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कोरोना काल में शवों के लिए ईंधन जुटाना आसान नहीं
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फरीदाबाद। फैली कोरोना महामारी के कारण दवा, टीके की समस्या के साथ अंतिम संस्कार के इंतजाम के लिए भी तीमारदारों की कमर टूट गई है। हालांकि संक्रमण के मामलों में कमी के साथ मौतों के आंकड़ों में गिरावट आ रही है। वहीं दूसरे राज्य व जिलों का बोझ भी स्थानीय स्वास्थ्य सेवाओं व श्मशान पर कम हुआ है। लेकिन डेढ़ माह में शवों का अंतिम संस्कार करना श्मशान घाट संचालकों के लिए चुनौती बना रहा। यह बातें अमर उजाला टीम ने शहर के कुछ श्मशान घाट संचालकों से अंत्येष्टि के दौरान आने वाली समस्याओं के बारे में जाना।
बाहर से आई लकड़ियां, लेकिन बढ़ने नहीं दिए दाम
अजरौंदा गांव स्वर्गाश्रम के संचालक संजय आचार्य ने बताया कि उनके यहां 700 रुपये क्विंटल के दाम पर लकड़ियां दी गईं। ठेकेदार ने दाम बढ़ाए, लेकिन उस खर्च को कमेटी व अन्य लोगों ने अपनी जेब से व्यय किया। देखरेख का जिम्मा मानव रचना एजुकेशन सोसाइटी की तरफ से किया जाता है। लकड़ियों की मांग अत्यधिक हो जाने पर गोबर के कंडे, फूस व अन्य सामान की मात्रा बढ़ाकर शवों की अंत्येष्टि की गई। आचार्य का कहना है कि महामारी के चरम पर श्मशान में 24 घंटे शव जलाए गए।
तिगांव रोड श्मशान घाट संचालक लीलू पहलवान ने बताया कि उनके यहां लकड़ियों का दो साल का ठेका होता है, जिसमें ठेकेदार को एक ही दाम पर लकड़ी उपलब्ध करानी होती है। कोरोना काल में मांग बढ़ी तो दाम भी बढ़ने लगे। इसके चलते ठेकेदार को भी खर्च निकालना भारी पड़ने लगा। इसके अलावा करीब 55 से 60 शव ऐसे थे, जिनकी अंत्येष्टि निशुल्क भी कराई गई। मांग व दाम बढ़ने पर उन्होंने अपनी एक कमेटी बनाई। जिसमें शहर के कुछ दानी लोगों को भी जोड़ा गया। लावारिस शवों का खर्च अलग-अलग लोगों ने व्यय किया। महंगाई बढ़ने पर ठेकेदार को अतिरिक्त पैसे दिए गए। लोगों से अधिकतम तीन हजार रुपये ही शुल्क लिया गया। लोगों की मदद करने में एंबुलेंस चालकों से लेकर शहर के दुकानदार व अन्य लोग भी शामिल रहे।
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लकड़ी लाने वाले कई ड्राइवर हो गए संक्रमित
लीलू पहलवान ने बताया कि शहर में करीब एक दर्जन ठेकेदार हैं, जो श्मशान घाटों पर लकड़ियों की आपूर्ति करते हैं। ज्यादातर लकड़ियां मेवात, पुन्हाना, राजस्थान व उत्तर प्रदेश के कुछ इलाकों से आती है। मांग बढ़ने पर राजस्थान व यूपी में भी लकड़ियों की खपत बढ़ने लगी। इसके साथ ही रास्ते में चेकिंग के दौरान ट्रैक्टर चालकों को परेशानी होने लगी। कुछ चालक व परिचालक कोरोना संक्रमित हो गए। समस्या बढ़ती देख खाली बैठे कुछ चालकों ने कमान संभाली। रास्ते में चेकिंग के दौरान आने वाली समस्या के निवारण के लिए उन्होंने श्मशान के लेटरपैड पर एक नोट लिखकर चालकों को दिया। इस पर श्मशान घाट संचालक के मोबाइल नंबर के अलावा इलाके के चौकी व थाना प्रभारी के नंबर भी दिए गए। संजय आचार्य के मुताबिक अब शवों की संख्या में कमी आई है। वहीं जरूरत से ज्यादा लकड़ियां उपलब्ध हैं।
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बाहर से आई लकड़ियां, लेकिन बढ़ने नहीं दिए दाम
अजरौंदा गांव स्वर्गाश्रम के संचालक संजय आचार्य ने बताया कि उनके यहां 700 रुपये क्विंटल के दाम पर लकड़ियां दी गईं। ठेकेदार ने दाम बढ़ाए, लेकिन उस खर्च को कमेटी व अन्य लोगों ने अपनी जेब से व्यय किया। देखरेख का जिम्मा मानव रचना एजुकेशन सोसाइटी की तरफ से किया जाता है। लकड़ियों की मांग अत्यधिक हो जाने पर गोबर के कंडे, फूस व अन्य सामान की मात्रा बढ़ाकर शवों की अंत्येष्टि की गई। आचार्य का कहना है कि महामारी के चरम पर श्मशान में 24 घंटे शव जलाए गए।
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तिगांव रोड श्मशान घाट संचालक लीलू पहलवान ने बताया कि उनके यहां लकड़ियों का दो साल का ठेका होता है, जिसमें ठेकेदार को एक ही दाम पर लकड़ी उपलब्ध करानी होती है। कोरोना काल में मांग बढ़ी तो दाम भी बढ़ने लगे। इसके चलते ठेकेदार को भी खर्च निकालना भारी पड़ने लगा। इसके अलावा करीब 55 से 60 शव ऐसे थे, जिनकी अंत्येष्टि निशुल्क भी कराई गई। मांग व दाम बढ़ने पर उन्होंने अपनी एक कमेटी बनाई। जिसमें शहर के कुछ दानी लोगों को भी जोड़ा गया। लावारिस शवों का खर्च अलग-अलग लोगों ने व्यय किया। महंगाई बढ़ने पर ठेकेदार को अतिरिक्त पैसे दिए गए। लोगों से अधिकतम तीन हजार रुपये ही शुल्क लिया गया। लोगों की मदद करने में एंबुलेंस चालकों से लेकर शहर के दुकानदार व अन्य लोग भी शामिल रहे।
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लकड़ी लाने वाले कई ड्राइवर हो गए संक्रमित
लीलू पहलवान ने बताया कि शहर में करीब एक दर्जन ठेकेदार हैं, जो श्मशान घाटों पर लकड़ियों की आपूर्ति करते हैं। ज्यादातर लकड़ियां मेवात, पुन्हाना, राजस्थान व उत्तर प्रदेश के कुछ इलाकों से आती है। मांग बढ़ने पर राजस्थान व यूपी में भी लकड़ियों की खपत बढ़ने लगी। इसके साथ ही रास्ते में चेकिंग के दौरान ट्रैक्टर चालकों को परेशानी होने लगी। कुछ चालक व परिचालक कोरोना संक्रमित हो गए। समस्या बढ़ती देख खाली बैठे कुछ चालकों ने कमान संभाली। रास्ते में चेकिंग के दौरान आने वाली समस्या के निवारण के लिए उन्होंने श्मशान के लेटरपैड पर एक नोट लिखकर चालकों को दिया। इस पर श्मशान घाट संचालक के मोबाइल नंबर के अलावा इलाके के चौकी व थाना प्रभारी के नंबर भी दिए गए। संजय आचार्य के मुताबिक अब शवों की संख्या में कमी आई है। वहीं जरूरत से ज्यादा लकड़ियां उपलब्ध हैं।