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भूजल दोहन की मार : पांच साल में 30.56 सेमी धंसी शहर की जमीन

Wed, 01 Jul 2026 12:22 AM IST
Noida Bureau नोएडा ब्यूरो
Updated Wed, 01 Jul 2026 12:22 AM IST
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The Toll of Groundwater Extraction: City Land Subsides by 30.56 cm in Five Years
भूजल निकालकर पानी शुद्व करता आरओ प्लांट। अमर उजाला
शोध से बढ़ी चिंता, मौजूदा स्थिति नहीं बदली तो शहर के कई हिस्सों में सिंकहोल बन जाएगा
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राहुल राज
फरीदाबाद। प्रदेश की औद्योगिक राजधानी में अंधाधुंध भूजल दोहन अब केवल पेयजल संकट तक सीमित नहीं रह गया है। शहर की जमीन भी इसकी कीमत चुकाने लगी है। कैंब्रिज यूनिवर्सिटी समेत अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिकों के शोध ने चेतावनी दी है कि यदि मौजूदा स्थिति नहीं बदली तो शहर के कई हिस्सों में सिंकहोल बन जाएगा। सिंकहोल अपनी जद में भवनों, सड़कों और अन्य बुनियादी ढांचों को समेट लेगा।
कैंब्रिज यूनिवर्सिटी के पीएचडी शोधार्थी शगुन गर्ग, आईआईटी बॉम्बे के प्रो. इंदू जया, अमेरिका की साउदर्न मेथोडिस्ट यूनिवर्सिटी के वामशी कर्णम और जर्मन सेंटर फॉर जियो साइंसेस के प्रो. महदी मोटाघ ने स्टडी की है। शोध में 2014 से 2020 के बीच सेंटिनल-1 सैटेलाइट और पीएस-इनसार तकनीक के माध्यम से भूमि धंसाव का विश्लेषण किया गया है। रिपोर्ट के अनुसार पांच साल में जिले में करीब 30.56 सेंटीमीटर तक जमीन धंस चुकी है। साल 2014 से 2016 के दौरान भूमि धंसने की दर 2.15 सेंटीमीटर प्रतिवर्ष रही। इसके बाद साल 2016 से 2018 के बीच यह बढ़कर 5.3 सेंटीमीटर प्रतिवर्ष पहुंच गई। साल 2018 से 2019 के दौरान यह दर 7.83 सेंटीमीटर प्रतिवर्ष दर्ज की गई।
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वैज्ञानिकों का कहना है कि भूमि धंसाव की बढ़ती रफ्तार का सबसे बड़ा कारण तेजी से गिरता भूजल स्तर और अनियंत्रित भूजल दोहन है। शोध में यह भी सामने आया कि फरीदाबाद में भूजल स्तर गिरने की दर लगभग पांच मीटर प्रतिवर्ष तक दर्ज की गई, जो पूरे एनसीआर में सबसे अधिक है। जमीन धंसने की सबसे तेज रफ्तार एनआईटी और संजय गांधी मेमोरियल नगर में है।
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20 साल में 10.31 मीटर नीचे पहुंचा भूजल स्तर
हरियाणा ग्राउंड वाटर सेल की ताजा रिपोर्ट भी खतरे की पुष्टि करती है। पिछले 20 वर्षों में जिले का औसत भूजल स्तर 10.31 मीटर नीचे चला गया है। वर्ष 2005 में जहां औसत जलस्तर 10.58 मीटर था, वहीं 2025 में यह 20.89 मीटर तक पहुंच गया। फरीदाबाद और बल्लभगढ़ ब्लॉक अति गंभीर श्रेणी में है। वहीं, तिगांव ब्लॉक गंभीर श्रेणी में पहुंच चुका है।
टैंकरों से होती है 120 एमएलडी पानी की आपूर्ति
शहर की जलापूर्ति व्यवस्था भी इस संकट की गंभीर तस्वीर पेश करती है। करीब 25 लाख आबादी को प्रतिदिन 450 एमएलडी पानी की जरूरत होती है। वहीं, केवल 330 एमएलडी पानी की ही आपूर्ति हो पा रही है। मांग और आपूर्ति के बीच 120 एमएलडी का भारी अंतर है। इसके कारण शहर की 40 से अधिक कॉलोनियां पेयजल संकट झेल रही हैं। बल्लभगढ़ और एनआईटी के कई इलाकों में लोग निजी टैंकरों और भूजल पर निर्भर हैं। शहर में 200 से अधिक अवैध ट्यूबवेल दिन-रात भूजल निकालकर बेच रहे हैं। जिसके कारण अवैध जल दोहन लगातार बढ़ रहा है।

रेनवाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम पड़े हैं ठप
जिले में भूजल रिचार्ज की योजनाएं भी कागजों तक सीमित नजर आती हैं। बारिश के पानी को जमीन में पहुंचाने के लिए बनाए गए रेनवाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम भी बदहाल पड़े हुए हैं। बदरपुर बॉर्डर से सीकरी तक विभिन्न चौराहों पर राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण ने 27 रेनवाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम बनाए थे। जिनमें से बल्लभगढ़ फ्लाईओवर के नीचे पांच लाख लीटर क्षमता वाला सबसे बड़ा सिस्टम भी शामिल है। करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद अधिकांश सिस्टम वर्षों से बंद पड़े हैं। जिसके कारण बारिश का पानी नालों के जरिये बह जाता है। वहीं, प्राकृतिक जल संचयन का आधार रहे 70 से अधिक तालाब अतिक्रमण और उपेक्षा की भेंट चढ़ चुके हैं। जिसके कारण भूजल रिचार्ज नहीं हो पाता है।


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