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Faridabad News: कारगिल युद्ध में शहीद वीरेंद्र अत्री युवाओं के लिए प्रेरणा के स्रोत
Tue, 25 Jul 2023 06:56 PM IST
नोएडा ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, फरीदाबाद
संवाद न्यूज एजेंसी, फरीदाबाद
Updated Tue, 25 Jul 2023 06:56 PM IST
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कारगिल दिवस पर विशेष
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- 21 साल की उम्र में शहीद होकर फतह हासिल की थी
फोटो-
हेमलता रावत
बल्लभगढ़। कारगिल युद्ध में पाकिस्तानी घुसपैठियों को खदेड़ने में शहीद हुए वीरेंद्र अत्री युवाओं के लिए प्रेरणा स्रोत हैं। भारत-पाक के बीच साल 1999 में हुए कारगिल युद्ध में शहीद जवानों की याद में 26 जुलाई को विजय दिवस मनाया जाता है।
गांव मोहना में शहीद वीरेंद्र अत्री के नाम से राजकीय शहीद वीरेंद्र कुमार सीनियर सेकेंडरी स्कूल में स्मारक बनाया गया है और उनकी प्रतिमा भी लगी है। बड़े भाई डॉ. हरप्रसाद अत्री ने बताया कि वीरेंद्र ने विज्ञान से 12वीं पास की और दिसम्बर 1998 में सेना में भर्ती हो गया था। सेना में भर्ती होने के आठ माह बाद ही रायबरेली से कारगिल युद्ध में जाने का आदेश जारी किया गया था। उस समय उनकी उम्र मात्र 21 साल थी। उनकी तैनाती मस्कोह घाटी में थी। उच्च अधिकारियों से आदेश मिलने पर उनकी जाट बटालियन के 25 जवानों की टुकड़ी ने 5 जुलाई की रात पिलर नंबर 2 पहाड़ी पर चढ़ाई शुरू कर दी। पहाड़ की चोटी पर बैठे पाकिस्तानी सैनिक व घुसपैठियों ने भारतीय सैनिकों को आता देख फायरिंग शुरू कर दी। इस दौरान एक गोली वीरेंद्र सिंह के पैर में लगी। गोली लगने के बावजूद वीरेंद्र ने हिम्मत नहीं हारी और 6 जुलाई की सुबह 4:45 बजे भारतीय जवानों ने पाकिस्तानी सेना को मौत के घाट उतार कर चोटी पर फतह हासिल की थी। फतह हासिल करने के बाद उनके अन्य साथी ने वीरेंद्र के पैर से गोली निकालने का प्रयास किया, तभी एक गोला उसके पास आकर गिरा और वीरेंद्र अत्री शहीद हो गए थे। 10 जुलाई 1999 को वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय में राजकीय व सैनिक सम्मान के साथ अंतिम संस्कार किया गया था।
आज भी छोटे बेटे को याद करके रोती हैं मां
शहीद वीरेंद्र अत्री की मां लीला देवी (95) की आंखें आज भी अपने सबसे छोटे बेटे को याद करके नम हो जाती हैं। मात्र 21 साल की उम्र में वह उनको छोड़ कर चला गया था, लेकिन उनको खुशी इस बात की थी कि उनके बेटा भारत मां के लिए शहीद हुआ है। प्रत्येक वर्ष 11 जुलाई को शहीद वीरेंद्र का विदाई दिवस मनाया जाता है। कबड्डी के शौकीन वीरेंद्र की याद में हर साल एक जनवरी को उनके जन्मदिन पर कबड्डी प्रतियोगिता भी कराई जाती है, जिसमें सेना के अलावा हरियाणा, उत्तर प्रदेश व पंजाब की टीमें भी हिस्सा लेती हैं।
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शहादत के पांच दिन बाद बड़ा भाई भी पहुंचा कारगिल युद्ध में
डॉ. हरप्रसाद ने बताया कि उनका बड़ा भाई शेर सिंह भी सैनिक थे। सेना की सिग्नल कोर से सेवानिवृत्त शेर सिंह की कारगिल युद्ध के दौरान तैनाती पोखरण, जेसलमैर में थी। शहीद वीरेंद्र की शहादत की खबर मिलने पर वह अंतिम विदाई देने के लिए सेना से छुट्टी लेकर आए थे लेकिन अंतिम संस्कार के पांचवें दिन वह देश की रक्षा करने के लिए कारगिल युद्ध में चले गए।
22 साल बाद मिला 200 गज का प्लाॅट
डाॅ हरप्रसाद ने बताया कि उनका भाई जब शहीद हुआ था तो सरकार ने 200 गज का प्लॉट देने का वायदा किया था। गांव के सरपंच ने कई बार रेजुलेशन बनाकर डीडीपीओ कार्यालय में भेज दिया, उसके बावजूद भी विभाग के अधिकारी उनके प्लॉट के कागज बनाकर देने को तैयार नहीं थे। आखिरकार उनको 22 साल बाद करीब 4 महीने पहले 200 गज का प्लॉट गांव मोहना में दिया गया है।
