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Faridabad News: मिट्टी से बने बर्तनों को महिलाएं कर रहीं काफी पसंद
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बल्लभगढ़। 39वां अंतरराष्ट्रीय सूरजकुंड मेला इस बार भी अपनी पारंपरिक कला और संस्कृति के रंगों से सजा हुआ है। मेले में जहां देश-विदेश से आए शिल्पकार अपनी कला का प्रदर्शन कर रहे हैं, वहीं महिलाओं और युवतियों में भी पारंपरिक कुम्हार कला यानी चाक चलाने को लेकर खासा उत्साह देखने को मिल रहा है।
मिट्टी के बर्तनों को आकार देने की यह प्राचीन कला मेले का प्रमुख आकर्षण बन गई है। अपना घर के समीप महिलाएं और युवतियां अपने हाथों से मिट्टी को खूबसूरत सामान व बर्तनों का आकार दे रही हैं। यहां बड़ी संख्या में महिलाएं और युवतियां चाक पर हाथ आजमाती नजर आ रही हैं। सूरजकुंड मेले में प्रशिक्षित कारीगर उन्हें चाक चलाने की बारीकियां सिखा रहे हैं, कैसे मिट्टी को संतुलित रखा जाए, किस तरह हाथों का दबाव नियंत्रित किया जाए और कैसे कुछ ही मिनटों में मिट्टी एक सुंदर बर्तन का रूप ले लेती है।
पहली बार इस कला को आजमाने वाली युवतियों के चेहरों पर उत्साह और जिज्ञासा साफ दिखाई दे रही है। कई महिलाओं का कहना है कि तेज रफ्तार आधुनिक जीवन में इस तरह की पारंपरिक गतिविधियां उन्हें भारतीय संस्कृति से जोड़ने का अवसर देती हैं। कुछ ने इसे तनाव दूर करने का बेहतरीन तरीका बताया, तो कुछ ने भविष्य में इसे एक शौक के रूप में अपनाने की इच्छा जताई।
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वहीं, कारीगरों का मानना है कि जब नई पीढ़ी इस कला में रुचि दिखाती है, तो इससे पारंपरिक शिल्प को जीवित रखने में मदद मिलती है। महिलाओं और युवतियों की बढ़ती भागीदारी यह दर्शाती है कि परंपराएं आज भी लोगों के दिलों में बसती हैं। चाक पर घूमती मिट्टी के साथ यहां केवल बर्तन ही नहीं बन रहे, बल्कि संस्कृति और रचनात्मकता की नई कहानियां भी आकार ले रही हैं।
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मिट्टी के बर्तनों को आकार देने की यह प्राचीन कला मेले का प्रमुख आकर्षण बन गई है। अपना घर के समीप महिलाएं और युवतियां अपने हाथों से मिट्टी को खूबसूरत सामान व बर्तनों का आकार दे रही हैं। यहां बड़ी संख्या में महिलाएं और युवतियां चाक पर हाथ आजमाती नजर आ रही हैं। सूरजकुंड मेले में प्रशिक्षित कारीगर उन्हें चाक चलाने की बारीकियां सिखा रहे हैं, कैसे मिट्टी को संतुलित रखा जाए, किस तरह हाथों का दबाव नियंत्रित किया जाए और कैसे कुछ ही मिनटों में मिट्टी एक सुंदर बर्तन का रूप ले लेती है।
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पहली बार इस कला को आजमाने वाली युवतियों के चेहरों पर उत्साह और जिज्ञासा साफ दिखाई दे रही है। कई महिलाओं का कहना है कि तेज रफ्तार आधुनिक जीवन में इस तरह की पारंपरिक गतिविधियां उन्हें भारतीय संस्कृति से जोड़ने का अवसर देती हैं। कुछ ने इसे तनाव दूर करने का बेहतरीन तरीका बताया, तो कुछ ने भविष्य में इसे एक शौक के रूप में अपनाने की इच्छा जताई।
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वहीं, कारीगरों का मानना है कि जब नई पीढ़ी इस कला में रुचि दिखाती है, तो इससे पारंपरिक शिल्प को जीवित रखने में मदद मिलती है। महिलाओं और युवतियों की बढ़ती भागीदारी यह दर्शाती है कि परंपराएं आज भी लोगों के दिलों में बसती हैं। चाक पर घूमती मिट्टी के साथ यहां केवल बर्तन ही नहीं बन रहे, बल्कि संस्कृति और रचनात्मकता की नई कहानियां भी आकार ले रही हैं।