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Faridabad News: प्रदूषण और गिरते तापमान के बीच पाले जैसी स्थिति, फसलों पर मंडराया खतरा

Thu, 08 Jan 2026 01:07 AM IST
Noida Bureau नोएडा ब्यूरो
Updated Thu, 08 Jan 2026 01:07 AM IST
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Pollution and falling temperatures create frost-like conditions, threatening crops
सरसों और सब्जियों की फसलों पर इसका प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की संभावना
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नीरज धर पाण्डेय

फरीदाबाद। जिले में लगातार गिरते तापमान और बढ़ते प्रदूषण के कारण पाले जैसी स्थिति बनने की आशंका बढ़ गई है, जिससे किसानों की चिंता गहराती जा रही है। मौसम में आई कड़ाके की ठंड का असर जहां गेहूं की फसल पर फिलहाल सीमित माना जा रहा है, वहीं सरसों और सब्जियों की फसलों पर इसका प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की संभावना जताई जा रही है। कृषि विशेषज्ञों के अनुसार ठंड, कोहरा और प्रदूषण के संयुक्त प्रभाव से कई फफूंद जनित रोग तेजी से पनप सकते हैं।



कृषि विज्ञान केंद्र फरीदाबाद के फसल वैज्ञानिक डॉ. विनोद मोहन ने बताया कि पिछले कुछ दिनों में तापमान में तेजी से गिरावट दर्ज की गई है और वायु प्रदूषण का स्तर भी बढ़ा हुआ है। ऐसी परिस्थितियों में कई बार पाले जैसी स्थिति बन जाती है, जो वास्तविक पाले जितना ही नुकसान फसलों को पहुंचा सकती है। उन्होंने कहा कि गेहूं की फसल में इस समय पीला रतुआ रोग का खतरा बना हुआ है। यह एक गंभीर फफूंद जनित रोग है, जो विशेष मौसम में तेजी से फैलता है। जब तापमान 8 से 13 डिग्री सेल्सियस के बीच रहता है और आद्रता 80 से 100 प्रतिशत तक पहुंच जाती है, तब इस रोग के पनपने की संभावना सबसे अधिक होती है।
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डॉ. मोहन ने बताया कि पहाड़ी क्षेत्रों, विशेषकर लाहौल-स्पीति की ओर से चलने वाली ठंडी हवाओं के कारण यह बीमारी पहाड़ों से पंजाब होते हुए हरियाणा के जिलों तक तेजी से फैल सकती है। उन्होंने कहा कि पीला रतुआ का प्रभाव गेहूं की किस्म पर भी निर्भर करता है। एचडी 2851, एचडी 2967, पीबीडब्ल्यू 343 और डब्ल्यूएच 711 जैसी किस्में इस रोग के प्रति अधिक संवेदनशील मानी जाती हैं। इस रोग के लक्षण पत्तियों पर पीली या नारंगी रंग की धारियों के रूप में दिखाई देते हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि हर पीला पत्ता रतुआ नहीं होता। यदि पत्ते को छूने पर हाथों पर हल्दी जैसा पीला पाउडर लग जाए, तभी उसे पीला रतुआ माना जाता है।
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सफेद रतुआ रोग का खतरा बढ़ा
दूसरी ओर यही मौसम सरसों की फसल के लिए अधिक नुकसानदायक साबित हो सकता है। अत्यधिक ठंड, कोहरा और प्रदूषण के कारण बनने वाली पाले जैसी स्थिति में सरसों में सफेद रतुआ रोग का खतरा बढ़ जाता है। यह रोग आमतौर पर खेत के किनारों से शुरू होकर धीरे-धीरे पूरी फसल में फैल जाता है। पत्तियों, तनों और फलियों पर सफेद फफूंदनुमा परत जमने से उत्पादन पर सीधा असर पड़ता है।




डॉ. विनोद मोहन ने किसानों को सलाह दी कि जैसे ही रोग के शुरुआती लक्षण दिखाई दें, तुरंत नियंत्रण के उपाय अपनाएं। इसके लिए 200 मिलीलीटर टिल्ट 25 प्रतिशत ईसी (प्रोपीकोनाजोल) को 200 लीटर पानी में घोलकर प्रति एकड़ की दर से छिड़काव किया जाए। यदि मौसम प्रतिकूल बना रहे तो 10 से 15 दिन के अंतराल पर दोबारा छिड़काव जरूरी है। उन्होंने कहा कि किसानों को नियमित फसल का निरीक्षण करते रहना चाहिए ताकि समय रहते फसल को बीमारी से बचाया जा सके।
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