आकृति गुप्ता ने अपनी मां से प्रेरित होकर टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंस से सोशल इंटरप्रेन्योरशिप में मास्टर्स डिग्री हासिल की है। फिलहाल वे कैंसर मरीजों के परिवारों के लिए सेमिनार कर उन्हें आर्थिक रूप से सशक्त के गुण सिखाती हैं।