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Faridabad News: नाबालिग के गर्भपात में डॉक्टर के खिलाफ कार्यवाही में दखल से कोर्ट का इन्कार
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अमर उजाला ब्यूरो
नई दिल्ली।
दिल्ली हाईकोर्ट ने छह साल की नाबालिग लड़की की गर्भावस्था को गैर-कानूनी तरीके से खत्म करने और इसकी जानकारी अधिकारियों को न देने पर आरोपी डॉक्टर के खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही में हस्तक्षेप करने से इनकार किया है।
न्यायमूर्ति पुरुषेंद्र कुमार कौरव की पीठ ने कहा कि आगे की जांच का निर्देश देने वाले 29 सितंबर 2020 के ट्रायल कोर्ट के आदेश में हस्तक्षेप की कोई आवश्यकता नहीं है। पीठ ने कहा कि आरोपपत्र पर संज्ञान लेकर समन जारी करने वाले 31 सितंबर 2021 के आदेश में कोई अवैधता नहीं है। डॉक्टर का दावा था कि गर्भपात के समय लड़की की उम्र 20 साल बताई गई थी। अदालत ने कहा कि कानून के तहत उम्र का पता लगाना और उसे दर्ज करना जरूरी है।
पीठ ने मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी (एमटीपी) अधिनियम का हवाला देते हुए कहा कि एक नाबालिग खुद से गर्भपात के लिए सहमति देने में सक्षम नहीं है। अभिभावक की लिखित सहमति के बिना उसकी गर्भावस्था को चिकित्सकीय रूप से समाप्त नहीं किया जा सकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि एमटीपी अधिनियम के तहत तय उम्र की शर्त को नजरअंदाज करके उम्र संबंधी दस्तावेज मांगने की जिम्मेदारी से डॉक्टर नहीं बच सकते। पूरी कानूनी व्यवस्था यह मानती है कि उम्र जैसे अहम तथ्य का पता लगाना जरूरी है और इसे जुबानी नहीं माना जा सकता।
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नई दिल्ली।
दिल्ली हाईकोर्ट ने छह साल की नाबालिग लड़की की गर्भावस्था को गैर-कानूनी तरीके से खत्म करने और इसकी जानकारी अधिकारियों को न देने पर आरोपी डॉक्टर के खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही में हस्तक्षेप करने से इनकार किया है।
न्यायमूर्ति पुरुषेंद्र कुमार कौरव की पीठ ने कहा कि आगे की जांच का निर्देश देने वाले 29 सितंबर 2020 के ट्रायल कोर्ट के आदेश में हस्तक्षेप की कोई आवश्यकता नहीं है। पीठ ने कहा कि आरोपपत्र पर संज्ञान लेकर समन जारी करने वाले 31 सितंबर 2021 के आदेश में कोई अवैधता नहीं है। डॉक्टर का दावा था कि गर्भपात के समय लड़की की उम्र 20 साल बताई गई थी। अदालत ने कहा कि कानून के तहत उम्र का पता लगाना और उसे दर्ज करना जरूरी है।
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पीठ ने मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी (एमटीपी) अधिनियम का हवाला देते हुए कहा कि एक नाबालिग खुद से गर्भपात के लिए सहमति देने में सक्षम नहीं है। अभिभावक की लिखित सहमति के बिना उसकी गर्भावस्था को चिकित्सकीय रूप से समाप्त नहीं किया जा सकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि एमटीपी अधिनियम के तहत तय उम्र की शर्त को नजरअंदाज करके उम्र संबंधी दस्तावेज मांगने की जिम्मेदारी से डॉक्टर नहीं बच सकते। पूरी कानूनी व्यवस्था यह मानती है कि उम्र जैसे अहम तथ्य का पता लगाना जरूरी है और इसे जुबानी नहीं माना जा सकता।
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