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- 21 साल की उम्र में शहीद होकर फतह हासिल की थी
फोटो-
हेमलता रावत
बल्लभगढ़। कारगिल युद्ध में पाकिस्तानी घुसपैठियों को खदेड़ने में शहीद हुए वीरेंद्र अत्री युवाओं के लिए प्रेरणा स्रोत हैं। भारत-पाक के बीच साल 1999 में हुए कारगिल युद्ध में शहीद जवानों की याद में 26 जुलाई को विजय दिवस मनाया जाता है।
गांव मोहना में शहीद वीरेंद्र अत्री के नाम से राजकीय शहीद वीरेंद्र कुमार सीनियर सेकेंडरी स्कूल में स्मारक बनाया गया है और उनकी प्रतिमा भी लगी है। बड़े भाई डॉ. हरप्रसाद अत्री ने बताया कि वीरेंद्र ने विज्ञान से 12वीं पास की और दिसम्बर 1998 में सेना में भर्ती हो गया था। सेना में भर्ती होने के आठ माह बाद ही रायबरेली से कारगिल युद्ध में जाने का आदेश जारी किया गया था। उस समय उनकी उम्र मात्र 21 साल थी। उनकी तैनाती मस्कोह घाटी में थी। उच्च अधिकारियों से आदेश मिलने पर उनकी जाट बटालियन के 25 जवानों की टुकड़ी ने 5 जुलाई की रात पिलर नंबर 2 पहाड़ी पर चढ़ाई शुरू कर दी। पहाड़ की चोटी पर बैठे पाकिस्तानी सैनिक व घुसपैठियों ने भारतीय सैनिकों को आता देख फायरिंग शुरू कर दी। इस दौरान एक गोली वीरेंद्र सिंह के पैर में लगी। गोली लगने के बावजूद वीरेंद्र ने हिम्मत नहीं हारी और 6 जुलाई की सुबह 4:45 बजे भारतीय जवानों ने पाकिस्तानी सेना को मौत के घाट उतार कर चोटी पर फतह हासिल की थी। फतह हासिल करने के बाद उनके अन्य साथी ने वीरेंद्र के पैर से गोली निकालने का प्रयास किया, तभी एक गोला उसके पास आकर गिरा और वीरेंद्र अत्री शहीद हो गए थे। 10 जुलाई 1999 को वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय में राजकीय व सैनिक सम्मान के साथ अंतिम संस्कार किया गया था।
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आज भी छोटे बेटे को याद करके रोती हैं मां
शहीद वीरेंद्र अत्री की मां लीला देवी (95) की आंखें आज भी अपने सबसे छोटे बेटे को याद करके नम हो जाती हैं। मात्र 21 साल की उम्र में वह उनको छोड़ कर चला गया था, लेकिन उनको खुशी इस बात की थी कि उनके बेटा भारत मां के लिए शहीद हुआ है। प्रत्येक वर्ष 11 जुलाई को शहीद वीरेंद्र का विदाई दिवस मनाया जाता है। कबड्डी के शौकीन वीरेंद्र की याद में हर साल एक जनवरी को उनके जन्मदिन पर कबड्डी प्रतियोगिता भी कराई जाती है, जिसमें सेना के अलावा हरियाणा, उत्तर प्रदेश व पंजाब की टीमें भी हिस्सा लेती हैं।
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शहादत के पांच दिन बाद बड़ा भाई भी पहुंचा कारगिल युद्ध में
डॉ. हरप्रसाद ने बताया कि उनका बड़ा भाई शेर सिंह भी सैनिक थे। सेना की सिग्नल कोर से सेवानिवृत्त शेर सिंह की कारगिल युद्ध के दौरान तैनाती पोखरण, जेसलमैर में थी। शहीद वीरेंद्र की शहादत की खबर मिलने पर वह अंतिम विदाई देने के लिए सेना से छुट्टी लेकर आए थे लेकिन अंतिम संस्कार के पांचवें दिन वह देश की रक्षा करने के लिए कारगिल युद्ध में चले गए।
22 साल बाद मिला 200 गज का प्लाॅट
डाॅ हरप्रसाद ने बताया कि उनका भाई जब शहीद हुआ था तो सरकार ने 200 गज का प्लॉट देने का वायदा किया था। गांव के सरपंच ने कई बार रेजुलेशन बनाकर डीडीपीओ कार्यालय में भेज दिया, उसके बावजूद भी विभाग के अधिकारी उनके प्लॉट के कागज बनाकर देने को तैयार नहीं थे। आखिरकार उनको 22 साल बाद करीब 4 महीने पहले 200 गज का प्लॉट गांव मोहना में दिया गया है।