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खोरी : जंगली जानवरों के डर से रात भर जागते हैं लोग
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फरीदाबाद। अरावली वन क्षेत्र स्थित खोरी गांव में तोड़फोड़ के बाद भी सैकड़ों लोग तंबू और झुग्गी डालकर मलबे के बीच रह रहे हैं। उनका कहना है कि जब से आशियाना टूटा है, रोज जंगली जानवरों के डर के साये में रात गुजरती है। खासकर बच्चों की सुरक्षा के लिए रात में परिवार का एक सदस्य जागता रहता हैं।
खोरी से विस्थापित लोगों का कहना है कि घर टूटने के बाद दुखों का पहाड़ टूट गया है। अब जाएं तो कहां जाए, एक-एक पैसा जोड़कर घर बनाया, लेकिन, अब वह भी नहीं रहा। परेशानियों में जीने की आदत बन गई है। सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर अरावली वन क्षेत्र स्थित खोरी गांव में तोड़फोड़ के बाद विस्थापित लोगों को डबुआ कॉलोनी और बापू नगर में फ्लैट देने की प्रक्रिया चल रही है। लेकिन, अभी भी खोरी के लोग टूटे मकान के मलबे पर झुग्गी बनाकर रह रहे हैं। उनका कहना है कि चाहे सरकार बार-बार घर ही क्यों न तोड़े, यहां से नहीं जाएंगे।
फ्लैट नहीं है रहने लायक
लोगों का कहना है कि सरकार द्वारा दिए जा रहे फ्लैट रहने लायक नहीं हैं। चारों ओर गंदगी फैली रहती है और फ्लैट जर्जर हैं। इसलिए झुग्गी डालकर अपनी जमीन पर ही रहेंगे।
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वर्जन-
बच्चों को लेकर मलबे पर टेंट लगाकर रह रहे हैं। जंगली जानवरों के डर के साये में रात गुजरती है। हमारे पास दूसरा कोई रास्ता नहीं है।
- नूरजहां
पुस्तैनी गांव में जो था, उसे बेचकर यहां घर बनाया। पूरा परिवार सालों से रह रहा हैं। घर टूटने के बाद रोजगार भी छिन गया। दो महीने से झुग्गी डालकर परिवार के साथ रह रही हूं। रोज रात अंधेरे में कटती है। डर भी लगा रहता है कि कुछ अनहोनी न हो जाए। - शफीगा
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खोरी से विस्थापित लोगों का कहना है कि घर टूटने के बाद दुखों का पहाड़ टूट गया है। अब जाएं तो कहां जाए, एक-एक पैसा जोड़कर घर बनाया, लेकिन, अब वह भी नहीं रहा। परेशानियों में जीने की आदत बन गई है। सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर अरावली वन क्षेत्र स्थित खोरी गांव में तोड़फोड़ के बाद विस्थापित लोगों को डबुआ कॉलोनी और बापू नगर में फ्लैट देने की प्रक्रिया चल रही है। लेकिन, अभी भी खोरी के लोग टूटे मकान के मलबे पर झुग्गी बनाकर रह रहे हैं। उनका कहना है कि चाहे सरकार बार-बार घर ही क्यों न तोड़े, यहां से नहीं जाएंगे।
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फ्लैट नहीं है रहने लायक
लोगों का कहना है कि सरकार द्वारा दिए जा रहे फ्लैट रहने लायक नहीं हैं। चारों ओर गंदगी फैली रहती है और फ्लैट जर्जर हैं। इसलिए झुग्गी डालकर अपनी जमीन पर ही रहेंगे।
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बच्चों को लेकर मलबे पर टेंट लगाकर रह रहे हैं। जंगली जानवरों के डर के साये में रात गुजरती है। हमारे पास दूसरा कोई रास्ता नहीं है।
- नूरजहां
पुस्तैनी गांव में जो था, उसे बेचकर यहां घर बनाया। पूरा परिवार सालों से रह रहा हैं। घर टूटने के बाद रोजगार भी छिन गया। दो महीने से झुग्गी डालकर परिवार के साथ रह रही हूं। रोज रात अंधेरे में कटती है। डर भी लगा रहता है कि कुछ अनहोनी न हो जाए। - शफीगा