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Faridabad News: ब्लड कैंसर वैक्सीन का ईएसआईसी और अमृता अस्पताल में होगा ट्रायल

Sat, 27 Jan 2024 11:15 PM IST
Noida Bureau नोएडा ब्यूरो
Updated Sat, 27 Jan 2024 11:15 PM IST
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Blood cancer vaccine will be tested in ESIC and Amrita Hospital
ट्रायल पूरा होने के बाद मरीजों का इलाज शुरू कर दिया जाएगा, बेहद कारगर वैक्सीन मानी गई
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अमर उजाला ब्यूरो

फरीदाबाद। ब्लड कैंसर की समस्या से जूझ रहे लोगों के लिए राहत की खबर है। आईआईटी बॉम्बे और टाटा मेमोरियल अस्पताल के संयुक्त तत्वावधान में बनाई गई कार-टी सेल थेरेपी वैक्सीन के तीन चरणों का ट्रायल फरीदाबाद में जल्द शुरू किया जाएगा। इसके लिए एनआईटी तीन स्थित ईएसआईसी मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल और ग्रेटर फरीदाबाद स्थित अमृता अस्पताल को चुना गया है। ट्रायल पूरा होने के बाद इससे मरीजों का इलाज शुरू कर दिया जाएगा। कैंसर के मरीजों के लिए यह बेहद कारगर वैक्सीन मानी गई है।

बदलती जीवनशैली और बढ़ते प्रदूषण के कारण कैंसर की बीमारी लोगों में तेजी से बढ़ रही है। खासकर बच्चों में ब्लड कैंसर के मामले अधिक पाए जा रहे हैं। प्रत्येक दो से तीन माह में ईएसआईसी मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल में एक से दो बच्चे इलाज के लिए पहुंचते हैं। अन्य कैंसर से पीड़ित 100 से अधिक मरीज अस्पताल में भर्ती हैं। यही स्थिति अन्य अस्पतालों में है।
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ईएसआईसी अस्पताल के कैंसर रोग विशेषज्ञ डॉ. संजय कुमार ने बताया कि ब्लड कैंसर की शुरुआत में ही शरीर के टिश्यू या डीएनए के अंदर म्यूटेशन होने लगता है यानी इसके अंदर लगातार सेल्स बढ़ने लगते हैं। यह कैंसर ब्लड या बोन मैरो में होता है। इसके बाद यह धीरे-धीरे ब्लड में फैलने लगता है, जिसकी वजह से व्हाइट ब्लड सेल्स को नुकसान होता है और शरीर ब्लड सर्कुलेशन बिगड़ जाता है। उन्होंने कहा कि तीन तरह के ब्लड कैंसर होते हैं जैसे- ल्यूकेमिया, लिंफोमा और मल्टीपल माइलोमा कहा जाता है, ल्यूकेमिया भी दो तरह के होते हैं, जिनमें से एक में बहुत तेजी से ब्लड कैंसर फैलता है। दूसरे वालों में धीरे-धीरे फैलता है, फिर लिंफोमा आता है। इसमें कैंसर गांठ की तरह बनने लगता है। इसे मल्टीपल माइलोमा कहा जाता है। 40 फीसदी मामलों में दवाइयों से इलाज संभव है जबकि अन्य मामलों में बोन मैरो ट्रांसप्लांट किया जाता है। एक्यूट ल्यूकेमिया में यदि जल्दी इलाज शुरू नहीं किया जाए तो एक से तीन माह में जानलेवा बन जाता है। इसके लिए आईआईटी बॉम्बे और टाटा मेमोरियल अस्पताल के संयुक्त तत्वावधान में कार-टी सेल थेरेपी वैक्सीन बनाई है, जो मरीजों को ठीक करने में नई आस बनकर उभर रही है। यह थेरेपी बच्चों में 99 प्रतिशत तक असरदार है, जबकि बड़ों में भी काफी प्रभावी है।
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डॉक्टरों ने दावा किया है कि यह देश में बनी पहली कार-टी सेल थेरेपी है, जो विदेश में मौजूद थेरेपी से बेहद किफायती है और इसके साइड इफेक्ट भी काफी कम हैं। ईएसआईसी मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल के चिकित्सा अधीक्षक डॉ. अनिल पांडे ने कहा कि अभी इस थेरेपी के दूसरे चरण का ट्रायल बेंगलुरु के एक अस्पताल में चल रहा है, जिसके परिणाम काफी अच्छे आए हैं। तीसरे चरण का ट्रायल फरीदाबाद में किया जाएगा। अधिकारियों के अनुसार अमृता अस्पताल के अलावा ईएसआईसी मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल में भी इस वैक्सीन का ट्रायल किया जा सकता है, क्योंकि यहां कैंसर के सबसे ज्यादा मरीज हैं।



दूसरे चरण में 70 फीसदी सकारात्मक परिणाम मिले

कैंसर विशेषज्ञों के अनुसार, विदेश में उपलब्ध थेरेपी में न्यूरोटॉक्सिटी, जिससे दिमाग पर असर पड़ता है और दूसरा साइटोकाइन रिलीज सिंड्रोम जैसे साइड इफेक्ट देखने को मिले हैं, लेकिन देश में बनी सेल थेरेपी में दोनों ही साइड इफेक्ट्स नहीं मिले हैं। दूसरे चरण में उन मरीजों पर इस थेरेपी का ट्रायल किया, जिन पर स्टैंडर्ड थेरेपी फेल हो गई है। इनमें वे मरीज भी शामिल हैं, जिनकी आयु 6 महीने से भी कम बची है। ऐसे मरीजों में हमने 70 फीसदी सकारात्मक परिणाम पाए हैं।



खराब सेल को करते हैं निष्क्रिय

कैंसर रोग विशेषज्ञों के अनुसार कार-टी सेल थेरेपी में मरीज के शरीर से रोग प्रतिरोधक सेल्स को निकाला जाता है। लैब में सेल्स में आईआईटी के इंजीनियर द्वारा जेनेटिकली बदलाव किए जाते हैं। सेल्स में एक जीन इंट्रोड्यूस किया जाता है, जिसमें दो महत्वपूर्ण फीचर्स होते हैं। पहला अच्छे सेल्स, जो शरीर में धीरे-धीरे बढ़ रहे थे, वह तेजी से बढ़ेंगे। कार-टी सेल के दूसरे फीचर में यह होता है कि वह कैंसर सेल्स को प्रभावी तरीके से टारगेट कर नष्ट करता है। लैब की प्रक्रिया पूरी होने के बाद कार-टी सेल्स मरीज में ट्रांसफ्यूज किया जाता है। वैसे तो उपचार एक साइकिल में ही हो जाता है, लेकिन जरूरत पड़ी तो दूसरा साइकिल भी कर सकते हैं। जैसे प्लेटलेट्स चढ़ाया जाता है, उसी प्रकार से कार-टी सेल भी चढ़ाया जाता है। बस मशीन की सेटिंग अलग होती है।




कार-टी सेल थेरेपी वैक्सीन के तीसरे चरण के ट्रायल को ईएसआईसी में लाने का प्रयास किया जा रहा है। यदि संभव हुआ तो वैक्सीन बनने के बाद इस थेरेपी से मरीजों को काफी लाभ होगा।
- डॉ. अनिल पांडे, चिकित्सा अधीक्षक, ईएसआईसी मेडिकल एवं अस्पताल
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